प्रभात फेरी

“हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे”……
भोर के करीब 5 बजे का वक्त…रात भर की नौकरी के पश्चात जब एक स्टेशन पर गाडी खड़ी हुई तो मैं अपने डिब्बे में बैठा हुआ अलसा रहा था। जिस स्टेशन पर गाड़ी खड़ी थी वह बोहरा समुदाय की बहुलता वाला एक छोटा कस्बा था, और वहां हिन्दू धार्मिक गतिविधि चौकाने वाली थी।
स्टेशन से ही सटा हुआ बाजार..और कुछ धार्मिक युवक यवतियाँ और अधेड़ हो चले कुछ लोग प्रभात फेरी करते हुए चले आ रहे थे। ज्यों ज्यों करीब आ रहे थे ,वाद्ययंत्रों की ताल के साथ महामंत्र का उनका उच्चारण बढ़ता हुआ स्पष्ठ सुनाई देने लगा था। एक ने तबला वाद्य अपने गले में लटका रखा था। कुछेक मंजीरे बजाते हुए चल रहे थे। और फिर वे पास की एक गली में घूम गए। सुबह की ठंडी हवा और शांत वातावरण में उनका सामूहिक उच्चारण मुझे अपनी ओर खींच ले गया था।
मैं सुस्ती के आवरण से लगभग बाहर निकल आया था। सुबह सुबह का तेजोमय वातावरण मन मष्तिष्क को नई चेतना उपलब्ध करवाता है और इसे ईश वंदना से जोड़ कर अनुभूत किया जाये तो आनंद की सीमा बढ़ जाती है। कम से कम मैं तो यही सोचता हूँ।
बचपन में गाँव में कई बार प्रभात फेरियों को निकलते गाते देखा था।आज बहुत समय बाद अतीत की यादें ताजा हो गईं।
शब्दों पर गौर करें तो यहाँ प्रभात से तात्पर्य सुबह का 4 बजे के उपरान्त का समय और फेरी से तात्पर्य घूमना या फेरी लगाना।

 

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सिख समुदाय द्वारा निकाली गई एक प्रभात फेरी का दृश्य

प्रभात फेरियों का चलन सिख समुदाय में ज्यादा देखने को मिलता है जब सिख संगत गुरुपर्व आने से पूर्व , घूम घूम कर गाते हुए अपने गुरु महिमा का बखान करते हैं। ईश्वर और अपने गुरु का स्मरण करने के लिए प्रभात का वक्त सबसे उत्तम माना जाता है..जब रात भर की विश्रांति के बाद हम तरोताजा महसूस करते हैं। सुबह अँधेरे से लेकर सूर्योदय तक का समय सकारात्मक ऊर्जा लिए होता है। इस समय काल में हमारी मनोस्थिति और सोचने समझने की क्षमता अत्यधिक जाग्रत और ऊर्जावान रहती है।
प्रभात फेरी का मनोवैज्ञानिक पहलू यह भी हो सकता है कि हम मनुष्य समाज को प्रेरित करें , ‘..नया दिन आ रहा है और विश्रांति के बाद अब आप निद्रा त्याग कर उठ खड़े हों और ईश स्मरण के साथ अपने नव दिवस का आरम्भ करें। ‘
अमूमन देखने में आता है कि यदि कोई कार्य न हो तो प्रातकाल में हम उठने में सुस्ती के साथ विलम्ब कर देते हैं और इस तरह दिन की शुरुवात लेट लतीफी से होती है।
जल्दी उठने वाला व्यक्ति न केवल स्वाथ्य लाभ ले पाता है बल्कि अपना बहुत सारा समय व्यर्थ होने से बचा लेता है।
एक संतुलित जीवन के लिए कुछ समय का अध्यात्म और शारीरिक व्यायाम भी आवश्यक हैं।
और प्रभात का समय इसके लिए सर्वोत्तम है। प्रभात में ईश्वर का स्मरण करने से हमारी मानसिकता पुष्ट होती है और आत्मबल बढ़ाती है।
आधुनिक जीवन की दिनचर्या ही कुछ ऐसी है कि हम रात्रि में विलम्ब से सोते हैं और उठना भी फलतः देरी से हो पाता है।
हाल ही में जर्मनी में हुए एक शोध के द्वारा पता चला है कि,जो लोग स्वाभाविक तौर पर देर से उठते हैं उनके मस्तिष्क में व्हाइट मैटर सबसे बुरी स्थिति में होता है, विशेष रूप से दिमाग के ‌उस हिस्से में जहां से अवसाद और दुख के भाव पैदा होते हैं।
यही वजह है कि देर से उठने वाले लोगों को अवसाद और तनाव अधिक होता है।
प्रभात फेरियां, जाग्रत व्यक्तियों का वो समूह कहा जा सकता है जो समाज के लिए हरकारे का कार्य करता है उन्हें प्रेरित करता है जल्दी उठने के लिए,
प्रभु स्मरण के लिए और अनेकानेक परोक्ष लाभ जो, सूर्यदेव के आगमन में स्वगतोन्मुख प्रकृति, मनुष्यों को तात्कालिक समय के लिए उपलब्ध कराती है।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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