तहें..

उस सरल रेखा में कितनी तहें थी
करीब से देखा तो जाना
जिल्द पर मर्यादा का कवर चढ़ाए
उसने औरों को आगे रक्खा
बाबूजी के सपने माँ की शिक्षाएं
भाई बहनों की बिना पर
उसने स्वयं को कवर के नीचे
दब जाने दिया तह बनकर
परिंदों से बेहतर योनि पाई मगर
खुली हवा में अपने तरीक़े से
साँस न ले पाई
स्वयं पर अपनों का अधिकार मानकर
उसने खुद को पीछे रक्खा
आसाढ़ के बादलों की तरह
उसका मन भी घुमड़ता होगा
दिल का पपीहरा उसका
उड़ने को फड़फड़ाता होगा
रिवायतों को आधार मानकर
उसने ज़माने को सर पर रक्खा
जनक, पिया और सुत ने
सीमाएं तय की
मन की तहों को किसने देखा
इन तहों को लक्ष्मण रेखा मानकर
उसने कदम न बाहर रक्खा
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वापसी- एक लघु कथा

गांव की सरस्वती नदी के किनारे वाले वट वृक्ष के नीचे मैं अपना खाली समय गुजारा करता था।
अपनी बाँसुरी पर रियाज़ करना, या कोई धुन गाना मुझे अतिप्रिय था।
वय 15-16 की जो जिसमें रम जाए वैसी हो जाये!
लोग आकर खुशी से आग्रह करते मैं कोई धुन गाऊँ।
कुछ तो सपनों की नगरी मुम्बई में जाकर अपनी कला की छाप छोड़ने की बात करते।
भोला मन था, बह उठता था अपने घर पर जब इस तरह की बात रखता तो उपेक्षा का भाव मिलता।

बाबा तो बुढियाने लगे हैं, खेत , ढोर कौन सम्भालेगा
मगर संगीत में कुछ बनने की उत्कंठा तीव्र थी । एक रोज चुपचाप मुम्बई के लिए निकल गया।
मुम्बई उतरा तो एक विशाल समंदर सा महानगर मेरे सामने था।
एक रिक्शावाले को जो कि एकतरफ खड़ा था, अपने मन की बात कहने का मन हुआ।
भाषा से वह मेरे क्षेत्र का लगता था।
। उसने किसी संगीतकार के आफिस में जाकर मिलने मिलाने की बात रखी।
बातों बातों में करीबियां हुई। कुछ उसने कही , कुछ मैंने।
रेन बसेरा उस ही कि कोठरी में हुआ । उस भले रिक्शावाले से काफी नजदीकियां बन गईं थी।
उसका नाम मोहन था।
मैं बहुत उत्साहित था ।
अगले रोज़ मोहन मुझे एक संगीतकार के ऑफिस ले आया। परदेस में वो अनजाना मोहन ही मेरा संबल था।
ऑफिस में मेरा परिचय अंदर तक पहुँचा दिया गया था।
काफी समय पश्चात उन संगीतकार महोदय ने मुझे समय दिया । ज्यादा न कुछ कहते हुए उन्होने मुझसे कहा कि, अच्छा आप बाँसुरी वादक हो, ऐसा करो.. आप परसों आना।

मैं इसे एक मौका समझता या धोखा..
इंतजार के सिवा कुछ न था मेरे तूणीर में ।
मोहन और मैं वापस लौट गए।
दूसरा दिन बेसब्री से गुजरा तीसरे दिन कुलदेवी के हाथ जोड़ फिर लक्ष्य हेतु निकला।
ऑफिस पहुँचकर फिर अपने आने का हेतु समझाया..
उम्मीद से बढ़कर मेरा अभिवादन हुआ।
“क्या नाम बताया अपना…?”
“सुनाओ, क्या सुनाना चाहते हो!”
मैंने अपना नाम बताने के साथ
बाँसुरी निकाल कर अपनी पसंदीदा धुन बजाई
“राधा क्यूँ गोरी..मैं क्यों काला..”

