देश और राजनितिक हालात-एक जायजा

आखिर ऐसा भी क्या है जो देश में जब से बीजेपी की सरकार बनी तब से राजनितिक तूफ़ान सा उठ खड़ा हुआ है।
एक खबर का मूल्यांकन नहीं होता कि दूसरी नई खबर आ जाती है? ख़बरों का सफरनामा तो चलता ही है। किन्तु ख़बरें भी ऐसी की ग़दर मचा कर रख दे। किसी सिनेमाई पटकथा की तरह तेजी से उभरते दृश्य और एक घटना पूरी होते होते कोई नया सिरा आरम्भ…! समझ नहीं आ रहा, अब ही अब देश को क्या हो उठा है!!
कहाँ चूक हुई है?
देश के आम नागरिक ने गले तक घोटालों में आकंठ डूबी सरकार से परेशान होकर विकल्प के तौर पर बीजेपी को चुना। लेकिन जब से मोदी PM बने हैं तब से अब तक का देश का रास्ता कंटकाकीर्ण हो चला है। नित नए आरोप सरकार पर मढ़े जाते हैं। कहते हैं सच्चाई को दबाया तो जा सकता है पर मिटाया नहीं जा सकता। सरकार की भूमिका ऐसी हो गई है कि सफाई दे और न दे ….दोनों ही परिस्थितियों में ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ ।
देश की न्यायपालिका हो या खोजी पत्रकारिता या फिर जांच और सुरक्षा एजेंसियां सभी संदेह के घेरे में आ गई हैं।
दिल्ली में राज्य सरकार और केंद्रीय सरकार के मध्य खींचतान एक सर दर्द बन गई है। राज्यपाल और मुख मंत्री की झड़पें क्या शालीनता के दायरे में आती हैं ? राजनीति भी जैसे 20-20 का मैच बन गई है। हर बॉल पर खिलाड़ी सिक्स लगाना छह रहे हैं।
मोदी भी कभी कभी ‘मौनी बाबा’ की तरह रहस्यमयी हो चले हैं। कभी लगता है वो सभी आरोपों के जवाब अपने कार्यकलापों से देकर सभी के मुंह बंद कर देंगे। उनके कार्य तथाकथित सेकुलरवादियों के गाल पर तमाचा साबित होंगे।
लेकिन कभी संदेह भी हो जाता है।
देश में कई बार गृह युद्ध जैसे हालात हो जाते हैं। कभी जातिवाद के नाम पर तो कभी राष्ट्र प्रेम को ही निशाने पर लिया जा रहा है।
ये ऐसे संवेदनशील मुद्दे हैं जिनके साथ छेड़छाड़ एक घोर अपराध सरीखा है।
मिडिया का व्यवहार बेलगाम घोड़े के सृदश हो गया है। अंधी दौड़ में सभी न्यूज रूम अविवेकी  और अधीर हो गए हैं। कन्हैया के मुद्दे को ही लीजिये। जांच एजेंसियों के द्वारा मामले की छानबीन तक का धैर्य किसी को नहीं। सब के सब CBI बन रहे हैं और अपने अपने निर्णय सुना रहे हैं। नहीं कह रहा तो बस पीएमओ ही कुछ नहीं कह रहा!!
सोच का विषय यह भी है कि वो कौन लोग थे जो देश के खिलाफ नारेबाजी के संगीन अपराध को अंजाम दे रहे थे। कन्हैया अगर निरपराधी था तो उन लोगों के मध्य क्यों था? वामपंथियों के क्षेत्र से कोसों दूर JNU में मार्क्सवाद क्यों हावी है। क्यों अंततः वहां पढ़ने वाले छात्र को लाल सलाम का सहारा लेना पड़ता है? इंदिरागांधी ने अपने पिता की याद में 1969 में JNU की स्थापना की थी इस लिहाज से वहां कांग्रेस विचारधारा को बल मिलना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं है।
छात्रों और युनिवर्सिटी की कक्षाओं और गलियारों से होता हुआ राष्ट्र विरोधी जहर बहा है। वो भी राजधानी में। हमारे छात्र रुपी भविष्य के साथ यह सोची समझी छेड़छाड़ है। हमें सतर्क रहना होगा। इस फन को यहीं कुचलना होगा।
दूसरी ओर, आरक्षण का मुद्दा इस बार नए बिल से सांप बन कर देश को डसने निकल पड़ा है। देश भर की धमनियां कही जाने वाली रेलें फिर आरक्षण की शिकार हुई हैं। 600 ट्रेनें रद्द हुई हैं। पूरा विश्व हमारी इस विवशता पर हँसता तो होगा। जाती धर्म, आरक्षण में उलझा हुआ देश किस तरह विश्व में अपनी पहचान बनाये !!
अगर आज ये मान लिया जाये कि बीजेपी से देश नहीं संभल रहा तो क्या देश के पास इसका विकल्प है? कौनसा ऐसा दल है जिस पर विश्वास कायम किया जा सके!!
अगर कोई कांग्रेस में पुनः यकीन करता है तो यह पुनः आत्मघाती होगा।
आज राष्ट्र प्रेम में घोर कमी का अहसास होने लगा है। तो क्या हम अवसरवादी हो गए हैं? या फिर हमारी स्कूली शिक्षा में ही कहीं कोई कमी है? निश्चित ही वक्त है हम पुनर्विचार करें कि चूक कहाँ हो रही है और इतना ही नहीं उसका समाधान क्या है यह भी खोज कर निकालना होगा !
वरना आने वाली पीढ़ियां हमें माफ़ नहीं करेगी।
——————————————–

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
This entry was posted in Uncategorized. Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s