हालात

उसे बेतरतीब बदहवास और बिखरे हुए कपड़ों में एक अधेड़ सज्जन को काँधे पर थामे किसी गाड़ी की सहायता मांगते देखा तो समझ गया वो उसका करीबी था और स्थिति काफी संवेदनशील थी।
“भैया हाथ जोड़ती हूँ मना मत करना किसी भी अस्पताल ले चलो जल्दी” मामला कोरोना की वजह से बिगड़ा हुआ लगता था। वो बीमार व्यक्ति उनका पति था और उसे श्वास लेने में दिक्कत आ रही थी। पत्नी की हालात देखकर समझा जा सकता था कि उन महिला के लिए जीने मरने का प्रश्न था।
मैंने ऑटो दौड़ा दिया। रास्ते भर महिला सांत्वना देती रही ‘ तुम घबराओ मत कुहू के पापा ठीक हो जाओगे तुम देखना। मैं हूँ ना”
उस महिला के मैं हूँ न शब्दो मे बज्र जैसी कठोरता थी।
जल्दी ही मैं उन्हें सिटी हॉस्पिटल ले गया। खूब भागा दौड़ी के बाद एक ही जवाब मिला’ बेड खाली नही है।”
मैं इस खतरे को भूल गया था कि उन दोनों को कोरोना पॉजिटिव हो सकता था। जो कि लग भी रहा था। अब मैं उनकी मनोदशा और तकलीफ से जुड़ने लगा था
उसके बाद एक के बाद एक कई अस्पतालों के दरवाजे खटखटाते रहे किंतु राहत की सांस कहीं नही मिली। हालात बिगड़ती जा रही थी और महिला ने अब ऑक्सिजन के अभाव में अपने पति के मुंह में मुंह से हवा देना शुरू कर दिया था। अस्त व्यस्त साड़ी में उस महिला को बिखरे हुए बाल और पति को कैसे भी जिंदा बचाने की जिद और तड़प को देखकर मैं अंदर तक हिल गया। आज लग रहा था ईश्वर दिख जाए तो उसे झकझोर डालूँ कि एक पराया इंसां होकर मैं टूट गया लेकिन तू इतना पत्थर कैसे!
और…अंत में उन महिला के पति ने अपनी पत्नी की बाहों में दम तोड़ दिया। मेरी जिंदगी की ये बेहद दर्दनाक और अब तक कि हिला देने वाली घटना थी।
मुझे समझ नही आ रहा था उन महिला को संभालूं या सरे राह हो रही उस दारुण घटना को।
मैं भूल गया कि मैं अपना ऑटो लेकर दो पैसे कमाने निकला था लेकिन दर्द में भीग उठा था।
किसी तरह हम निर्जीव देह लिए उन महिला के घर पहुँचे और रोती बिलखती महिला की बच्ची को साथ लिया।
शहर और हालात की निर्ममता ऐसी थी कि मदद के लिए कोई हाथ आगे नही आया।
मैं आज जिंदगी को कोस रहा था कि जिंदगी पाकर हमे क्या मिला।
मैं इस मानसिक स्थिति में नही था कि उन महिला के ऊपर सारे हालात छोड़कर निकल लूँ।
मेरा एक मानवीय रिश्ता था उस महिला के साथ जो अब तक जुड़ गया था।
मैं उन्हें लेकर सीधे शमशान घाट पहुंचा । बुद्धि जैसे आगे आगे अपने आप काम करती जा रही थी। जैसे मैं ही अब सब कुछ था । उन महिला और बच्ची की करुणा की भीख मांगती आँखों को देखकर पसीज गया था मैं।
मैने ही उनके लिए लकड़ियां खरीदी चिता जमाई और उनका दाह संस्कार करवाया।
आज तीसरा दिन था। मैं उनके घर पहुंचा कुछ खाने पीने का सामान इत्यादि लेकर।
भयंकर महामारी के हालात और ये दर्दनाक मंजर कितना मुश्किल होता है वो भी किसी महानगर में… मानवीयता को जिंदा रख पाना।
कुछ दिन इसी तरह उनकी दवा और भोजन इत्यादि की व्यवस्था में निकल गए । धीरे धीरे उनकी पारिवारिक स्थिति स्पष्ट होती चली गई। उनके नजदीकी रिश्तेदारों में कोई खास न था। जो थे वो फोन पर सांत्वना देकर ही काम चला रहे थे। उनके पति एक प्राइवेट इलेक्ट्रॉनिक कंपनी में कार्यरत थे।
गहरा जुड़ाव हो चुका था मुझे भी…न जाने क्यों!
चुंकि मैं भी अकेला ही था, मेरी संवेदनाएं उनके प्रति गहरी होती चली गई थी। समय गुजरा , हालात कुछ संभलने लगे थे।
फिर मैं एक दिन पूछ बैठा, ‘मुझसे शादी करोगी ?”
उन्होंने बेटी कुहू को बुलाया और सीने से चिपका लिया जैसे कहना चाह रही हों.. मेरे एक बिटिया भी है। संभाल पाओगे दोनों को?


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About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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