ज़िन्दगी की पाठशाला का मुख्य शिक्षक~समय

उपरोक्त शीर्षक पढ़कर निश्चित ही आपका ध्यान समय की ओर गया होगा। समय पर ध्यान देना ही पड़ता है । नहीं दिया तो समय-देव, आपको बख्शेंगे नहीं!!
बड़ा अद्भुत संयोग है.. ज़िन्दगी और वक्त!
ज़िन्दगी बार बार नहीं आती उसी तरह गुज़रा वक्त भी नहीं लौट कर आता है।
हम अक्सर अपने बचपन को याद करते हैं, और अतीत में खो जाते हैं। इस लिहाज से यादों को ‘ताकतवर’ की संज्ञा दी जानी चाहिए। हमें गुज़रे हुए समय और ज़िन्दगी में कोई लौटा कर ले जा सकता है तो वे सिर्फ यादें हैं और कोई नहीं।

छुटपन में महाभारत नमक एक दूरदर्शन नाट्य श्रृंखला आती थी। उसके आरम्भ में एक रथ के पहिये सा विशाल चक्र रहस्यमय तरीके से घूमता नज़र आता था, साथ में एक खनकती हुई आवाज…’मैं समय हूँ ! मैंने ब्रह्माण्ड को कई बार बनते और बिगड़ते हुए देखा है……’
बड़ा ही रोमांचित करने वाला नज़ारा होता था वो मेरे लिए। उसे चूक न जाऊं इसके लिए मौन हो, ‘वक्त’ का पूरा सम्मान करते हुए वक्त पर टीवी के सामने बैठ जाता था। समय की वह प्रतीकात्मक ध्वनि अंतर्मन गहरे तक पैठ गई। मैंने स्वानुभूत किया, समय सचमुच ही ताकतवर है। यह कभी बिगड़े हुए गज़ सा लगता है तो कभी मुंह फाड़े ग़ज़राज सा। हाँ, इसे साध लिया गया तो हम ज़िन्दगी की दौड़ में ‘विजयी भवः’ हो जाते हैं।
वो सचमुच ही दिलेर होते हैं जो वक्त और ज़िन्दगी को जाया करते हुए इनसे खेल जाते हैं ।
ज़िन्दगी में रीटेक नहीं आते उसी तरह समय भी बार बार मौका नहीं देता।

जिंदगी के सबक भी कोई एवैं ही नहीं होते।
इससे सीखे हुए पाठ को मृत्यु पर्यन्त नहीं भुलाया जा सकता। जिंदगी वो शै है जिसमे जीत और मात दोनों आप पर निर्भर है। ज़रा सी चूक आपको मात दे सकती है हमेशा हमेशा के लिए..
हाँ, जीत आपका राज्यभिषेक भी कर देती है। बस अपने अध्यापक समय का अनुसरण करना होता है।
वक्त सा पाबन्द कोई नहीं।
इसकी गति सदियों से उतनी ही है जितनी आप और हमने देखी है। न तेज़ ,न कम।
और इस तरह एक एक पल से होकर गुज़रता हुआ वक्त, काल के काल पार कर लेता है।
वक्त के निशान और ज़िन्दगी के अनुभव देखना चाहो तो कभी अपने घर या बगीचों, वृद्धाश्रमों और मंदिर के कोने में बैठे हुए किसी वृद्ध को जरा गौर से देखना। झुर्रीदार चेहरों और एक जगह टिकी हुई निगाहों में जाने कितने अनुभव, खुशियाँ, विजय और हार छुपी हुई होती हैं।
सुबह का सूरज शाम को ढल जाता है वैसे ही जिंदगी भी अस्ताचल की तरफ बढ़ जाती है और एक दिन यह ज़िन्दगी हमें उठाकर अंधेरों के हवाले कर देती है। फिर कोई सुबह नहीं होती हमारी । बहुत क्रूर है ज़िन्दगी। इसके लिए हम सदा सर्वदा अभिमन्यु हैं। इस चक्रव्यूह का भेदन नामुमकिन है।
ज़िन्दगी के मर्मज्ञ कहते हैं, ‘जाते हुए लम्हों को भुला कर आते हुए लम्हों के स्वागत में लग जाइये।
हो सकता है आप उसे अविस्मरणीय बना सकें।’
आप मुस्कुराएंगे तो जिंदगी मुस्कुराएगी। आप रोयेंगे तो ज़िन्दगी अट्ठहास भरेगी!!
कुछ समय पहले लिखी मेरी एक कविता यहां प्रासंगिक है। पेश करता हूँ-
प्रभु तुम हो..
लेकिन कहाँ हो?
दुनियाँ ने पत्थरों में तलाशा,
यकीन तुमपर है,
पाषाणों पर नहीं,
तुम सृष्टि में,
जीवों में हो,
प्रकृति में समाये हो,

हाँ मैं तुम्हे..
“समय” के रूप में
स्वीकारता हूँ
नतमस्तक हूँ,
एक कुशल शासक
की तरह,
जो भेदभाव से परे
सबके लिए
सजा और पुरस्कार
समान रूप से
बांटता आया है ।

हे समय,
एक कल्पना है मेरी,
यदि दुनियां में
पत्थरों की जगह
तुम जो पूजे जाते
सांझ सवेरे
शंखनाद के साथ
मंगल- गान होता,
यक़ीनन तुम्हे ये
रास ना आता
घुड़ककर के कहते
“जाओ….!
‘वक्त’ जाया मत करो,
कुछ कर्म करो,
मेरी ‘कीमत’ जानो !
तुम कितने ही
नतमस्तक हो लो
बीत जाने के बाद,
लौट कर नहीं आता मैं…
कहावत सुनी है !
work is worship
and duty is GOD!!

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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