त्रिनेत्र गणेश जी और रणथम्भौर का दुर्ग !

DSC_0210

 

कल मुझे एक धार्मिक यात्रा का सौभाग्य मिला।
यात्रा, गजानन जी के दर्शनार्थ धार्मिक उद्देश्य से की गई थी किन्तु जब रंथम्जभौर दुर्ग के साथ उसके जुड़ाव और अन्य ऐतिहासिक धरोहरों के बारे में संज्ञान हुआ तो मन संतुस्ट भी हुआ और गौरवान्वित भी !

Screenshot_2016-02-11-11-46-09

दुर्ग का मुख्य द्वार- नवलखा द्वार

दुर्ग भी ऐसा कि यूनेस्को द्वारा वैश्विक धरोहर का दर्जा प्राप्त है !!
सवाई माधोपुर रेलवे स्टेशन से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यह दुर्ग। इसके तीनो और पहाडों में प्राकृतिक खाई बनी है जो इस किले की सुरक्षा को मजबूत कर अजेय बनाती है।
तत्कालीन शासक ऐसी सुरक्षित जगह पर अपने किलों के निर्माण को अहमियत देते थे। मध्य काल का वो ऐसा समय था जब हिन्दू  शासक अपनी आन बान के लिये जाने जाते थे वहीँ दूसरी और विदेशी आक्रांता चारित्रिक हननता की सभी सीमायें लांघ जाने वाले नर संहारी ! रणथम्भौर दुर्ग ने भी बहुत आक्रमण झेले। राणा हम्मीर राजस्थान के राजपूत इतिहास में देदीप्यमान सितारे की तरह दमकते हैं जिन्होंने धर्म और प्रजा को जान से ज्यादा तरजीह दी। इस दुर्ग की सबसे ज्यादा ख्याति हम्मीर देव के शासन काल मे रही | वह इस किले का स्वर्णिम युग था।

हमीर ने अलाउद्दीन ख़िलजी से बगावत कर भागे मुहम्मद शाह को शरण दी थी और शरणागत को सौंपने से इन्कार कर दिया।नतीजतन ख़िलज़ी की सेना ने किले को घेर लिया । चौहानों ने खुद को युद्ध में झौंक दिया। धर्मान्धता से विषाक्त उस युग में जब मुस्लिम आतताई लाखों निर्दोष हिन्दुओं को मौत के घाट उतार देते थे,राणा ने मुस्लिम शरणागत की रक्षा में अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
गौरी से हारने के बाद दिल्ली की सत्ता पर पृथ्वीराज चौहान का अंत हो गया था । तदुपरांत उनके पुत्र गोविन्द राज ने रणथंभोर को अपनी राजधानी बनाया। गोविन्द राज के अलावा वाल्हण देव, प्रहलादन, वीरनारायण, वाग्भट्ट, नाहर देव, जैमेत्र सिंह, हम्मीरदेव, महाराणा कुम्भा, राणा सांगा, शेरशाह सुरी, अल्लाऊदीन खिलजी, राव सुरजन हाड़ा और मुगलों के अलावा आमेर के राजाओं आदि का समय-समय पर नियंत्रण रहा। एक शताब्दी तक ये दुर्ग चितौड़ के महराणाओ के अधिकार मे भी रहा। किले का निर्माण कब हुआ कहा नहीं जा सकता लेकिन ज्यादातर इतिहासकार इस दुर्ग का निर्माण चौहान राजा रणथंबन देव द्वारा ९४४ में निर्मित मानते है, इस किले का अधिकांश निर्माण कार्य चौहान राजाओं के शासन काल में ही हुआ ।
किलों में राजा मंदिरों और तालाबों का भी निर्माण करवाया करते थे। रणथम्भौर किले में माँ कंकाली , शिव और श्री गणेश के मंदिर स्थित हैं और आज भी काफी मान्यता रखते हैं।

IMG-20160211-WA0032.jpg

त्रिनेत्र गणेश जी

 

दुर्ग में पिछले बाग़ में स्थित मंदिर के त्रिनेत्र गणेश जी राजस्थान सहित कई राज्यों में लोक आस्था के केंद्र हैं। मंदिर के पीछे गहरी खाई है। खड़ी चट्टानों पर बना यह दुर्ग अजेय माना जाता था।
आज यह दुर्ग , भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है तथा रणथम्भौर अभ्यारण्य में आता है। शायद यही वजह है कि मंदिर तक पहुँचने वाले मार्ग और मंदिर परिसर में यात्री सुविधा के नाम से किसी तरह का कोई अतिरिक्त निर्माण नहीं किया जा सका है। संभवतया ये मंदिर वर्ल्ड हेरिटेज और पुरातत्व विभाग के दायरे में न आता तो मंदिर का अब तक ट्रस्ट बन चुका होता।
इसी के चलते न यहां कोई विद्युत व्यवस्था है ना ही दूरसंचार के साधन!!
किले के मुख्य द्वार तक पहुँचने का मार्ग घने वृक्षों से आच्छादित है। रणथम्भौर के जंगल में खूब पक्षी,  साम्भर, चीतल ,जंगली सूअर, सियार,बन्दर ,और किस्मत हो तो बाघ -तेंदुए भी दिखाई दे जाते हैँ।
हमारा पूरा एक ग्रुप था जो किले तक एक खुली गाडी से पहुंचा और तदुपरांत दुर्गम चढ़ाई वाले मार्ग को पार करते हुए देवालय तक पहुंचा।

