Monthly Archives: September 2017

आत्ममुग्धता का नया रूप- ‘सेल्फी’

उस दिन मैं अपनी काम वाली बाई की बात सुनकर सकपका उठा। सुस्ताते हुए दिमाग में कई बिजलियाँ कौंधने लगी। सुबह सुबह बैडमिंटन खेल कर आया था और अपनी थकान के कारण सोफे में धंसा हुआ था , यकायक काम … Continue reading

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आखिर जीना तो है..

सुनो दोस्तों, खुशियां होती नहीं ! तलाशी जाती है अवसरों के शक्ल में तराशी जाती है कितना सकारात्मक हो चला इंसां खुद को मौके सुझाता है ज़िन्दगी का एक वर्ष हाथ से निकल जाता है और जनम दिन के नाम … Continue reading

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हे वनिते !!

कोरा कागज़ है धवल वस्त्र है नर अवचेतन मन सीधा और पवित्र है है नारी , इतिहास गवाह है हर तीसरा द्वंद तेरी खातिर होता है तुम्हेें न समझने वाला यश वैभव सब खोता है एक विनती है मेरी – … Continue reading

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