शहर में तेंदुआ

शहर के एक हिस्से में खास तौर से रात में गहन सन्नाटा बढ़ने लगा था। यह कोई ठिठुरती हुई रातों की वजह से नहीं , ना ही गुंडागर्दी, लूटपाट की वारदातें बढ़ गई थीं.. बल्कि एक तेंदुआ शहर में घुस आया था। तेंदुआ भी ऐसा कि रातों में कभी सड़क तो कभी लोगों के घरों की बालकनी तक में नज़र आने लगा।
शहर के जिस हिस्से में तन्दुए की मजूदगी पाई गई उस हिस्से में अधिकांश आर्मी एरिया है जो कि कांटेदार झाड़ियों और कई किस्म के बड़े वृक्षों से आच्छादित है। इस क्षेत्र के साथ जो भी कॉलोनियाँ लगी हुई हैं उनमें भी खुलेपन की वजह से सघन हरियाली रहती है।
अंधेरे 5 बजे के बाद प्रातः भ्रमण वालों की अच्छी खासी तादाद आर्मी एरिया की उस साफ सुथरी सड़क पर रहती है।
जब से कुछेक ने तेंदुआ देखा तब से वह सड़क सवेरे 8 – 9 बजे तक भी सुनसान रहती है। व्हाट्सअप पर उसकी मौजूदगी के दृश्य डाले जाने लगे।
ऐसे वक्त में अफवाह फैलाने वालों की भी कमी नहीं होती। किसी ने सड़क पार करते शेर की तस्वीरें डाल दीं जबकि तेंदुआ पाया गया था।
मैं सोच कर हैरान रह जाता हूँ आखिर लोगों को गलत बात, गलत सूचना या अफवाह फैलाने से आखिर मिलता क्या होगा? क्या अच्छाई के साथ हमेशा बुराई का होना भी जरूरी है!!
तेंदुए के रात में शिकार के लिए घूमने और दहशत फैलाने की घटनाओं में इजाफा होता चला गया।
उस अर्ध वन्य क्षेत्र से सटे सरकारी बंगलों में तेंदुए के पैरों के निशान नज़र आने लगे उसके बाद तो
अखबारों में भी खबरें बढ़ने लगीं । पूरे इलाके में रात को अघोषित कर्फ्यू के हालात हो गए।
वन विभाग ने एड़ी चोटी का जोर लगा रखा था , पिंजरा लगवाया गया मगर..सफलता का चांद दूर दूर तक नज़र नहीं आ रहा था। उधर सरकारी महकमा भी अब कुम्भकर्णी नींद से जगने को मजबूर हुआ।
पूरा शहर तेंदुए के आगमन पर हैरानी के साथ आक्रोशित भी होता जा रहा था मगर कहीं कोई एक चर्चा नहीं कि आखिर तेंदुआ जंगल जैसा अपना खूबसूरत घर छोड़कर क्यों शहर में भटक रहा होगा ? किसी ने नहीं सोचा होगा जानवरों के घर उजड़ते हैं तब वे भोजन की तलाश में मानव बस्तियों में आने को मजबूर हो जाते हैं। क्या हम रोटी की तलाश में परदेस तक नहीं चले जाते!!
अपना राजी राजी अपना घर आखिर कौन छोड़ना चाहता है!
मनुष्यों की बस्ती में तेंदुए ने आने की हिमाकत तो कर ली है मगर, कितने दिन रुक पायेगा! एक न एक दिन एक छोटी सी धायं करती हुई गोलीनुमा सुई आएगी और उसे बेहोश कर देगी , या फिर किसी जाल में या शिकंजे में खुद को फंसा लेगा,
और इस तरह बेहोशी की हालात में पिंजरे की हद से होते हुए जंगल तक पहुंचा दिया जाएगा। कुछ तो इनका नसीब उल्टे कलयुग में आकर संवर गया है कि ये महज़ बेहोश किये जाते हैं , मारे नहीं जाते वरना अब तक उसकी इहलीला समाप्त हो चुकी होती।
इन जंगली जानवरों को शायद पता नहीं शहरों में वस्त्रों में ढंके छुपे हुए उनसे ज्यादा खूंखार जानवर रहते हैं।
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About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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