“अरे भाई ये सपनों की दुनिया है कुछ तड़क भड़क सुनाओ।”
अब मैं उन्हें कैसे समझाता बाँसुरी और तड़क भड़क का कोई तारतम्य ही नहीं है।
तर्क करने पर अवसर निकलने का भय था।
” सुर ताल मौसिक़ी कहाँ सीखी आपने..”
गुरुवर, बस ईश्वर आशीर्वाद से लगन और अभ्यास से ही सीखा है।
“चलो, किसी फ़िल्म की धुन सुनाओ।”
मैं बाँसुरी से धुन बजाने लगा।
मिनिट भर सुनने के बाद वो बोले, “अच्छा है, बहुत अच्छा है। ”
बरखुरदार, अपना नाम पता बाहर नोट करवा दो। फिलहाल तो कोई जॉब ऑन फ्लोर है नहीं,
अगर तुम्हारे लायक कोई काम निकला तो हम बुलवा लेंगे।
एक संक्षिप्त साक्षात्कार के बाद मैं बाहर निकल आया।
देर तक इंतजार कराने के बाद सहायक ने मेरा नाम नोट कर लिया ।
मैं रास्ते भर सोचता रहा,
मेरा सुर उन्हें पसंद आया होगा या नहीं आया होगा।
मोहन के ठिकाने पर आकर शाम को विस्तार से चर्चा हुई।
कुछ सहमित्र और चर्चा सुन रहे थे,
उनकी राय थी ” सपनों की दुनिया में
काम मांगने वालों की कमी नही तो काम की भी कमी नहीं , लगातार यहाँ रहकर संघर्ष तो करना ही पड़ेगा। ”
मैं उनकी बातों को बड़े गौर से सुन रहा था , मानो तकदीर का फैसला सुनाया जा रहा हो।
रात कशमकश में गुजरी,
यकीन नहीं था कि काम मिलेगा ही।
कहीं मैं नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर न रह जाऊँ। मेरी दृढ़ता , कच्ची दीवार की तरह ढह रही थी। दूर जाकर माँ के दुलार और आत्मीयता का अहसास हुआ। रह रह कर बाबूजी, , गाँव का खुलापन बुला रहा था। सोचने लगा खेत से अन्न मिलेगा और सरस्वती नदी का दुलार और गाँव भर का प्यार …
बाँसुरी तो सदा है ही साथ ।
तो कमी किस चीज की है। लिप्साओं की तो कमी होती ही नहीं ।
सुबह तक मेरी निष्ठा बदल गई थी। मैंने लौटने का मानस बना लिया था।
शहर आकर मैंने दो बातें अनुभव की।अनजान और बड़े महानगरों में भी मोहन जैसे भले लोगों की कमी नही है।
और दूसरे यह कि शहर भले ही बड़े हो जाएं गाँव का मुकाबिला नहीं कर सकते।
मोहन का अहसान लिए मैं विदा हुआ एक निर्णय ले लिया था मैंने, मोहन के लिए 5 किलो गांव का देशी घी जरूर लेकर आऊँगा, चाहे काम के लिए आऊँ या ना आऊँ ।
और इस तरह मैं गाँव की प्राकृतिक छटा में खुली साँस में अपने बड़े से वट वृक्ष की छाँव में फिर लौट आया था।

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रात बाहों में….

अधरों पर मुस्कान बिखेरे
अंकपाश में थे तुम मेरे

मंद रोशनी थी कमरे में
महक उठे बिस्तर तकिए
उस रात के पल थे सुनहरे
रात बाहों में थे तुम मेरे

जिस्म दहक रहा था मेरा
टूट रहा था लाज का घेरा
केश बिखेरे हुए घनेरे
रात बाहों में थे तुम मेरे

वस्त्र सकुचाएँ देख देखकर
क्या औचित्य ,रहें देह पर
दहक से रोशन थे अंधेरे
रात बाहों में थे तुम मेरे

काम उठाये बैठा था फन
पिघल उठे दोनों तन मन
हया खड़ी थी मुंह फेरे
रात बाहों में थे तुम मेरे

ढूंढ रहा जल सागर जैसे
कितना रस था परिदृश्य में
हो सवार काम के रथ पर
हाँ, रात बाहों में थे तुम मेरे

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एक औरत ने मुझे

एक औरत ने मुझे
जन्म देकर जीने का मौका दिया
स्नेह अमृत बरसाया मुझ पर
वो मां थी….मेरा खुदा !

