देहात की यात्रा-एक संस्मरण !

IMG_20160128_091707.jpgहाल ही मुझे एक शोक संतप्त परिवार से जुड़ने के लिए दूर ग्रामीण क्षेत्र में जाना पड़ा । पहले परिवहन निगम की बस से एक कस्बे तक का सफ़र , वहां से आगे दूरस्थ गाँव की यात्रा प्राइवेट बस के माध्यम से।
ग्रामीण क्षेत्र में यात्रा का ख्याल आते ही जेहन में एक अलग तस्वीर उभर कर आती है। परिवहन के सीमित साधन, बसों ,जीपों , ट्रेक्टर ट्रॉलियों आदि में लटक कर यात्रा करते लोग, धूल भरे कच्चे तो कहीं पक्के मार्ग और सीमित बाजार..!!
ठेठ ग्रामीण अंचल के लिए आस पास लगने वाले क़स्बे -पंचायतें ही उन देहात क्षेत्र के लोगों के लिए खरीद फरोख्त के केंद्र हैं। अपनी जरुरत की हर वस्तु वे लोग इन्हीं कस्बों या कहना चाहिए ‘बड़े गाँवों’ से पूरी करते हैं । शिक्षा की कमी कमी कहें , धन का अति अभाव या फिर सस्ते का लालच..नकली दवाएं, मानकता से नीचे बने उत्पादों की खपत के सबसे बढ़िया बाजार यही ग्रामीण अंचल होते हैं।
कपडे-लत्ते, बर्तन, औजार, खेती के सामान, बीज, पाइप या लौह वस्तुएं सब कुछ खरीद कर इन्ही बसों और जीपों के माध्यम से ये लोग अपने गाँव तक ले जाते हैं। साधनों की कमी ऐसी की जानते बूझते भी ऐसे परिवहन के साधनों का उपयोग मजबूरी बन जाती है।
मुझे काफी समय बाद ऐसी ही एक प्राइवेट बस में यात्रा करने की जरुरत आ पड़ी थी या यूँ कहें- अवसर मिला । प्रथमतः दरवाजे से प्रविष्ठ होना ही चुनौती पूर्ण उद्यम था।
जैसे तैसे अंदर घुसा तो वही धक्का मुक्की, पीछे सरकिये- पीछे सरकिये की आवाजें, बच्चों बड़ों की चिल्ल पौं और पुरुष यात्रियों द्वारा किया जा रहा धूम्रपान !! दम घोंटू वातावरण था बस का, तसल्ली इस बात की थी गर्मी की ऋतु नहीं थी वर्ना..पसीने से तर बतर मानव गंध से सने हुए वातावरण में सांस लेना भी दूभर होता। बैठने को जगह दूर खड़े रहना भी दुष्कर था।
मुझे कुछ शहरी और असुविधा महसूस होते देख परिचालक ने सुझाव दिया कि आप बस की छत पर चले जाइये ठीक रहेगा। आगे और ज्यादा भीड़ रहेगी। मुझे यह जानते हुए कि यह  गलत और खतरनाक हो सकता है फिर भी अच्छा लगा ये कि एक नया अनुभव मिलेगा। मैं बस की छत पर पहुँच गया।IMG-20160127-WA0023
यात्रा आनंदित महसूस हो रही थी। चारों तरफ सरसों और गेहूं की फसल से लहलहाते खेत..!!
यकायक पास बैठे ग्रामीण ने टोका, ‘साब झुको !!’
मैं भी कुछ समझे बगैर तुरंत झुका फिर पलट कर देखा..एक बबूल की लटकती हुई शाखा..हमारे ठीक ऊपर से निकली थी। मैंने भले सहयात्री को कृतज्ञता पूर्वक धन्यवाद देते हुए मन ही मन कहा,  ऊपर बैठकर यात्रा करने में इस बात का ध्यान भी जरूरी है!! ऐसा न करता तो चेहरा जख्मी हो सकता था।
एक बात ख़ास थी बस में अंदर और ऊपर स्कूल कॉलेज के छात्र छात्राओं की खासी संख्या थी। सुखद लगा कि हमारी नई पीढ़ी और उनके अभिभावक पढ़ाई के प्रति जागरूक थे।
गाँवों में मकान अभी भी कच्चे और खपरैल वाले नज़र आ रहे थे किन्तु छात्रों का परिवेष शहरी था। अधिकांश कॉलेज छात्र जीन्स टी-शर्ट में थे जबकि छात्राएं भी कमोबेश आधुनिक परिवेश में..उनके कन्धों पर वही लटकते बैग्स जो आप शहरी छात्रों में अक्सर देखते हैं।
लगा वक्त एक दिन सच में सब कुछ बदल देगा। सोच बदलेगी..आज कपडे बदले हैं कल गाँवों के स्वरूप बदल जाएँ।
सरकार हर घर शौचालय होने की कवायद में लगी है। कई ऐसे घर जो कच्चे थे मगर घर के कोने में एक पक्का बना शौचालय नजर आ रहा था।
कैसा भी हो एक बदलाव तो था वह।

