रंग सुनहरे होली के..💦

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होली..!!
किसी के लिए हुड़दंग और किसी के लिए..मस्ती भरा त्यौहार!!
वैदिक काल से हम इस त्यौहार को मनाते आये हैं। बेशक आज हमारे समाज के एक बड़े वर्ग ने इस त्यौहार से थोड़ी सी दूरी बना ली है जिसके कुछ मायने भी हैं , किन्तु इस पारम्परिक पर्व को जिस सोच के साथ आरम्भ किया गया वे सचमुच दूरदर्शिता लिए हुए समाज को एक भाव देने वाली गजब की सोच रही होगी।
मानव समाज का तानाबाना कुछ ऐसा है कि हमारी परिस्थितयां एक जैसी नहीं होती। कही आर्थिक तो कहीं शैक्षणिक स्तर पर हम कही न कहीं औरों से भिन्न हो जाते हैं। कहीं अहंकार तो कहीं कोई भिन्न सोच हमें दूर ले जाता है। होली के रंगों में सराबोर होकर हम सब ‘एक जैसे’ हो जाते हैं।
मानसिक तनाव को ख़त्म कर रिश्तों में आई दूरियों को ये रंग पाट देते हैं।
हमारे सामाजिक दायरे हमें वर्ष भर आदर्श और सभ्यता की परिभाषा में बांधे रखते हैं। स्त्री पुरुष होली के दिन आपस में रंग लगा कर इन दूरियों को क्षणिक रूप से एक तरफ रख कर एकाकार हो जाते हैं। मन के विकार संकेतात्मक स्पर्श के साथ रंगों में घुल कर कहीं गायब हो जाते हैं।
किन्तु कहीं न कहीं इस आजादी का दुरुपयोग भी होने लगा। होली की आढ़ में बुराई , अच्छाई पर अतिक्रमण करने लगी और लोग होली से सहम ने लगे।
समाज को अबीर और गुलाल के साथ होली के रंग दिए गए। कालान्तर में पानी की बौछारों के साथ रंगों में घुलने को भी जोड़ दिया गया। पानी के साथ जुड़ कर इंसान कुछ लहरी और मस्त बन जाता है। यहां तक तो ठीक था किन्तु ये मस्तियाँ कही कहीं सीमायें लांघने लगी । फलस्वरूप लोग किनारा करने लगे।
जहाँ इस पर्व की मस्ती में डूब कर एक रंग हो जाने का सन्देश था, वहीँ लोग प्रतीकात्मक होली को अपनाने लगे।
माथे पर गुलाल का एक टीका या गालों पर चुटकी भर अबीर..और हो गई होली। ये भी कोई होली है।
शोले फ़िल्म का ये संवाद आज भी याद आ जाता है।
लोग रंगों से बिदकने लगे। बढ़ते तनाव के जीवन में ये रंग आपको मस्ती देने की जगह आहात करने लगे।
लेकिन , ये पूर्णतः सच्चाई भी नहीं।
मनाने वाले आज भी मस्ती में डूब कर होली का आनंद लेते हैं । आज मैंने ये महसूस किया।
सुना था गाँवों में होली ज्यादा उन्मुक्त तरीके से मनाई जाती है।
कल देख भी लिया किस तरह एक देहाती क्षेत्र में परिवार, बाहर खुले में उन्मुक्त तरीके से होली के रंगों से सराबोर हो लुफ्त उठा रहा था। खींच तान धक्का मुक्की और पानी की टंकी में गोबर घोल कर बाल्टियां एक दूजे पर उलीचना…
बेशक गोबर का प्रयोग सुनने में गंदा सा लगे किन्तु गाय के गोबर में तो चमत्कारिक औषिधिय गुण होते हैं। । कीचड या अन्य किसी घटिया अवयव से कहीं बेहतर है गाय का गोबर।
एक महिला बड़े से घूंघट में थी,जरूर सम्मुख परिजन सम्मानित रहा होगा किन्तु क्रीड़ा और सम्मान – अदब का वह बेहतरीन उदाहरण था।
जल मिश्रित रंग उछल वहां रहे थे भीग मैं रहा था।
कुछ भी कहो, लाख बदनामियों के बाद भी होली को दिलों में आज भी उतनी ही जगह मिलती है जितना हक़ बनता है।
नहीं खेलने वाले इस त्यौहार पर स्वयं को चारदीवारी में बंद करके कुढ़ते हैं और दरवाजों की झिर्रियों से देखते हैं रंगों में डूबी दुनियाँ को.. दिल तो उनका भी करता होगा साहिब, लेकिन क्या करें, दिमाग के परदे बीच में आ जाते हैं।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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