अपने रंगों के साथ न्याय कीजिये ! 🎨

प्रकृति ने अजब सुहाने रंग बिखेरे हैं। कुछ वो जो कुदरत स्वयं ओढ़े बैठी है और कुछ वो, जो मानव फितरत में समाये रहते हैं। रंग जो हिना की तरह शनै शनै गहराते हैं। वे रंग जो यूँ ही छूटते नहीं..जूनून के रंग कहलाते हैं। दीवाना बना देते हैं ये रंग!! होली तो प्रतीकात्मक पर्व है चटक रंगों का। हम तो नित रोज नहाये रहते हैं स्वाभाविक रंगों से। प्यार , द्वेष, कला, भक्ति, क्रीड़ा, सत्कर्म, और ज्ञानार्जन के सतरंगी रंग हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं। इनका आधिक्य ही जूनून है।
जूनून चढ़ता है तो सर चढ़ के बोलता है।
जूनून वय नहीं देखता । परिस्थितियां नहीं समझता ! जाने क्या कुछ हो गुजरता है और.. दिल किसी रौ में बहने लगता है।

जूनून …! बावरे मन की एक अद्भुत स्थिति !! आइये कुछेक रंगों का स्मरण करें।

भक्तिरंग~ ‘बावरे’ शब्द से मीरा का कृष्ण के प्रति बावरापन अनायास ही याद आ जाता है।
राजपरिवार से ताल्लुक रखने वाली मीरा मेड़ता अपना पीहर छोड़ मेवाड़ के उदयपुर विवाह होकर पधारीं। किन्तु अपने मान , पद और गरिमा की परवाह किये बगैर दोनों हाथ उठाये ठाकुर जी श्री कृष्ण की पुकार में खोयी रहती थी ।
ऐसे ही संत रैदास थे। कर्म से चर्मकार, रैदास भी श्री कृष्णा के अनन्य भक्त थे। नरसी भगत भी कृष्णा भक्ति के रंग में ऐसे डूबे रहते कि उन्हें स्वयं की सुध न रहती। कृष्णा प्रेम में आकंठ डूबे हुए संत नरसी जी अअपने सुख – दुःख सब श्री कृष्ण को अर्पण कर देते।
नरसी जी की भानजी , नानी बाई का मायरा(शादी पूर्व एक रस्म जिसमे मामा भेंट स्वरूप वस्त्राभूषण आदि लेकर बहन के घर पहुँचता है) भरने श्री कृष्ण पहुँच गए थे। क्योंकि कृष्ण रंग में डूबे हुए नरसी जी निर्धनता वश मायरा भर पाने में अक्षम थे। भक्त की पीड़ा को भगवान् ने वहन कर लिया। यह धार्मिक और प्रेमरस से ओतप्रोत कथा आज भी ह्रदय विहलता के साथ सुनी सुनाई जाती है।
महाभारत काल में गुरु द्रौण और एकलव्य का वृत्तांत जूनून की अनूठी गाथा कहता है।
एकलव्य के उस पागलपन और निष्ठा के रंग से घबरा कर द्रोण ने एकलव्य से सीधे हाथ का अंगूठा मांग कर अपना भय सामने रख दिया था।

प्रेमरंग~ जूनून में डूबे रहने के अनेकानेक किस्से मिलते हैं ।
किशोर वय को पार करते हुए प्यार की लहरों पर अठखेलियाँ ..अनंत विषय है , किन्तु गाम्भीर्य और उम्र के परीपक्व पड़ाव में भी प्रेमरस अपनी महत्ता को खोने नहीं देता। प्रेमरस पर साहित्य भरा पड़ा है। कालीदास रचित अभिज्ञान शाकुन्तलम् प्रेमरस का महाकाव्य माना जा सकता है। श्री कृष्ण जी और राधा , गोपिकाएँ और ग्वाल बाल, सुदामा जी यहां तक कि मूक प्राणी जैसे गैयाएं प्रेमरस के महारास के अनंत पात्र बन गए हैं और रहेंगे।

तप और जूनून~ पौराणिक कथाओं में कई दृष्टान्त आते हैं जब सुर- असुर साधक अमरत्व की चाह में घोर साधनाओं में लीन होकर इंद्रदेव का आसन हिला देते थे।
विश्वामित्र की तपस्या को खंडित करने रम्भा अप्सरा को भेज तपस्वी को पथ भ्रमित करना , इंद्र के भय और जूनून की ताकत की व्याख्या करता है।
महापंडित रावण ने मृत्यु और काल को वश में करने का जूनून लेकर भगवान् शिव को अपनी तपस्या से प्रसन्न कर इच्छित वरदान प्राप्त कर लिए थे।

आप अपनी चाहत को जूनून में बदल कर पराकाष्ठा को छूते हैं तो स्वयं ही जान लेते हैं जो आनंद कहा नहीं सिर्फ महसूस किया जाता है।
अंग्रेजी में एक कहावत है-
Master of none but Jack of all.
लेकिन मैं इस कहावत से किंचित सहमत नहीं !!
एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाय..
दुनियां और चाहतें अपरिमित हैं। बार बार ध्येय और पाले बदलने से लक्ष्य बिखर जाते हैं।
एक लक्ष्य ही, जूनून का रंगरेज़ बनता है। उसे सर्वस्व नव और इच्छितरूप दे पाता है।
मेरा अपना किस्सा है जब एक बार निद्रागत , स्वप्न में मेरे मस्तिष्क को एक विचार झकझोर रहा था। काफी जद्दोजहज से भरा हुआ वो विषय मुझे बैचेन कर गया और मेरी आँख खुल गई। मैंने उसे ब्लॉग में उतारने का मानस बना लिया। अगर भौर का इन्तजार करता तो संभव है विचार बिखर जाता। मैंने उसे तुरंत कलमबद्ध कर लेने का मानस कर लिया।
पत्नी जी ने जब देखा तो उनकी हैरानी बढ़ना स्वाभाविक थी। जाने किस को प्रेम पत्र लिखा जा रहा हो !!
उन्होंने जब टटोला तो एक बारगी माथा पकड़ लिया। ‘जूनून क्या क्या करवाता है ‘ कह कर वे तो सो गईं लेकिन सच ही वह जूनून का रंग था जो दो घंटे के श्रम में मुझे अपने ब्लॉग को एक नया लेख दे गया था।
सचमुच आनंद अंतर्निहित है । कभी खुद ही में खो कर देखिये। किसी रोज अपना दिन कोई अपनी रात , अपने जूनून या ख़्वाब के नाम कीजिये। उसमे डूब जाइये । फिर उसका सुख महसूस करिये।
आनंद बाहर नहीं……भीतर है।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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