सिक्के का दूसरा पहलू

पूरा परिवार दूरदर्शन में ऑंखें गड़ाए कपिल शर्मा के शो में डूबा हुआ था कि अचानक बिजली गुल हो गई।
निराशाओं के स्वर फूटने लगे! कोई ‘धत तेरे की’, कोई ‘मर गए’, कोई ‘ओ तेरी ! ‘…जैसे शब्दों के माध्यम से अपनी हताशा दर्शा रहा था। तलाश किया तो मोमबत्ती नहीं मिली।
बचपन में तो लालटेन तैयार रखते थे माँ पिताजी मगर अब जमाना काफी आगे निकल गया है।
4 लोगों के छोटे से परिवार में कोई क्या क्या देखे!
आखिर में तय हुआ चलो छत पर चला जाए तब तक आ ही जायेगी बिजली।
गाँव से बड़े भाईसाब भाभी जी आये हुए थे।
छत पर अर्से बाद आया था। पूरे शहर की बिजली नदारद थी । हर तरफ अँधेरा.. मगर आसमान टिमटिमाते तारों से जगमगा रहा था। काफी समय के बाद आसमान को इस तरह निहारना अच्छा लग रहा था। मेरा भतीजा आकर पूछने लगा, चाचा देख कर बताओ सप्तऋषि मंडल कहाँ है?
उसका सवाल मुझे झकझोर गया। बचपन लौट आया था । ये सवाल तो कभी मेरा भी हुआ करता था अपनी बहनों से जब हम गर्मियों में छत पर सोया करते थे। तारों की भांति भाँति की काल्पनिक रचनाओं को भी बनाकर निहारा करते थे।
बिजली गुल हुई तो हाल ही के चुनावों में मुद्दा बनी गुल बिजली का जिक्र छिड़ गया। सटी हुई छत पर पड़ौस के तिवारी जी भी दीवार कूद कर आ गए थे, चर्चां से जुड़ने के लिए।
यूपी के चुनावों में बिजली का क्या किरदार रहेगा ये तो परिणाम बताएँगे लेकिन बिजली का गुल होना मुझे जरूर मोह रहा था।
कभी टीवी तो कभी कंप्यूटर और रहा सहा मोबाइल भी समय छीन लेता है। अंदर ही अंदर गुल हुई बिजली को मैं धन्यवाद दे रहा था। रूटीन की लाइफ से कुछ हटकर सबका इकट्ठे होकर बतियाना मन को सुकून पहुंचा रहा था।
आज का सबसे ज्वलंत मुद्दा , जो कि चर्चाओं में आ जाता है और वह है समय का अभाव।
अरे भई, समय तो उसी रफ़्तार से चलता आ रहा है मगर अचरज है हम समय से भी तेज हो गए हैं। साथ साथ चलता हुआ समय, अब ओझल हो जाता है।
भाईसाब किसी सामाजिक कार्यवश आ गए थे तो मिलना हो गया लेकिन उनसे कैसी शिकायत! जब समय का रोना मैं भी रोता हूँ।
बातों का दौर चला । दिल में एक तसल्ली थी कि बिजली गुल होने के बहाने ही सही थोड़ी देर के लिए कृत्रिम जिंदगी से निकल आये थे।

बतियाते हुए भाईसाब विषयांतर होने लगे थे। बीच बीच में तिवारी जी का हूँ का संपुट  दर्शा रहा था इंसान अपने अतीत से कितना लगाव रखता था।
भाईसाब का मत था कि आधुनिक देन मोबाइल सुविधाओं के साथ साथ खोखला भी बना रहा है। कई बीमारियां सिर्फ मोबाइल की देन होता जा रहा है।सर झुकाए मोबाइलरत प्राणी मोबाइल से परे कुछ नहीं सोच रहा। उसकी बैटरी 30 प्रतिशत से नीचे आते ही व्यग्रता देने लगती है।
खबरों और सूचनाओं का आदान प्रदान जरूर तुरत फुरत हो जाती है लेकिन डाकिये का इंतजार और खत की उत्सुकता अब कवियों और साहित्य चर्चाओं में ही मिलेगी।
हर चीज में जल्दी और कम समय में परिणाम ….फिर भी इंसान के पास वक्त नहीं।
तिवारी का समर्थन चर्चा को और अधिक उत्साही बना रहा था।
ये नेट…इस नेट में दुनियां उलझती जा रही है।
क्यों, सही न कहता हूँ बोलो, भाईसाब के इस कथन पर मुझे हां में गर्दन हिलानी ही पड़ी । मैं सोच रहा था जाने कब बिजली आएगी, भाईसाब तो आज टेक्नोलॉजी को रौंधे मानेंगे। मगर हकीकत तो यही थी तकनीक ने मानवता को रौंधना आरम्भ कर दिया है।
उस रात कुछ पल बचपन जैसे गुजरे थे
कोई अहसास था जो छूकर निकला था।
ये दौर कितना अजीब था
जो कहाँ ले आया मुझे।
दे गया बनावटीपन और
छीन ले गया नैसर्गिकता मेरी।

आदतन मैं कुछ शायराना हो चला था ।
अक्सर भावुकता में डूबना अच्छा लगता है। वक्त को पकड़ना चाहता हूँ और बंद मुट्ठी की रेत सा सरक जाता है ये।
फिर एक शोर उठा!
बिजली लौट आई थी। हम अतीत और बचपन से लौट आये थे हकीकत के पथरीले धरातल पर।
सबको रूटीन जिंदगी का दंश बेदने लगा । किसी को रसौई तो किसी को टीवी देखना था।
समय फिर सरपट दौड़ने लगा था…बनावटी सड़क पर…।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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