आनंदी

आनंदी का प्रलाप जारी था।
रात के सन्नाटे में घर में अपनी मां के पास लेटी लालटेन की मध्दिम रोशनी में आनंदी का दर्द किसी बेलगाम झरने की तरह बह निकला था। असहाय सी उसकी मां के पास सांत्वना और समझाइश के जितने शब्द हो सकते थे अपनी बेटी के साथ बाँट रही थी।
क्या कमी है माँ मुझमे! फिर भी वो मुझसे प्यार नहीं करते। मुझ पर पैसा खर्च कर देते हैं , दवा दारू कपड़े सब ले आते हैं मगर मेरे पास नहीं बैठते ।अश्रुओं की धारा में धारा प्रवाह उसका दर्द बहे जा रहा था। दर्द का क्या है , सही गलत का न्याय नहीं करता दर्द! बस जो सहा न जाये वो दर्द है। कैसे सहती आनंदी अपने मरद का प्यार किसी ‘ और ‘ के साथ बँटते हुए!
मगर माँ समझती थी ..उसको जना तबसे बड़ा किया पाला पोसा, रग रग से वाकिफ थी आनंदी की। मां की जिम्मेदारियों और कार्यकलापों के ठीक उलट आनंदी का घर के काम काज में कभी मन नहीं लगता। ज्यादातर बकत पड़ौस की सहेलियों में गुजारती और बाप के घर घुसने से थोड़ी पहले ही घर में फटका करती। पांच बहनें थी। सारे काम आपस में जमीन जायदाद की तरह बाँट रखे थे। अपने हिस्से का काम तुरत फुरत में निबटाया और दिन लापरवाही के साथ गुजर जाता। दो भाइयों का बड़ा सामूहिक परिवार था, घर में गायें थी। मां चूल्हे चोके से ऊपर नहीं आती। आनंदी बहनों में सबसे बड़ी थी, दिखने में नाक नक्श उजले और तीखे थे ,टैम से हाथ पीले हो गए।
आनंदी का घरवाला सरकारी नौकर था, कुछ सख्त मिजाज था और वक्त का पाबंद था। वक्त के साथ मखौल उसे पसंद न था।वो कहा करता सुबह का काम दुपहर तक दुपहरी के काम रात की हद तक ना फैल पाए। मगर आनंदी के खून में ऐसी बिजली सी फुर्ती तो बिधाता ने ही नहीं भरी थी।
जिस्म का नशा उतरा तो दोनों में मतभेद बढ़ते चले गए। जब स्वभाव मेल नहीं खाते तो शरीर का क्या मोल । ये बात आनंदी अंत तक भी न समझ पाई।और मरद से वैचारिक और दिली तौर पर परे होती चली गई।
आनंदी को यह बात तब ज्यादा खटकती जब उसका आदमी मनिया की तारीफ करता नहीं अघाता।
मनिया , आनंदी की मौसी की बेटी थी जो विधाता के कोप से छोटी उमर में विधवा हो गई। आनंदी के मर्द की नजर में मनिया आदर्श स्त्री का पर्याय थी । रूप में भले आनंदी से अट्ठारह थी मगर उसकी जीवन शैली ऐसी कि किसी को भी मोह ले।
बात बात पर आनंदी का मरद मनिया के उदाहरण देता । वाकई मनिया आदर्श स्त्री की हूबहू नकल थी।
आज आनंदी पीहर में थी। उसके सारे दर्द ,रोष, व्याधियां और जख्म मनिया के रूप में सिमट कर मां के समक्ष उभर आये थे। मां सब समझ रही थी उसका ममत्व छलक कर आनंदी की हर पीड़ा को समूल नष्ट कर देना चाहता था मगर उसे अपना अतीत चिंताओं में घसीट कर खड़ा कर रहा था…काश उसने आनंदी की वीणा के तारों को वक्त पर कसा होता।
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About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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