ब्राह्मणत्व

जय परशुराम !!
कल ग्रुप में ब्राह्मनत्व को लेकर सवाल उठे।
मैं व्यक्तिगत रूप से इन सवालों को लेकर विचलित हुआ। मेरे जेहन में एक बात आती है। क्या ग्रुप में दम्भ भरकर हम अपनी एकता कायम रख सकते हैं? कुछ बिंदु उठ रहे हैं आपके समक्ष रखता हूँ क्योंकि भाइयों की बात भाइयों के बगैर अधूरी है।

हमारे लिए ऐसा कहा जाता है कि ब्राह्मण कभी एक नहीं रह सकते। क्या यह अतिशयोक्ति पूर्ण सवाल है …या कडुवा मगर सत्यता पूर्ण है?

कभी पार्टी ,कभी जाति तो कभी गौत्र और कभी एक माँ के दो बेटे होकर भी साथ साथ नहीं रह सकते फिर एकता कायम रखने के निश्चय को किस प्रकार साकार कर पायेंगे?
झाँक कर देखें हम…क्या अपने स्वयं के कुनबे को हम बाँध पा रहे हैं? अपनी संतति के वैवाहिक रिश्तों में ही हम संकीर्ण होते हुए गौतम, सनाढ्य पारीक आदि गौत्रों में उतरते चले जाते हैं। क्या हम दृढ़ प्रतिज्ञ हैं कि सर्व ब्राह्मण समाज को रोटी केसाथ ही साथ, बेटी देने के लिए भी समर्थन देते हैं?

एक सवाल ये भी है और समय की मांग भी कि ब्राह्मण होना सर्वोपरि माना जाये या एक राष्ट्र प्रेमी होना !
अगर हम देशभक्त नहीं तो फिर श्रेष्ठ ब्राह्मण भी नहीं हो सकते।
कुछेक की धारणा शायद ऐसी हो गई है कि केसरिया बाना पहनने पर इंसान मोह माया से परे भक्ति मार्ग पर चल देता है। क्या केसरिया पहन कर राष्ट्र भक्ति नहीं की जा सकती?
रामदेव आज जो भी प्रयास कर रहे हैं तो उसे ‘बनिया’ बोलकर नकारा जा रहा है। राम देव गलत हो सकते हैं। क्या उनके प्रयास भी गलत हैं?
विदेशी कंपनियों को भगाना क्या गलत है?
सर्वप्रथम हम एक राष्ट्र -इकाई हैं , उसके बाद हिन्दू हैं उसके बाद ब्राह्मण हैं। अगर इस सच्चाई से मुंह मोड़ा गया तो फिर इस भ्रम को हटा लें कि हम अपना वजूद कायम रख पाएंगे।
आज सुबह शाम की आरती में मंदिरों में 4 ब्राह्मण या कहें हिन्दू इकठ्ठा नहीं हो पाते।
समाज की दुर्दशा कहिये, ढोलक मंजीरे बजाने के लिए मंदिरों में अब मशीनों ने जगह ले ली है।
मैं तारीफ़ करूँगा उस कट्टर कौम की जो जुम्मे की नमाज के बहाने एकत्र होकर अपने समाज को मजबूत करते हैं। एक दूजे के दुःख सुख को बांटते हैं। बेशक वे हमारी विचारधारा के विरुद्ध हैं किन्तु अपनी कौम के लिए समर्पित हैं इसलिए अल्पसंख्यक होकर भी हमसे टक्कर ले रहे हैं।
अपनी अंतरात्मा से पूछें, हम ब्राह्मण हैं महीने में कितनी बार मंदिर जाते हैं?
मैं सुबह शाम जगदीश्वर -आरती ,माँ तुलसी के पूजन और सूर्यदेव को अर्ग देता हूँ , केसर तिलक लगाता हूँ लेकिन इससे ब्राह्मणत्व को बचा लूँगा कोई गारंटी नहीं। मैं जो कर रहा हूँ अपनी तुष्टि के लिए कर रहा हूँ। लेकिन इतना भर पर्याप्त नहीं । हम पहले हिन्दू हैं । ब्राह्मणत्व को पोषित करें लेकिन हिंदुत्व को नकारकर यह संभव कैसे हो?
आज मुस्लिम सम्प्रदाय का खतरा सिर्फ ब्राह्मण को नहीं पूरी हिन्दू कौम को है।
हमें नेताओं ने बांटा है अपने वोटों के लिए। आरक्षण का जहर भर कर। किन्तु आप सोचिये, एक बढ़ई, एक नाई, एक सुनार , एक हरिजन , एक ढोली,एक चर्मकार और अनेकानेक मानव समाज के घटकों के बगैर क्या जीवन यापन संभव हैं?
हिन्दू को वर्ण व्यवस्था के आधार पर बांटा गया ताकि सामाजिक कार्य सुनियोजित चल सकें।
कल रूपेश जी ने सटीक बात कही थी।
ब्राहण कर्म आधारित व्यवस्था का नाम है और हिंदुत्व धर्म आधारित व्यवस्था है।
समंदर को उपेक्षित करके नदी का कोई अस्तित्व नहीं है।
हम अपने कर्म आधारित व्यवस्था हमारे ब्राह्मनतब को मजबूत करें सुरक्षित करें किंतु हिंदुत्व को गौण समझ कर नहीं।
जो फूट जो कमी राजनीति वश हमारे मध्य रख दी गई है हमें उसका मर्म भी अंततः समझना ही होगा।

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About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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