IMG-20160210-WA0084.jpg

विघ्नहर्ता को प्रसाद का भोग लगाने के लिए जाते हुए समस्त बंधु

 

भोजन आदि व्यवस्था के लिए भाड़े के मजदूरों के द्वारा रसद और पानी ऊपर तक ले जाया गया। साथ ही एक महाराज की व्यवस्था थी जो हमें इन कार्यों से मुक्त रखे और लजीज भोजन(दाल बाटी चूरमा) तैयार कर के उपलब्ध कराये।
बुधवार श्री गजानन जी का दिन होता है फलस्वरूप यात्रियों और वाहनों की काफी रेलमपेल थी। संकड़े मार्ग और सड़क अनुशासन को उपेक्षित करके चलने वाले वाहनों के चलते हमारा काफी समय व्यर्थ हो गया था ।IMG-20160211-WA0028.jpg

पूरे किले और मंदिर के आस पास काफी लंगूर हैं ।
धार्मिक आस्थावानों के चलते मंदिर के आसपास का पूरा वन क्षेत्र लंगूरों से भरा पड़ा है। दर्शनार्थी चने और अनाज आदि लेकर आते हैं।
मंदिर के बाहर कई अस्थाई दुकानें हैं। जिनमे नारियल माला प्रसाद आदि उपलब्ध रहता है। हर धार्मिक स्थानों की तरह यहाँ भी वही नज़ारे..महंगे दामों पर प्रसाद का विक्रय और दुकानदारों में खरीदारों को अपना माल बेचने की होड़..! शायद धार्मिक महत्ता ही है कि पुरातत्व विभाग वालों ने इन सबको यहाँ अनुमत किया हो !

DSC_0038_2

दुर्ग के एक द्वार के साथ पिक लेकर हमने खुद को गौरवान्वित महसूस किया

 

दर्शनादि के पश्चात हमने किले के वन विहार का आनंद लिया।किस तरह किले के प्राचीरों का निर्माण करते वक्त सामरिक दृष्टीकोण को ध्यान में रखा जाता था यह दृष्टीगोचर हो रहा था। बड़े बड़े दरवाजे संभवतः हाथियों और रथों के आवागमन की वजह से बनाये जाते थे। आज तक उन लकड़ी के विशाल दरवाजों और उनमे जड़े लोहे के कील देख उन कारीगरों को धन्यवाद देने का मन होता है जिन्होंने कड़ी मेहनत और कौशल्य से इनको तैयार किया होगा।

चारों ओर सघन वन और उनके बीच पहाड़ों की खड़ी चट्टानों पर सीना ताने खड़ा ऐतिहासिक दुर्ग!

IMG-20160211-WA0014.jpg

ऐसी जगह के भ्रमण के वक्त समय जैसे थम ही नहीं जाता अपितु पीछे की ओर लिए जाया है कि आज वीरान पड़ा ये किला किस तरह सुरक्षा पहरेदारों के साये में रहता होगा ! प्राचीर की चारदीवारी पर घोड़ों की टपटप आवाजें और जगह जगह अपनी नियत जगहों पर जलती हुई मशालें। शत्रु जाने कब आ धमके ! हर प्रहर प्रहरियों की चौकस निगाहें दुर्ग को जाग्रत अवस्था में रखती होंगी।

यहाँ के राजपूत शासक जरूर स्थापित गणपति जी की आराधना के बाद ही अपने ध्येय को पूरा करने निकलते होंगे और उन्हें सफलता और विजय श्री मिलती ही होगी। यूँ ही तो विख्यात न हुए होंगे रणथम्भौर के त्रिनेत्र गणेश जी!!
दुर्ग अभ्यारण्य की परिसीमा में आता है और सायंकाल के पश्चात यहाँ रुकने की मनाही है। घने जंगल  और मौन दुर्ग की नीरवता पैरों को थाम रही थी ।वैसे भी गजानन दर्शनलाभ का ही हेतु लेकर आये थे, अल्प समय में दुर्ग को पूरी तरह से देख समझ पाना नामुमकिन था। लौटते वक्त जैसे दिल वहीं अटका रह गया। अतीत में खोया जैसे कह रहा हो, “अभी न जाओ लौट कर..के दिल अभी भरा नहीं….”

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
This entry was posted in Uncategorized. Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s