दरारें

आज शाम अपने किसी ख़ास जन से मुलाक़ात हेतु उनके निवास स्थान तक गया था।
चूंकि वहां अक्सर आना जाना होता है अतः औपचारिकता को कहीं जगह नहीं है।
बैठे हुए टेबल पर एक कार्ड पर नजर पड़ी।
कार्ड विवाह निमंत्रण का था किंतु कुछ अलग सा प्रतीत हो रहा था। जहां हिंदू धर्म में वैवाहिक पत्रिकाएं मुख्यतया रिद्धि सिद्धि के देव और भारत के आराध्य श्री गजानन महाराज के चित्र ,उनके आह्वान और आशीर्वाद के साथ सजी होती हैं उस कार्ड पर ऐसा कुछ नहीं था लेकिन उस पर दो फोटो प्रमुखता से छपे हुए थे। एक गौतम बुद्ध और दुसरे भीमराव अंबेडकर।

New Doc 2017-03-06_1

वैवाहिक निमंत्रण-पत्रिका

पत्रिका के अंदरुनी पृष्ठ पर दृष्टिपात किया तो जय भारत ,जय भीम और नमो बुद्धाय के साथ चिरंजीवी का सौभाग्यवती आदि शब्दावली की जगह उपासक और उपासिका जैसे शब्दों के साथ वर वधु के नाम छपे हुए थे।
पूरे कार्ड में हिन्दू धर्म के देवताओं का कहीं जिक्र नहीं !
आज के आधुनिक परिवेश में कुछ लोग ईश्वरवाद को अलग रख कर अपने ही में जीते हुए देखे जाते हैं। वहां तक समझ आता है किंतु किसी मानव को महामानव के दर्जे से ऊपर ले जाते हुए भगवान् मान लेना तर्कसंगत नहीं लगता। ईश्वर और मानव को क्या समकक्ष रखा जा सकता है?
चूंकि हिन्दू रीतियों से परे हटकर किसी हिन्दू विवाह का कार्ड पहली बार मेरे सम्मुख था, कौतूहल का विषय बन गया था।
दो तीन बंधूवर और भी उपस्थित थे वहां।
चर्चा का अच्छा खासा विषय बन गया था। बहुत देर तक चिंतामग्न होते हुए वैचारिक झझावात मन को उद्वेलित कर रहे थे। आखिर कुछ हिंदुओं को हिंदुत्व से ही ऐसी क्या चिढ़ होने लगी? इस धर्म में ऐसी अपूर्णता कहाँ है जो अलग पंथ बनाकर उसका अनुसरण किया जाने लगे।

नदी से अलग होकर बहने वाली धाराएँ लक्ष्यविहीन होकर भूगर्तों में समाहित हो जाती हैं। किसी एक बिंदु पर जाकर हमें भी सोचना होगा कि खामी धर्म में नहीं तो हम में ही है जो बात यहां तक आ पहुंचती है। हिंदुत्व कोई धर्म ही नहीं अपितु सफल जीवन जीने की एक कला है। जरिया है। हमने जबरन किसी पर हिंदुत्व नहीं लादा।
जिस धर्म की पूजा अर्चना में ही विश्व का कल्याण और धर्म की स्थापना का संकल्प लिया जाता हो उस धर्म से उसी के लोगों का टूटकर विद्रोही हो जाने जैसा कार्य है यह।
अगर मुस्लिम , ईसाई या अन्य संप्रदाय हमारे आराध्य देव गणपति को न मानें वह समझ आता है किंतु हिन्दू ही हिंदुत्व और उसके आराध्य देवों की ऐसी उपेक्षा असहनीय है।
चर्चा में जो बात उभर कर आई उससे ज्ञात हुआ कि कुछेक जगह अनुसूचित जातियां और जन जातियां अब गौतम बुद्ध और भीमराव अंबेडकर को ही भगवान् का दर्जा देने लगी हैं। यहां तक कि महाराष्ट्र समेत कुछ हिस्सों में वैवाहिक रस्मे जैसे अग्नि को साक्ष्य मानकर लिए जाने वाले एक प्रमुख रस्म , सात फेरे भी अंबेडकर प्रतिमा के समक्ष लिए जाने लगे हैं।
किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता उसके देशवासियों के एकीकृत होकर मजबूती प्रदान करने में है किंतु यह sc/st का जहर अब आरक्षण ही नहीं अपितु अपने आराध्य देव और अपना धर्म ही अलग कर चलना चाह रहा है। दशकों से जातियों की आग में सुलग रहा भारत देश अब एक नए युग रहे पंथ का सामना करने जा रहा है ।कमोबेश एक समाज की नई सोच से तो ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। ऐसा क्यों किया जा रहा है समझ से परे है और शोध का विषय भी।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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