एक औरत ने मुझे
उंगली थामकर चलना सिखलाया
जब मां और कहीं थी
तब माँ वही थी
सबसे बचाती थी
स्कूल से लाती ले जाती थी
वो बहन थी.. सबसे जुदा !

एक औरत ने मुझे
जीवन साथी बनाया
मेरी खातिर पिता का घर छोड़ा
उससे बेहतर दोस्त कौन होगा
इस बात का अहसास उसने
हर मोड़ पर कराया
वो जीवन संगिनी थी…मेरी सर्वदा!

एक औरत ने मुझे
संभाला मैं जब असहाय हुआ
मेरे जख्मों को संभाला जिसने
हर दर्द को छुआ
वो बेटी थी.. बेटे से भी बड़ी
मेरी खुशियों की नदिया

एक औरत ने मुझे
कितने रूपों में संभाला
मैं कैसे कहूँ ,
जीवन पुरुष प्रधान है
औरत, तू महान है!

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नारी

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मनुस्मृति कहती है..
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवताः
यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते
सरवास्तत्राफला: क्रियाः

जहाँ स्त्रियां पूजी जाती हैं
वो फिजा देवमयी हो जाती है
जो न करते सम्मान उनका
हर चाहत उनकी धूमिल हो जाती है

तेरे बगैर कल भी घर, घर नहीं था
और आज भी नहीं है
तेरे बगैर जीवन में मंगल ही नहीं है
बिन शक्ति के तो शिव भी शव हैं
नारी तो शक्ति है, जीवन गौरव है

तू लक्ष्मी तू अन्नपूर्णा
ममता का स्वरूप भी तू है
उज्ज्वल परम्परा तू धरती की
जीवन का समूल ही तू है

सीता, सावित्री,अरुंधति, अनुसुइया,
गार्गी, अहिल्या और झांसी तू है
पद्मिनी का जौहर तू है
मीरा की भक्ति भी तू है
पन्नाधाय का त्याग है तू तो
संस्कृति का ध्रुवतारा ही तू है

तू शबरी तेरी खातिर
प्रभु तुझ तक चलकर आये थे
तेरी निष्ठा और प्रेम के आगे
जिन्होंने झूठे बेर भी खाए थे

तू मां बनकर प्यार लुटाती है
पत्नी बन साथ निभाती है
बेटे को बेटी नहीं कहते पर
बेटी , बेटा भी कहलाती है

तुझसे जगमग घर संसार है
तू जग का वो झरना जिससे
मिलती खुशियां अपार हैं
वक्त के क्रूर हाथों ने तुझे
लूटा भी बहुत है
सबको मजबूत किया ऑयर
तेरा मन टूटा भी बहुत है

नवरात्रों में हे आदि शक्ति
तुझे नव रूप में पूजा जाता है
अहसास कराना है जग को
तू भोग्या नहीं जग की माता है
तू मानव उत्पत्ति का मार्ग है
तेरे दूध से होता जीवन संचार है
भटक रहा था नर ,हाथ थाम
उसका, तूने था घर बसाया
जिसका जीवन यायावर था
तुझसे सामाजिक कहलाया

वैदिक युग में तेरी महिमा थी
उसको फिर से पाना होगा
गिरती मानवता को थामने
नारी को मजबूत बनाना होगा
नारी को मजबूत बनाना होगा

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https://ajoshi1967.wordpress.com

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नदारद..

