झांसेबाजी

जब माँ मौज़ूद थीं तो अपने हर दुःख को उसके साथ बाँट लिया करता था..हर वो बात जो मुझे सोचने को मजबूर करती मैं उसे बताता।
माँ से बड़ा न कोई हमदर्द ना कोई मित्र!!
माँ के बाद अब यह जिम्मा मेरे ब्लॉग ने ले लिया है। ऐसी कोई भी बात जो मुझे सोचने पर विवश करे वो मैं ब्लॉग को सुना बता कर मन हल्का कर लेता हूँ।
मनुष्य अपने मकसद को पूरा करने के लिए हर तरह के जतन करता है। छल कपट का भी !! कल मेरे साथ दो घटनाएं घटीं जो मुझसे छल कर रही थी मगर मैं निःशब्द! अक्सर मैं लिहाज कर जाता हूँ। जाने यह गुणसूत्र कब से मेरे परिवार में चला आ रहा होगा। मेरे पिताजी भी ऐसे ही संकोची हुआ करते थे।
कहीं से आते और मार्ग या सफ़र में कोई परिचित मिलता और उन्हें देखकर मुंह मोड़ लेता या अभिवादन नहीं करता तो घर आकर वो अपनी वेदना मेरी माँ को बताया करते। ईश्वर का आशीर्वाद ही कहूँगा कि बाबूजी की हर व्यथा को मैं कच्ची उम्र में भी भांप लेता था।
तब मैं सिर्फ श्रोता मात्र ही हुआ करता था। माँ पिताजी के मध्य कई तरह के संवाद चला करते जिन्हें मैं जिज्ञासु बन कर सुना करता। उनकी इन चर्चाओं ने मुझे लगता है, वक्त से पहले ही परिपक्व बना दिया था। ज्यादातर उनकी बातें जीवन की दार्शनिकता पर होती थी । आज ऐसा प्रतीत होता है मेरे पिता मुझमे उतरते जा रहे हैं।
पत्नी जी कई बार टोक देती है। ‘हूबहू बाबूजी बनते जा रहे हो अपने सनकी स्वभाव के साथ !’ उनका भले उलाहना होता हो किन्तु मुझे किसी कॉम्प्लीमेंट की तरह लगता है।
जितना जीते जी सुन देख कर बाबूजी को जिया उससे कहीं ज्यादा अब उनके जाने के बाद उनको याद कर कर के जीता हूँ । काश जाने वाले कभी वापस आ पाते!!
जिक्र कहाँ से कहाँ चला आया। बिन पतवार की नाव सदृश होती हैं यादें और बातें।
कल मेरे साथ दो घटनाएं घटीं जिसने मेरे अंतर्मन को काफी आहत किया।

रात्रि ड्यूटी ……तदुपरांत सोने का वक्त ….. घडी सुबह के  5 बजा रही है, लेकिन मेरे मन का क्लेश मुझे ब्लॉग पर तकलीफ उतारने के लिए विवश कर बैठा है।

