तहें..

उस सरल रेखा में कितनी तहें थी
करीब से देखा तो जाना
जिल्द पर मर्यादा का कवर चढ़ाए
उसने औरों को आगे रक्खा
बाबूजी के सपने माँ की शिक्षाएं
भाई बहनों की बिना पर
उसने स्वयं को कवर के नीचे
दब जाने दिया तह बनकर
परिंदों से बेहतर योनि पाई मगर
खुली हवा में अपने तरीक़े से
साँस न ले पाई
स्वयं पर अपनों का अधिकार मानकर
उसने खुद को पीछे रक्खा
आसाढ़ के बादलों की तरह
उसका मन भी घुमड़ता होगा
दिल का पपीहरा उसका
उड़ने को फड़फड़ाता होगा
रिवायतों को आधार मानकर
उसने ज़माने को सर पर रक्खा
जनक, पिया और सुत ने
सीमाएं तय की
मन की तहों को किसने देखा
इन तहों को लक्ष्मण रेखा मानकर
उसने कदम न बाहर रक्खा
————💐———–

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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