-रंगों की रंगोली-
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मैं लेटा हुआ था
पास ही बेटे की टेबल पर
खुसर फुसर हो रही थी
देखा तो पाया
रंगों में बहस चल रही थी
शायद रंगों का बॉक्स
खुला रह गया था
एक दूजे पर रंग उछल रहे थे
कुछ खिले हुए थे
कुछ उबल रहे थे
इतरा कर रंग गुलाबी बोला
‘उनकी’ आंखों में उतर कर
मैं आग लगा देता हूँ
इश्क जगा देता हूँ
काला रंग बोल उठा
‘उसके’ गालों पर जो
काला तिल है
कईयों का उस पर दिल है
हरा बोल उठा
तुम दोनों बाज आओ
इश्क की कैद से निकलकर
बाहर आओ
मैं हरीतिमा बनकर
धरती की शान बढ़ा देता हूँ
खुशहाली का प्रतीक मैं,
सबकी निगाहों में रहता हूँ
लाल कुछ कहता, उससे पहले
सफेद बोला
तुम तो रहने ही दो
जिसकी आंखों में उतर जाते हो
जलजला लाकर ही रहते हो
लाल बोला कुछ भी हो
‘गोरी’ लाल जोड़े में सजती है
तब डोली उसकी उठती है
सुहागिनों का खास रंग
मेरे बिना सब बदरंग
सफेद बोल उठा
मैं सादगी का नाम हूँ
कोई रंग नहीं हूँ
फिर भी गुलफाम हूँ
बारी बारी से नीले, पीले
केसरिया, सबने
अपने गुण बतलाये
सुनते सुनते जब रहा न गया
मैं बोल उठा
जीवन को रंगने वाले
हे भांति भांति के रंगों,
तुम सबसे
जिंदगी खिलती है
उमंग जगती है,
खुशी मिलती है

एक रंग से काम नहीं चलता है
सात रंग को चुनकर
इन्द्रधनुष बनता है
कई रंगों को चुनकर
तितली इठलाती है
रंग बिरंगे वस्त्र पहनकर
नारी बल खाती है
हे रंगों तुम सब महान हो
दुनियाँ की जान हो
अब सो जाओ और
मुझको भी सोने दो

रंगीन सपनों में खोने दो..!!

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#गुलफाम=अत्यंत सुंदर

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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