हुआ यूं कि मैं अपने पुत्र हेतू स्कूल के लिए जूते खरीदने के प्रयोजन से एक दूकान पर गया। बेटे के लिए 4 नंबर का जूता खरीदना था। दूकानदार 5 नंबर का जूता निकाल लाया। मन की तसल्ली के लिए उसे भी पहना कर दिखलाया गया ,लेकिन परिणाम वही कि नंबर 4 ही की जरुरत महसूस हो रही थी।
दुकानदार पुनः तयशुदा जूता ढूंढकर लाने में व्यस्त हो गया। 10 मिनिट तक इंतज़ार कराने के बाद वो जूते निकाल कर लाया और अपनी लच्छेदार भाषा से मुझे संतुष्ट करने की असफल कोशिश करने लगा , ‘ यह देखो आपकी पसंद का जूता और इधर से ठीक आ रहा है उधर से ठीक है आदि आदि।’ मैंने देखा तो जूतों की यह जोड़ी भी 5 नंबर की निकली।
मैंने कोतूहल वश पूछा , पहले वाला भी 5 नंबर ही था ना!!
उसका जवाब था, अरे बाबूजी आप तो इसको देखिये। उससे ज्यादा बेहतर और फिट बैठ रहा है ।अब वह मुझे समझाने लगा था कि 5 नंबर का पहले वाला जूता बड़ा था लेकिन यह बड़ा नहीं है!!
यह सचमुच हैरान करने वाली बात थी। मैं सोच रहा था झांसेबाजी की कोई सीमा भी होती कि नहीं! लेकिन फिर भी मेरा अंतर्मन उसे खरी खोटी सुनाने के लिए तैयार नहीं था ।मेरे मन के क्लेश को भांप वह बोला जरा रुकिए, आपको और छोटा चाहिए तो मैं अभी ला देता हूँ।
फिर उसने अन्य जोड़ी लाने में मेरे 5 मिनिट और खर्च किये । इस बार उसका पैंतरा अलग तरह का था।
सुनिए उसकी बात~
बाबूजी ये लो, उससे भी बढ़िया और एक नंबर कम के जूते , और रेट भी उनसे कम !!
मैंने अंदाज़ लगाया, यदि रेट कम हुई तो गुणवत्ता से भी सौदा हुआ होगा।
मैंने उस जूते का लेबल देखा तो वो लोकल जूता निकला। मैंने दुकानदार के सामने पुनः प्रश्न रख दिया।
‘मुझे तो XYZ कंपनी का ही जूता चाहिए।’ मेरी हठधर्मिता देख उसने फिर वही लीपापोती चालू कर दी।
वो मुझे लगातार बेवकूफ बना रहा था ।
जब मेरे सब्र का बाँध टूटने लगा तो आखिर मैंने यह कह कर उठना ठीक समझा कि ‘भाई, मंगवा कर रखना मैं फिर आऊंगा।’
वह भी समझ रहा होगा कि झूठ को कब तक चलाया जाता। लोग स्वीकारते नहीं, कि जो है सो तो है। एक बार मैंने एक यात्री को मेरे ब्रेकवान में इसलिए बैठा लिया था , क्योंकि उसने किसी रेलवे कर्मचारी की रिश्तेदारी निकालने के बजाय साफ़ साफ कहा कि ‘बाबूजी मैं तो अनाज का व्यापारी हूँ और रात तक यहां से जाने का कोई साधन नहीं है।’ ऐसे में उपरवाले का आदेश समझ सहयोग करना मेरा कर्तव्य बन जाता है। सीधी बात कहूँ तो, मुझे फरेब से चिढ़ है ।
खैर बाद में दूसरी दूकान से मेरा मकसद पूर्ण हो गया था, किन्तु घर आकर भी मैं परेशान ही रहा कि किस तरह वो मुझे 5 नंबर की जगह 5 नंबर का ही जूता पकड़ा कर बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहा था।
अपना मकसद पूरा करने के लिये लोग धोखे और झूठ का बात बात पर सहारा लेते हैं।
शाम होते होते फिर एक छल मेरा इंतजार कर रहा था। मेरे एक मित्र का फोन आया। उसके किसी मिलने वाले का कोई सामान बड़ोदा मेरी ट्रेन से जाना था। अर्थात कूरियर गिरी..!!
खैर मित्र के कार्य तो कभी मना किये ही नहीं जाते लेकिन उसे भी कोई दूसरा झूठ बोल कर अपना हित साधे तो ..भला मित्र क्या करे।
फोन पर सूचना मिली कि उनका एक मित्र अपना एक पार्सल मेरे साथ भिजवाएगा और अगले दिन उस पार्सल को लेने मेरे आराम गृह में सबंधित व्यक्ति आ जायेगा।
फिर बिन पूछे ही मित्र ने आगे और जोड़ा कि वजन ज्यादा नहीं यही कोई एक डेढ़ किलो होगा। खैर,
मैंने सहमति दे दी।
गाडी पर उन महाशय ने अपना पार्सल अपने परिजन के साथ भिजवाया।
मैंने देखा, वह कोई पार्सल नहीं बल्कि एक बड़ा थैला था जिसमे खाने पीने के सामान रहे होंगे और वजन होगा यही कोई 5 किलो।
मैं दूसरी बार ठगे जाने की कसौटी पर कस दिया गया।
सवाल यह नहीं ,इस वजनी थैले के साथ मैं स्टेशन पर कहाँ और कैसे घूमूँगा ! सवाल था, जब वजन 5 किलो ही जाना था तो मुझे एक डेढ़ किलो क्यूँ बताया गया।
अगर मेरे मित्र का मामला न होता तो मैं उन महाशय को दो बात जरूर सुनाता । लेकिन फिर जुबान पर पत्थर रख लिया ।
किस तरह लोग अपने मकसद के लिए झूठ और झांसे का सहारा लेते हैं।
किस तरह हर इंसान खुद को चतुर और समक्ष खड़े हुए को बेवकूफ समझने लगा है!!
क्या इस तरह हम अपनी तयशुदा आयु से ज्यादा जी लेंगे?
क्या इस तरह की हरकतों से हम हमारी आत्मा के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहे?
क्या बिन धोखा दिए, सादगी और ईमानदारी से अपना कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया जा सकता?
मेरे लिए तो ये किन्ही यक्ष प्रश्नों से कमतर नहीं थे !!
ॐ शान्तिः

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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