जीवन बन बैठा मशीन है
करुणा ममता भाव नदारद

तेल मसाले सब पैकेट में
मोल लगाते भाव नदारद

कूलर ऐ सी घर घर आ गए
नीम आम की छांव नदारद

सब कुछ मिल जाता टी वी पर
हाट मेलों का चाव नदारद

जाड़ा आया घुस गए घरों में
गलियों के अलाव नदारद

पक्के हो गए गांव गली सब
तोता मैना का गान नदारद

बच्चे बड़े सयाने इस युग में
भोली- मीठी जुबान नदारद

छोटे हो गए बाल नार के
मूँछों के हैं ताव नदारद

भड़कीले अब ब्याह समारोह
आन अदब परिधान नदारद

लूमा लाटी लेडीज संगीत में
बेटी ब्याण की गाळ नदारद

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#गाळ= गाल (गाली) का ठेठ भाषा का अपभ्रंश
कुछ पुरानी परम्पराओं में शादी ब्याह में गाळ गाती थीं महिलाएं समधियों के आगमन पर। चुहलबाजी और मस्ती का वो पुराना तरीका था जो धीरे धीरे आधुनिकता की भेंट चढ़ता गया।

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बेटी

जब घर के आंगन में
खुदाई नेमत बोती है
भाग खुलते है परिजनों के
उस घर मे बेटी होती है

ममता माया और करुणा
पलकों के कोर भिगोती है
प्रतिरूप जन्मता है उनका
उस घर में बेटी होती है

यूँ ही नहीं हो जाती बेटियां
पितरों की आसीस बरसती है
जीवन वैतरणी पार लगाने
उस घर में बेटी होती है

हो संचित जब पुण्य कर्म
लक्ष्मी अनुकंपा बरसाती है
धन धान्य वरदान स्वरूपा
उस घर में बेटी होती है

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“ज़रा ये भी देखते जाओ..”

‘उसको देखते जाओ’,
‘इसकी सुनते जाओ’..
अरे..!!
गृहस्थ क्या बसाया
पग पग पर
आदेशों का साया
नौकरी करें या फिर
मैडम ही को सुनें
इन्हें क्या पता कितने
पापड़ पड़ते हैं बेलने
घर आये नहीं के
मैडम जी
लगती हैं ठेलने
ग्रेजुएट लाये थे तुम्हें
क्या इसी के वास्ते
कभी तो मिला लो यार
जीवन के रास्ते
कुछ काम लो विवेक
मुद्दे खुद ही सुलझाओ
ये नहीं के बात बात पे
‘जा रहे हो तो जाते जाते
ज़रा ये भी देखते जाओ !’
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ऐ दोस्त !

ऐ दोस्त !
साथी बहुत पाए मैंने
पैसे भी बहुत कमाए मैंने
रिश्तों में मगर गरीबी रही
तुझ जैसी बात न बन पाई
कहाँ गए वो दिन भाई
कांधों से हाथ हटता नहीं था
खाना न होता कभी हमारा
पराठा टिफ़िन का जब तक
बँटता नहीं था
पैसों का नहीं कोई किरदार था
जो भी था तो खालिस
हमारा प्यार था
तुम स्कूल नहीं आते उस दिन
मैं खोया खोया रहता था
क्यूँ मित्र मेरा नदारद रहा
मुझे मालूम है ये दर्द
हम दोनों ने ही सहा
तुमने पुष्तैनी काम संभाला
और नौकरी की चाहत में
मेरा हुआ शहर निकाला
व्यस्तताएं बढ़ती गई
रिश्तों पर परतें चढ़ती रहीं
दिल तो दिल है
आज भी एक स्वर में कहता है
बचपन का मुक़ाबिला नहीं
मित्र! तुम सा फिर मिला नहीं

———🌷———-

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हमसे न हो सका

ज़माने भर का दिखावा
हमसे न हो सका

ओढ़ कर बनावट
जी रही है दुनियाँ
दर्द को छुपाकर
बेवजह मुस्कुराना
हमसे न हो सका

जो बात थी दिल में
बेलाग बोल दी
ना को हाँ बनाना
हमसे न हो सका

चापलूसी की दौड़ में
पीछे रहे सदा हम
जय के गीत गाना
हमसे न हो सका

किया जो भी उद्यम
दिल लगाया उसमें
आवरण ही को चमकाना
हमसे न हो सका
———🌷———

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