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बस में दिखलाई पड़ता बीसलपुर बाँध का एक हिस्सा

कुछ समय बाद मेरी बस बीसलपुर परियोजना के डैम के करीब थी। सुरक्षा के मद्देनजर मुझे अब पुनः बस में आना पड़ा।
आज से 30 वर्ष पूर्व जब मैं यहाँ से गुजरा था तो चौड़े सपाट मैदान में बहती हुई नदी हुआ करती थी -बनास नदी। राजस्थान के सिरोही जिले के अरावली पर्वत से निकल कर आती हुई नदी जो आगे चलकर उत्तर प्रदेश में यमुना जी में मिल जाती है।
वर्ष पर्यन्त बहने वाली इस नदी पर उस समय ( 1985 के आस पास) एक बाँध बनाने की चर्चाओं का जोर हुआ करता था।
बाद में मैं अपने रिश्तेदार जो कि पटवारी थे के साथ एक बार यहां आया था। बाँध के भराव में आने वाली डूबत जमीन के रहवासियों को मुआवजे के बाबत।
वह गाँव डूबत में आ जाने वाला था।
7-8 साल तक बाँध बना। बाद में वही गाँव जब मैंने देखा जो पहाड़ी की तलहटी में था ,अब पानी में 15 फिट की गहराई में समा गया था। एक टीले पर बना हुआ भोलेनाथ का मंदिर अब जलमग्न था। बस गुम्बद का ऊपरी कलश दिखाई पड़ रहा था।अजीब भावों से उसे मैं देर तक निहारता रहा।

बीसलपुर डैम के बनने के बाद अब यहां वर्ष पर्यन्त पानी रहता है जो कि आस पास के कई जिलों में पहुंचाया जाता है ।IMG-20160127-WA0030.jpg
बीसलपुर बाँध का पानी मुख्यतः पीने और सिंचाई आदि के काम में लिया जाता है। बड़ी पाइप लाइन के द्वारा यहां से पानी, जयपुर, अजमेर ,टोंक, भीलवाड़ा जिलों तक पहुँचाया जा रहा है।

गाँवों में काफी कुछ बदला है। बिजली और दूरसंचार के साधन उपलब्ध हैं।
गाँवों की धूल भरी गलियों में भी जेरोक्स और कम्प्यूटर प्रोगामिंग जैसी दुकानें उपलब्ध हैं । मगर आवागमन के साधन और सड़केँ जस की तस हैं।
अभी भी गांवों तक पहुँचने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। शिक्षा के लिए, छात्रों को काफी दूर तक यात्रा करनी पड़ती है लेकिन आवागमन के साधन सीमित हैं। जिनमे सुरक्षा को काफी नज़रअंदाज किया जाता है। चिकित्सा के क्षेत्र में भी ग्रमीण क्षेत्र काफी पीछे हैं। हाइजीन के बारे में समझ शून्य के बराबर कही जा सकती है।
इन सबके उपरान्त भी ये गाँव हिन्दुस्तान की रीढ़ की हड्डी हैं। भारत की 70% आबादी गाँवों में हैं। गाँवों के विकास के बगैर भारत के विकास और अच्छे दिनों की कल्पना करना दिवास्वप्न है।
लेकिन एक नई तस्वीर और भी है जो तेजी से उभरने लगी है।गांवों की उपेक्षा के कारण ही आज शहरों का विस्तृतिकरण होने लगा है।
मेरा सफ़र तकलीफ़ देय होने के बावज़ूद भी काफी रोमांचित करने वाला था। जिस उद्देश्य से आया था वहां जाने पर मुझे देख मेरे रिश्तेदारों को दुःखद घड़ियों में भी सुखद लगा। वजह साफ़ थी आना जाना और मिलना अत्यधिक सिमित होता है।
अपरान्ह 3 बजे पहुंचा और दुःख सुख की बातों का दौर चला । इतना सब होने के बाद भी मुझे वहां अच्छा लग रहा था। शहर से तुलना करें तो गाँवों में निजता कम रह पाती है। सभी एक दूजे से परिचित रहते हैं।

बातों बातों में मालूम हुआ,  वापसी की आखिरी बस 4 बजे है। अब मैं लौटने की मुद्रा में था। मेरे यहां आकर इस दुखद अवसर में उनसे मिलने का हेतू सध गया था।
..फिर एक और गरमागरम चाय के साथ वहां से रुखसत हुआ।
पुनः बस के द्वारा यात्रा के लिए अब मैं मानसिक रूप से तैयार था।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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