मेरा खेल-बैडमिंटन ~

छुट्टी का दिन.. और अलसाई सुबह !
कौन सोच सकता है 6 बजे तड़के उठ कर और कुछ नहीं तो टहलने निकला जाए!! मगर मैंने खेल के जरिये इसे अपनाने का विचार बनाया।
मुझे बैडमिंटन खेलने का शौक कॉलेज समय से रहा है! बड़ा मज़ेदार खेल है ये मगर..! इसके लिए मगर चार खिलाड़ी की जरूरत थी।
वो कहावत है ना , मरने पर कांधा देने वाले चार लोग मिल जाएं इतना तो बना कर रखना चाहिए!
मेरे इस शौक को पूरा करने के लिए मुझे खासी मशक्कत करनी पड़ी।
मैं मल्टी सोसाइटी में फ्लैट लेकर अभी हाल ही शिफ्ट हुआ हूँ। बिल्डर ने बैडमिंटन कोर्ट बना कर दिया है तो उसका लाभ क्यूँ न उठाया जाए ! इसी सोच ने मुझे बैडमिंटन जी ओर खींच लिया। बहुत समझाईश हुई इक्के दुक्के लोग चले आने लगे मगर मामला अनियमित था।
मैं इस सप्ताहांत कार्यक्रम को नियमित बनाना चाहता था।
आखिर मैंने अपने सोसाइटी के व्हाट्सअप ग्रुप को अपना जरिया बनाने का विचार किया।
आये दिन ग्रुप में बैडमिंटन के लाभ, डॉक्टर्स द्वारा उस खेल की अनुशंसा और होने वाले विभिन्न रोगों में फायदे का जिक्र आरम्भ किया । मैंने उस पर बताया कि कैसे BP और शुगर में इस खेल से कंट्रोल किया जा सकता है!
कैसे एक घंटे के खेल में 500 कैलोरी बर्न हो जाती है। बॉडी को शेप में लाने और एब्स और मसल्स को शेप देने में बैडमिंटन कारगर जरिया है! मगर लोग भी आसानी से मोटिवेट कहां होते हैं ।
कुल मिलाकर बैडमिंटन की रेल पटरी पर पूरी तरह नहीं आ पाई। संख्या में इज़ाफ़ा नहीं हुआ।
अब प्रलोभन से लुभाने की बारी थी।
मैंने चाय नाश्ते आदि के वहीं पर आयोजन की भी बात रख दी। इसका लाभ हुआ! अब कुछ लोग तशरीफ़ लाने लगे। दो कोर्ट थे। दोनों भरने लगे। बल्कि अब तो वेटिंग लाइन भी आरम्भ हो रही थी। इसका मतलब ये नही कि लोग बस खाने पीने के लिए आगे बढ़ते हैं। हकीकत तो ये थी नाश्ते के बहाने वो लोग एक नए अनुभव का मजा लेने लगे थे।
अब मैंने अलग से बैडमिंटन व्हाट्सअप ग्रुप बनाया। मासिक शुल्क लेने की कवादद शुरू हुई! यहां तक कि पड़ौसी सोसाइटी के लोग भी खेलने के लिए आने लगे। चाय नाश्ते के खर्च भी मैंने मासिक शुल्क से निकलवाया। लोगों को आनंद आने लगा। सोसाइटी में खेल कल्चर आरम्भ हुआ। बड़े लोग सुबह और बच्चे शाम को खेलेंगे।
कुछेक की चर्बी कम हुई तो वो मेरे फिटनेस ब्रांड अम्बेसडर की तरह बन गए । अब तो संडे की जगह सातों दिन का खेल होता है और वर्ष पर्यंत जारी रहता है।
एक चिंगारी थी वो धीरे धीरे ज्वाला बनी और अब याद नहीं रहता कि कब किसी रोज़ सूर्योदय के पश्चात उठना हुआ हो!!
इस खेल ने कइयों की दिनचर्या को बदल दिया है। कुछ तो यहां तक कहते हैं यहां आकर हमें हंसने बोलने को भी मिल रहा है, यह हमारे लिए बड़ी बात है!!
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About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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