अमरूदों की खेती

गाँव में छोटा सा घर था हमारा। यूँ तो 40 बीघा जमीन हुआ करती थी मगर पीढ़ियों के बँटवारे होते होते अब हमारे हिस्से में 10 बीघा का खेत बचा था। पिताजी ने हल चलाकर मेहनत करके उसी से घर चलाया था। छोटा था, तब परिवार के साथ मिलकर मैं उसमें हाथ बँटाया करता।
गाँव की स्कूल में पढ़ा था मगर मैं बचपन से महत्वाकांक्षी था।
मेरे एक खास सहपाठी के बड़े भाई upsc की परीक्षा पास कर तहसीलदार हो गए थे।
जब कभी गाँव आते तो उनके रुतबे और तरक्की को देखकर मैं भी कुछ बनने का सपना पाले बैठा था।
खूब मेहनत की मगर पारिवारिक परिस्थितियां मुझे हिलाती रहती थी।
शायद मेरे किस्मत के पन्ने पर राज योग न था।
मैं हर जगह असफल रहा ।
विवाह योग्य उम्र थी , मगर बेरोजगारी आड़े आती थी।काम का बोझ बढ़ता जा रहा था। पिताजी बात बात पर खेती के कामों में मेरा मुंह देखने लगते। जवान बेटा था , वो चाहते थे मैं उनके कार्यों में हाथ बँटाऊं मगर मैं खेती से उचटता था।

मगर अब मजबूरी वश में खेत के उस छोटे से टुकड़े की तरफ मुड़ने लगा था । मैं खेत पर जाकर मिटी के ढेले उठाकर जमीन पर मारा करता था। सोचता था अरे ओ खेत क्या तुम मुझे आगे नही बढ़ने दोगे!? तुम चाहते हो पिताजी की तरह मैं भी यहाँ पसीना बिखेरता रहूँ!! और इस 10 बीघा जमीन के टुकड़े में खुद को खपा दूँ!
और इसी तरह…दिन गुजरते रहे।
फिर गांव में एक बार कैश क्रॉप के बारे में समझाने सहकारी समिति की तरफ से मनोनीत एक दल आया। उसने समझाया किस तरह कम लागत पर अमरूद की खेती से अच्छी आमद हो सकती है।
मेरे पास कोई रोजगार न था न आमदनी का कोई जरिया।
मैंने जब तक कुछ और जतन न हो अमरूद की खेती करने का निर्णय लिया और खुद को दांव पर लगाने की ठान ली। और कोई राह भी न थी। बारिश की ऋतु में अमरूद की पौध लगाई गई । धीरे धीरे पौधे बढ़ने लगे। तीन साल में अमरूदों का बगीचा बन गया। इस बार उन पर फूल आने लगे। मेरी आंखों में सपने रंग भरने लगे। कुछ समय मे ही फल की बोराई फूटने लगी। इस बार की सर्दियों में अमरूद का बगीचा शबाब पर था। शहर से ठेकेदारों की टीम फसल का ठेका लेने आने लगी थी।
मैं घर पर खाना खाकर सौया हुआ था। तभी दरवाजे की कुंडी बजी।
दरवाजा खोला तो कुछ व्यापारियों को पाया जो अमरूदों की खरीद की बोली लगाने और सौदा तय करने के उद्देश्य से आये थे।
इस तरह ऊपर नीचे करके 10 लाख में अमरूद उठाने का ठेका हुआ। पेपर वगैरह की खाना पूर्ति के बाद वो लोग चले गए।
मैं हैरत में था। जिस खेत को मैं बेगार समझता था उसने मुझे बहुत कुछ बना दिया था।
अमरूदों से आमद और लोन लेकर मैंने कुछ समय बाद और जमीन खरीद ली। अब कृषि ही मेरा सपना थी और नित रोज उन्नत कृषि के बारे में मंथन मेरी दिनचर्या थी आजीविका थी।

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About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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2 Responses to अमरूदों की खेती

  1. प्रेरक!
    अमरूद से भी कमाया जा सकता है. यहां Horticulture वाले अफसर मुझे कहते रहे पर मैंने पौधे लगाए नहीं. शायद बेरोजगारी का बोझ होता तो करता जरूर…

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