हमारे जन-प्रतिनिधि !

IMG-20160202-WA0021जन प्रतिनिधि जनता के सेवक हैं या यूँ कहिये नौकर हैं। जनता की सेवा करना उनकी जिम्मेदारी है। लेकिन देखने में यही आता है कि हमारे जन प्रतिनिधि सेवक नहीं वरन मालिक जैसा व्यवहार करते हैं।
जन प्रतिनिधियों पर लगाम कसने के लिए 1970 में जय प्रकाश नारायण ने “राईट टू रिकॉल’ क़ानून लाने की कवायद की थी।
राईट टू रिकॉल के तहत ,किसी भी जन प्रतिनिधि के कार्य से जनता यदि नाखुश हो तो , कार्यकाल के बीच में ही उसे वापस बुलाया जा सकता है।
इस विधायक और सांसदों को कानूनी दायरे में लाया जा सकता था, किन्तु यह बिल आज तक जस का तस है। नेता क्या अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी चलाएगा?
वहीँ दूसरी ओर कनाडा, अमेरिका, स्विट्ज़र्लॅंड आदि देशों में राईट टू रिकॉल कानून लागू है।
भेड़ है हमारी जनता ! वह चाहती ही नहीं कि वह मालिक की तरह रहे।
हमारी मानसिकता, अज्ञानता , एकजुटता और देश भक्ति की कमी के चलते ये जनप्रतिनिधि मनमाने ढंग से पेश आते हैं और धन और जन से अपनी ताकत को अपरिमित करने में ही अपना कार्यकाल पूरा कर देते हैं।
जातिवाद और आरक्षण नामक दैत्य एक विकसित राष्ट्र की राह में सबसे बड़े बाधक हैं। जनता चाहती है उन्हें परास्त किया जाये, लेकिन , फूट डालो राज करो की नीति को हथकंडा बनाकर ये नेता हमें कभी भी विकसित और संगठित नहीं होने देंगे, यह तय है।
सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस तो साफ तौर पर इस बिल के खिलाफ है। एक कांग्रेसी प्रवक्ता का कहना है कि जिस देश में ही मतदान का प्रतिशत 50 फीसदी से नीचे हो वहां किस प्रकार इसे लागू किया जा सकता है। वहीं भाजपा ने भी इस बिल के बारे में कुछ साफ रुख तय नहीं किया है। अन्य दलों के विचार भी इस मुद्दे पर बंटे हैं।

मैं मानता हूँ कि इस कानून से देश पर बार बार चुनाव की तलवार लटक सकती है किन्तु कुल मिलकर नतीजे बेहतर ही होंगे। नेता असुरक्षित महसूस करेंगे तो जन की सेवा उनकी मजबूरी होगी। अव्वल तो वही लोग आगे आएंगे जो सच्चे अर्थो में देश और समाज सेवा करना चाहते हैं।
आज जन प्रतिनिधियों की छवि किस कदर गन्दी है, बताने का विषय नहीं।
‘सफाई अभियान’ एक साफ़ सुथरा उद्देश्य है। सही है सफाई से आस पास की जगह ही नहीं आत्मा भी स्वच्छ होती है, किन्तु किसी भी नेता को आप झाडू पकडे सड़क पर देखें भी तो उससे अप्रभावित ही रहेंगे।यह तो तय है। जनता कहे न कहे ,जानती सब है कि यह सब चर्चा में रहने और ध्यानकर्षण के तरीके हैं और कुछ नहीं।
कोई क्यूँ नहीं गंदले नालों में उतरता। ज़माना बदल चुका है। झक्क सफ़ेद कपड़ों और साफ़ सुथरी सड़कों पर झाडू पकड़कर खड़े होने मात्र से जन-सन्देश नहीं दिये जा सकते।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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