आत्ममुग्धता का नया रूप- ‘सेल्फी’

उस दिन मैं अपनी काम वाली बाई की बात सुनकर सकपका उठा। सुस्ताते हुए दिमाग में कई बिजलियाँ कौंधने लगी।
सुबह सुबह बैडमिंटन खेल कर आया था और अपनी थकान के कारण सोफे में धंसा हुआ था , यकायक काम वाली बाई जी का सवाल..” बाउजी सेल्फी वाला मोबाइल कित्ते में आ जाता होगा ?”
कैमरे की डिमांड अब सेल्फी मोड पर पहुंच गई ! ज़माना बदल रहा है ।
मोबाइल भी अब चारण भाट बन गए हैं।
‘क्लिक क्लिक’ की आवाजों और चमकती हुई फ़्लैश की रोशनी के साथ मोबाइल अब अपने मालिक की जी हजूरी में लगे रहते हैं। एक बार तो विचार आया किशायद सेल्फिश शब्द से ही सेल्फी बना होगा।
एक के बाद एक , कई फोटो रिजेक्ट करवाने के बाद मोबाइल एक फोटो के रूप में वो परिणाम सामने रख ही देता है जिसे हमारी आंखें स्वीकार सके। चेहरे को जाने कितने एंगल से मोड़ना पड़ता है तब जाकर एक सलोनी सी सेल्फी आकार लेती है।
मैंने बाईजी से पूछा, “क्या करोगी सेल्फी फोन का?”
बिना लाग लपेट के वो तपाक से बोली, आप भी साब मजाक करते हो!
सेल्फी से हम अपनी फोटो लेते हैं ना !
मैने कहा, तुम्हारी फोटो तो आपके घर में कोई और भी ले सकता है!
बाईजी बोली, साब , जब इच्छा हो तब खुद के हाथ से फोटो लेने का ही तो मजा है!
हे भगवान! ज़माने से आखिर तू चाहता क्या है?
एक तरफ वक्त की घड़ी के कांटे चैन नहीं ले रहे, घोड़े की तरह सरपट भागते रहते हैं, दूसरी तरफ जवानी बाय बाय करने में लगी रहती है।चाहे पतंजलि की या फिर किसी नामी कंपनी की क्रीम लाओ, बिन बुलाए झुर्रियाँ मेहमान की तरह तैयार हैं।
कोई चक्क नींद से, मन मारकर और उठकर सुबह वाक पर जा रहा है तो कोई जिम…तो कोई पेट को भूखा रख कर कैसे भी अपने युवा अंदाज़ को पकड़े रखना चाहता है मगर बैरी ये बांकपन रोके नहीं रुकता। लेकिन खूब बनाया भगवान तूने ये सेल्फी, ज़माना भी वक्त को टक्कर दे रहा है। उम्रदराज भी खुद को पकी उम्र का मानने को तैयार नहीं है।
कभी कभी अच्छा भी लगता है। चाहे फरेब ही सही, खुद को सदाबहार सुंदर मानकर चलने का भ्रम हमें थोड़ी सी खुशी दे देता है ! यहां तो हंसने के भी लाले हैं। उसके लिए भी 2-4 किलोमीटर चल कर किसी लाफ्टर क्लब का सहारा लेना पड़ता है।
मैंने बाईजी से पूछा, तुम्हें सेल्फी के बारे में किसने बताया? वो बोली, पूरी सोसाइटी में यहां वहां सेल्फी लेती लड़कियां , औरतें और आदमी दिखलाई दे जाते हैं।
कुछ तो होगा न साब इसमे।
समझ नहीं आ रहा था , गरीबी और वक्त की मार झेल रहा उसका चेहरा जरूर श्याह पड़ गया था मगर दिल कचनार था। उसे मैं निराश नहीं करना चाहता था। सबको जीने का हक है। मेरे अंदर का मानव उसे निरुत्साह करने से रोक रहा था। सोचा गलतफहमी सही मगर छोटी छोटी खुशियां जिंदगी को बांधे रखती है। बड़ी खुशी कभी नहीं आती। मैंने कहा, क्या करोगी सेल्फी का!
दो चार पल रुकी फिर हंसते हुए कहने लगी, बस खुद ही देख लेंगे।
भले शिक्षित न हो, गरीबी हो, लेकिन ख्वाब सबके सुनहरे होते हैं। जब सब ओर हवा बदल गई हो तो कौन अछूता रहे! मेरे को बार बार विचारों में खोते देख उसने सोचा , गलत आदमी से सवाल कर लिया।
मैं कुछ बोलता, इससे पहले उसने रुख बदलते कहा, ठीक है हम मैम साब से पूछ लेंगे। उसकी उत्सुकता बता रही थी , वो सेल्फी लिए ही मानेगी।
अरमानों को पूरा कर लेना ही जिंदगी है या बढ़ती इच्छाओं को नियंत्रित करना जीवन की कला है !
अनियमित इच्छाओं और लिप्साओं के पीछे दौड लगाते लगाते जीवन पूरा हो जाता है।
कभी कभी हम अपनी राह से भटक भी जाते हैं।
कोई रोड दुर्घटना में सड़क पर कराह रहा है या बहते हुए तेज पानी में किनारे तक आने के लिए छटपटा रहा है और लोग उसका वीडियो बनाने में व्यस्त थे, ऐसे भी भयावह किस्से सुनने को मिलते हैं। सेल्फी ने कइयों को ऊंची इमारतों, पहाड़ियों, और गाड़ियों से गिरा कर जिंदगी छीन ली लेकिन…क्या फर्क पड़ता है। नशा तो नशा होता है।
सेल्फी ने दिमाग को इतना जड़ बना दिया कि एक बार तो एक मोहतरमा अस्पताल में तीमारदारी करने पहुँची और दर्द में कराहते मरीज के साथ मुस्कुराते हुए सेल्फी ले डाली। क्या करे सेल्फी का धर्म सिर्फ मुस्कुराना है जिसने मानव धर्म को परास्त कर दिया है।

पीछे शांत कमरे से यकायक क्लिक की आवाज आई, देखा तो धर्मपत्नी जी ने अभी अभी सेल्फी ली थी अपनी।
मैंने कोई प्रतिक्रिया न करते हुए और ज्यादा कुछ सोचना छोड़ अखबार उठा लिया।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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