हमारी जुदाई शक्ति

कल रात एक अद्भुत अहसास हुआ । जिसे हम स्वप्न कहते हैं उसे मैं जाग्रत अवस्था मे देख रहा था।
भगवन प्रकट हुए और बोले तुम दुख में सबके काम आते हो । हृदय से सरल हो। मै तुमसे प्रसन्न हूँ बोलो क्या मांगते हो !
मैं हतप्रभ था क्या माँगू फिर जैसे तैसे करके बोला प्रभो भविष्य को जान पाऊँ ऐसी शक्ति दे दो।
प्रभु ने ‘तथास्तु’ कहा और किसी को अपनी शक्ति बताते ही और गलत उपयोग करते ही शक्ति लौट जाएगी बतलाकर अंतर्धान हो गए। मैं बहुत हर्ष और आश्चर्य की मिली जुली अवस्था में था।
मैंने भविष्य में जाकर अपनी मौत की वजह को जानने का प्रयास किया।
मैंने देखा मेरी मृत्यु गले के कैंसर से होनी थी।
साथ ही मैंने देखा मेरे बच्चों को मेरी कोई परवाह न थी। सब मर्जी की करते थे । अपनी बीमारी में मेरी पत्नी के सिवा कोई न था।
मैं घबरा कर उठ बैठा। लेकिन कोई सपना नही टूटा था। मुझमें भविष्य काल को पढ़ने की शक्ति आ गई थी। मैं पूरी चेतन अवस्था के साथ अपनी दिव्य ताकत को जान रहा था। और उसके दुरुपयोग पर उसके लौट जाने के खतरे से भी परिचित था।
अगले दिन से ही मैंने अपनी मृत्यु पर गौर करना शुरू कर दिया। मुझे सिगरेट और गुटखे की आदत थी। मैंने इनकी भयावहता को जान लिया था और इनको हटाने के लिए प्रतिबद्ध हो उठा था।
साल भर में मैंने अपनी इन बुरी आदतों से छुटकारा पा लिया।
मैने अपने बच्चों को सनातन धर्म की महत्ता और हर तरह के श्रेष्ठ संस्कारो की शिक्षा की व्यवस्था की।
मेरी पत्नी जी मेरे परिवर्तन पर हतप्रभ थी मगर मैं उसे भी बता नही सकता था।
मैंने कैंसर की हर वजह को जानकर उससे दूरी बनाने के हर संभव प्रयास किये।
धीरे धीरे मैने अपने परिवार के मार्ग में आने वाली विपत्तियों को जानकर उनका निराकरण आरम्भ कर दिया।
समय बीतता गया मेरी अवस्था बुढ़ाने लगी थी। फिर एक रात देखा यमराज मुझे लेने आ गए।
मैं उठ खड़ा हुआ और बोला प्रभो, मैं कैंसर से मरने वाला था और कैंसर मेरे दूर दूर तक नही है।
आप कैसे ले जा सकते हैं मुझे!
यमराज बोले अमर तो सिर्फ महादेव हैं जो अनादि से अनंत तक हैं अन्यथा जाना तो सभी को पड़ता है। तुम कैंसर से बच गए वरना मुझे बहुत पहले ही आना पड़ता। तुमने अपने पूरे परिवार की विपत्तियों को लगभग दूर कर दिया और महादेव की कृपा से सकुशल जीते चले आ रहे हो। किंतु जाना तो होगा। उन्हीने जैसे ही मेरा हाथ पकड़ा मेरी नींद खुल गई।
मुझमें जैसे ज्ञान का प्रकाश जगमगा उठा था।
अगली सुबह मैंने हाथ जोड़कर प्रभु से तन मन और आत्मा से याचना की। हे प्रभो ! आपकी शक्ति आपको ही समर्पित!
जब जाना ही है तो फिर कैसे प्रपंच !
रही बात विपत्तियों से बचने की तो तुमने मानवता को विवेक दिया है। हम उसका इस्तेमाल करें और विपत्तियों से बचे रहें।
ऐसा लगा जैसे प्रभु ने कहा हो…’तथास्तु’!
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About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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