सहृदयता

अपनी टेबल पर बैठा , मैं अपने आर्डर का इंतज़ार कर रहा था। वो एक रविवार की सुहानी सी शाम थी। छुट्टी का दिन होने की वजह से रेस्तरां में गहमागहमी और दिनों की अपेक्षा अधिक नज़र आ रही थी ।
आये हुए मेहमानों को वेटर, शीघ्रता बरतते हुए खाना परोस रहे थे। तभी मेरी पास वाली टेबल पर जमे सभ्रांंत लग रहे अधेड़ सज्जन ने वेटर को आवाज दी- ‘ ऐ छोरे ! कितनी देर लगाएगा, इधर आ !!’
एक सभ्य से दिखने वाले रेस्तरां में शांत लोगों के बीच मुझे इस तरह की कर्कश आवाज़ और रवैये का ज़रा भी भान नहीं था। मगर अब वक्त बदल गया है। आप वेशभूषा से बेहतर संस्कारी व्यवहार की अपेक्षा  नहीं रख सकते। एक कम उम्र का लड़का जो, टाई लगे होने के बाद भी काफी असहज महसूस कर रहा था, जी सर-जी सर करते हुए उनके समक्ष हाथ बांधे खड़ा हो गया। उन साब ने फिर उसी अंदाज में पुनः उसको झिड़का और वो सहमा हुआ बच्चा (मैं उसे अब आगे बच्चा ही लिखूंगा ) अपने काम में दुगुनी गति से लग गया।
कभी उस अशोभनीय व्यवहार तो कभी उस गरीब पर मैं सोचते हुए बहुत दूर चला गया था।
कुछ देर में भोजन की थाली लग चुकी थी।
बीच में एकाध बार उस बच्चे को बुलाना पड़ा, मैंने और अधिक सहानुभूति दिखाते हुए उसे , बेटे कहकर बुलाया । आत्मीयतापूर्ण व्यवहार के कारण उसके चेहरे पर संतोष और खुशी के मिले जुले भाव थे। उसे इस तरह खुश होकर अपना काम करना मुझे आत्मिक सुख दे रहा था। एक आध निजी सवालों से वो और सहज और प्रिय लगने लगा था।
कहते हैं नौकरों को मुंह नहीं लगाना चाहिए, माना ये सही होगा मगर व्यवहार का संयत होना कब गलत होता है।
भोजन से निवृत्त होकर मैं बाहर निकल आया था । कुछ दूर चला होऊंगा, इतने में वो बच्चा आवाज लगाते हुए दौड़कर मुझ तक आया। ” साब , आप अपना मोबाइल भूल आये थे” , कहकर उसने मुझे मोबाइल लौटाया।
मेरे मन के भाव और अधिक सकारात्मक और गहरे हो चले थे ।  मुझे लगा, सहृदयता का परिणाम मुझे हाथों हाथ मिल गया था।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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