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मेरी कविता- “चंद्र”

नित्य गगन की करो सवारीचन्द्र तुम्हारी बात है न्यारी नया रोज रूप तुम धरतेप्रेम उपासक तुम पर मरतेहै मामा बतलाती महतारीचंद्र तुम्हारी बात है न्यारी लाख सितारे रंग हैं भरतेसारे जगत को जगमग करतेरैन की तुम बिन सूनी अटारीचंद्र तुम्हारी … Continue reading

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