वापसी- एक लघु कथा

गांव की सरस्वती नदी के किनारे वाले वट वृक्ष के नीचे मैं अपना खाली समय गुजारा करता था।
अपनी बाँसुरी पर रियाज़ करना, या कोई धुन गाना मुझे अतिप्रिय था।
वय 15-16 की जो जिसमें रम जाए वैसी हो जाये!
लोग आकर खुशी से आग्रह करते मैं कोई धुन गाऊँ।
कुछ तो सपनों की नगरी मुम्बई में जाकर अपनी कला की छाप छोड़ने की बात करते।
भोला मन था, बह उठता था अपने घर पर जब इस तरह की बात रखता तो उपेक्षा का भाव मिलता।

बाबा तो बुढियाने लगे हैं, खेत , ढोर कौन सम्भालेगा
मगर संगीत में कुछ बनने की उत्कंठा तीव्र थी । एक रोज चुपचाप मुम्बई के लिए निकल गया।
मुम्बई उतरा तो एक विशाल समंदर सा महानगर मेरे सामने था।
एक रिक्शावाले को जो कि एकतरफ खड़ा था, अपने मन की बात कहने का मन हुआ।
भाषा से वह मेरे क्षेत्र का लगता था।
। उसने किसी संगीतकार के आफिस में जाकर मिलने मिलाने की बात रखी।
बातों बातों में करीबियां हुई। कुछ उसने कही , कुछ मैंने।
रेन बसेरा उस ही कि कोठरी में हुआ । उस भले रिक्शावाले से काफी नजदीकियां बन गईं थी।
उसका नाम मोहन था।
मैं बहुत उत्साहित था ।
अगले रोज़ मोहन मुझे एक संगीतकार के ऑफिस ले आया। परदेस में वो अनजाना मोहन ही मेरा संबल था।
ऑफिस में मेरा परिचय अंदर तक पहुँचा दिया गया था।
काफी समय पश्चात उन संगीतकार महोदय ने मुझे समय दिया । ज्यादा न कुछ कहते हुए उन्होने मुझसे कहा कि, अच्छा आप बाँसुरी वादक हो, ऐसा करो.. आप परसों आना।

मैं इसे एक मौका समझता या धोखा..
इंतजार के सिवा कुछ न था मेरे तूणीर में ।
मोहन और मैं वापस लौट गए।
दूसरा दिन बेसब्री से गुजरा तीसरे दिन कुलदेवी के हाथ जोड़ फिर लक्ष्य हेतु निकला।
ऑफिस पहुँचकर फिर अपने आने का हेतु समझाया..
उम्मीद से बढ़कर मेरा अभिवादन हुआ।
“क्या नाम बताया अपना…?”
“सुनाओ, क्या सुनाना चाहते हो!”
मैंने अपना नाम बताने के साथ
बाँसुरी निकाल कर अपनी पसंदीदा धुन बजाई
“राधा क्यूँ गोरी..मैं क्यों काला..”

“अरे भाई ये सपनों की दुनिया है कुछ तड़क भड़क सुनाओ।”
अब मैं उन्हें कैसे समझाता बाँसुरी और तड़क भड़क का कोई तारतम्य ही नहीं है।
तर्क करने पर अवसर निकलने का भय था।
” सुर ताल मौसिक़ी कहाँ सीखी आपने..”
गुरुवर, बस ईश्वर आशीर्वाद से लगन और अभ्यास से ही सीखा है।
“चलो, किसी फ़िल्म की धुन सुनाओ।”
मैं बाँसुरी से धुन बजाने लगा।
मिनिट भर सुनने के बाद वो बोले, “अच्छा है, बहुत अच्छा है। ”
बरखुरदार, अपना नाम पता बाहर नोट करवा दो। फिलहाल तो कोई जॉब ऑन फ्लोर है नहीं,
अगर तुम्हारे लायक कोई काम निकला तो हम बुलवा लेंगे।
एक संक्षिप्त साक्षात्कार के बाद मैं बाहर निकल आया।
देर तक इंतजार कराने के बाद सहायक ने मेरा नाम नोट कर लिया ।
मैं रास्ते भर सोचता रहा,
मेरा सुर उन्हें पसंद आया होगा या नहीं आया होगा।
मोहन के ठिकाने पर आकर शाम को विस्तार से चर्चा हुई।
कुछ सहमित्र और चर्चा सुन रहे थे,
उनकी राय थी ” सपनों की दुनिया में
काम मांगने वालों की कमी नही तो काम की भी कमी नहीं , लगातार यहाँ रहकर संघर्ष तो करना ही पड़ेगा। ”
मैं उनकी बातों को बड़े गौर से सुन रहा था , मानो तकदीर का फैसला सुनाया जा रहा हो।
रात कशमकश में गुजरी,
यकीन नहीं था कि काम मिलेगा ही।
कहीं मैं नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर न रह जाऊँ। मेरी दृढ़ता , कच्ची दीवार की तरह ढह रही थी। दूर जाकर माँ के दुलार और आत्मीयता का अहसास हुआ। रह रह कर बाबूजी, , गाँव का खुलापन बुला रहा था। सोचने लगा खेत से अन्न मिलेगा और सरस्वती नदी का दुलार और गाँव भर का प्यार …
बाँसुरी तो सदा है ही साथ ।
तो कमी किस चीज की है। लिप्साओं की तो कमी होती ही नहीं ।
सुबह तक मेरी निष्ठा बदल गई थी। मैंने लौटने का मानस बना लिया था।
शहर आकर मैंने दो बातें अनुभव की।अनजान और बड़े महानगरों में भी मोहन जैसे भले लोगों की कमी नही है।
और दूसरे यह कि शहर भले ही बड़े हो जाएं गाँव का मुकाबिला नहीं कर सकते।
मोहन का अहसान लिए मैं विदा हुआ एक निर्णय ले लिया था मैंने, मोहन के लिए 5 किलो गांव का देशी घी जरूर लेकर आऊँगा, चाहे काम के लिए आऊँ या ना आऊँ ।
और इस तरह मैं गाँव की प्राकृतिक छटा में खुली साँस में अपने बड़े से वट वृक्ष की छाँव में फिर लौट आया था।

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About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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