एक संस्मरण- गांव में फूल चुनने की रस्म:-

कुछ दिन पूर्व अपने रिश्तेदार के “फूल चुनने” की रस्म पर एक गाँव मे जाना पड़ा।
समयानुसार सब कार्यक्रम हुआ और पास की एक नदी में स्नान करके सब लौट गए , मैं भी गृह नगर आ गया ग्रामीण जीवन की ढेर सारी खूबियों के साथ जो नगरों में दिखलाई नही पड़ती।
बारिश के बावजूद कई वृद्ध और युवक रस्म का हिस्सा बने।
मेरे परिचित को न किसी से कुछ कहना पड़ा न दिशा निर्देशन … सब कुछ मशीन की तरह होता गया।
दो उम्रदराज व्यक्ति एक टाट का कपड़ा लेकर अतिरिक्त राख और लकड़ी के कोयलों को हटाने लगे । दो सज्जन सर, सीने और चेहरे की अस्थियों का बारीकी से संग्रहण करने लगे। बताते हैं कि फूल चुनने की प्रक्रिया में मिली अस्थियों में दांत चुनने का बड़ा महत्व है जो गंगा में जाकर विसर्जित होने वाली अस्थियों में शुमार होते हैं।
एक सुनियोजित छपरे के नीचे बनी साफ सुथरी शव दाह वेदिका स्वच्छ करके गो मूत्र छिड़क कर पवित्र किया गया। उसके पश्चात उस पर पुष्प बिखेरे गए। उससे पूर्व दो तीन युवक पास बने हेण्डपम्प से 7-8 बाल्टी और दो मटके पानी भर लाये थे और समस्त जगह को पानी छिड़क कर साफ किया गया था।
एक युवक गोबर ले लाया उससे चिता की जगह को नीपा गया।
एक युवक ताजी हरी ढाब( एक विशेष प्रकार की घास जो पित्र- तर्पण के समय उंगली में पहनी और शिखा में टाँकी जाती है) ले आया उससे अंगूठी नुमा रचना तैयार की गई।
कुछ लोग कंडे जलाकर खीर बनाने में व्यस्त हो गए।
तदुपरांत नीपी हुई जगह पर दो मटके रखे गए जिनपर मालाएं बांधी गईं।
उसके पश्चात पत्तल दोने रखकर उनपर खीर, नमकीन, मिठाई, (यहाँ तक कि चाय भी बनाकर रखी गई।) दीये अगरबत्ती लगाकर उसके पश्चचात घर के सभी सदस्यों ने हाथ मे जल लेकर आचमन किया और मिठाई और खीर अग्नि में जलते हुए कंडों पर घृत डालकर भोग लगाया।
इस प्रकिया के दौरान सबने ढाब की अंगूठी अपनी उंगली में सजाई और जनेऊ निकाल कर हाथ की उंगलियों में अटकाकर सारी रस्म पूरी की।
इसमें देखने वाली बात है कि गाँव के सभी पुरुष जनेऊ निकालकर आराम से समस्त प्रक्रिया दोहराते रहे किंतु जितने भी शहरी थे अधिकांश ने जनेऊ नही पहन रखी थी और बना जनेऊ के ही उन्होने रस्म अदा की।
कहना न होगा कि शहर में बस कर इन्सान ने संस्कारों से दूरी बना ली है जबकि देहात में वो आज भी जिंदा हैं।
शहरों में रस्मों को छोटा भी किया जाता रहा है। गांव में फूल बीनने की रस्म का यह मेरा पहला अनुभव था जो शहरों की तुलना में बड़ा और कदाचित पूर्ण रूप में था।
शायद शहर में इंसानों के पास इतनी देर तक रुकने की फुर्सत नही है इसलिए रस्में छोटी होती गई हैं।
मैंने भी अब जनेऊ पहनने का निर्णय ले लिया है क्योंकि ब्राह्मण परिवार में जन्म लेकर जनेऊ मैं भी नही पहनता।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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