नशा शराब में होता तो….

“नशा शराब में होता तो…..नाचती बोतल…”
हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन अभिनीत एक हिंदी चलचित्र के एक गीत के ये बोल मुझे अक्सर याद आ जाते हैं।
वो नशा या कहें  वो जूनून ही तो है जो दिन को रात ,और बात में जज्बात भर देता है। सुरा से कहीं तेज नशा होता है जूनून का।
मैं शुरू से जुनूनी रहा। किशोर वय का वो वाकया मुझे याद आता है जब जिद में मैंने सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड कंठस्थ कर ली थी।ईश्वर में अनायास ही आस्था जाग उठी थी मुझमे। मैं उसे ईश्वर का आशीर्वाद ही मानता हूँ।  मंदिर में हनुमान जी  के सामने दीया लागाकर आसन पर बैठ जाता.आँखें बंद , और सुन्दर काण्ड का वाचन आरम्भ ..45 मिनिट लगते थे।

इतना सब होने के जप्रांत भी मन चंचल था।शायद उस वय का नशा..!! महिला मित्रों में रूचि ने शनै शनै  हनुमान जी की भक्ति से विमुक्त कर दिया। अब इसे क्या कहा जाये। जो भी हो…फिर भोलेनाथ में सहज ही भक्ति जाग्रत होने लगी थी।
वो मेरे कॉलेज के दिन थे। एक ऐसा दौर जो ज़िन्दगी का सुनहरा पन्ना हो। हम दो दोस्तों में एक बार एक लड़की से नोट बुक लेने की शर्त लगी। कथानक यह था कि जैसे ही वो कल कॉलेज आएगी कौन पहले नोट्स मांगेगा ! ये होश नहीं कि नोट्स कॉलेज की क्लास ख़त्म होने के बाद मांगने चाहिए। दोस्त होकर भी दगेबाजी की पूरी उम्मीद रहती थी। लिहाजा नोट्स मांगने का समय सुबह ही से कॉलेज तक तय कर लिया गया।
मुझे याद है मैंने एक बार चेज़ अप करके उसके घर का पता लगाया था। अब ये तो कोई भी समझ सकता है कि मैंने ऐसा क्यों किया होगा ? बहरहाल वो रैकी आज मेरे काम आने वाली थी।अगले दिन कॉलेज पहुँचने से पहले उसके घर के बाहर पहुँच  मैं प्रतीक्षारत हो गया । कार्यसिद्धि में प्रभाव कायम रहे और नोट्स के लिए कॉलेज तक की सहयात्रा हो जाये इस बात का खासा ध्यान रखते हुए मैं एक करीबी मित्र का स्कूटर मांग कर ले गया था। काश उस जमाने में मोबाइल होते!!(क्या ख़ाक होते , ये भूल रहा हूँ ऐसे में वो कमीना दोस्त मोबाइल पर ही नोट्स की डील पक्की कर लेता)खैर मेरा इन्तजार थोड़ी ही देर बाद ख़त्म हो गया जब मधु….. हाँ मधु ही नाम था उसका..! घर से बाहर निकली। उसके बाहर आते ही मैंने बगैर कोई भूमिका बांधे नोट बुक मांग ली।कितना बेवकूफ था ना मैं! ढंग से इतना भी सलीका नहीं सीखा कैसे लड़कियों से कोई बात शुरू की जाती है! उसे भी बड़ा विस्मय हुआ मेरी हरकत पर ..घर का पता , सुबह सुबह नोट्स मांगना सब कुछ उसके लिए अचरज का कारण बना जा रहा था …खैर…मुझे नोट्स मिल गए। हाँ लेकिन उसने स्कूटर पर बैठने से हिचकते हुए मना कर दिया था। लेकिन मैं भी निपट गधा था। आज लगता है मैं उसे अपने पीछे की सीट पर थोड़े से आग्रह के तदुपरांत बैठा सकता था।
उधर हमारे मित्र महाशय कॉलेज के बाहर इस ख़्वाब के साथ खडे थे कि वो पहले नोट्स हथिया लेंगे..और इस तरह उस दिन भी जूनून जीत गया। हालांकि लड़कियों के मामले में लौंडे जूनून को कंधे पर धर के चलते हैं। कोई शक नहीं। मुए अपनी बहन के लिए बित्ता भर नहीं सरकेंगे लेकिन मामला महिला मित्र का हो तो 4 बजे का अलार्म लगाकर सर्दियों में भी नहा धोकर निकल जायेंगे।
इस तरह का जूनून भी गज़ब का होता है जो आशिकी के नाम से जाना जाता है।
उस ज़माने में जब ट्यूशन का ज्यादा चलन नहीं था। ना ही शिक्षा ने व्यावसायिक जामा पहना था । विद्यार्थियों को निजी स्तर पर ही संसाधन जुटा कर अध्ययन करना पड़ता था।
पिताजी ने मेरी भाषा की दुरुस्ती के लिए एक अंग्रेजी अखबार मंगाना आरम्भ किया । उसका चाहे एक कॉलम ही पढ़ पाऊं लेकिन एक एक शब्द का अर्थ जाने बिना आगे नहीं बढ़ता था..इस जूनून ने मेरा , आंग्ल भाषा – संग्रह काफी सुदृढ़ बनाया।
एक अभाव मुझे सालता रहा…मेरे मित्रों की कमी।
जिससे भी रिश्ता बनाया उसके दिल में उतरने और उसे करीब से करीब लाने की कोशिश की। और जैसे ही प्यार में कोई कमी दिखलाई दी, मन में दरारें चल जाती थीं।
सोच लिया, दोस्त बनाने ही नहीं हैं। और प्यार व्यार करना है तो पेड़ पौधों और पशु पक्षियों से करो।
लेखन को अपनाओ। इस तरह लिखने लगा।
जीवन में अपनाया कुछ नहीं लेकिन जो कड़ी आरम्भ हुई उसे ढर्रे की तरह अपने में उतारता चला गया।
पेंटिंग बनाने का भी बहुत शौक रहा मुझे। लेकिन बस कोई ब्रश पकड़ा दे। फिर वो छूटेगा नहीं।
एक बार धर्मपत्नी जी कोई कपडे पर चित्र बना रही थी । मैंने पूछा आप इसमें रंग भरेंगे या कशीदा..जब रंगों की योजना का पता लगा तो फिर ब्रश मेरी गिरफ्त में आ गए। पूरे 10 दिन लगे। दिन के कई हिस्सों में अपनी काल्पनिकता के साथ मैंने उस तस्वीर को पूरा किया। कुछेक गड़बड़ी के साथ वह तस्वीर अंततः मेरे घर की दीवार पर टंग ही गई।

New Doc 56_1.jpg

 साकी द्वारा सुरापान पर मेरी एक पेंटिंग 

स्वभाव रक्त बीज में मिला होता है। कहते हैं जन्मजात संस्कार भी हमारी फितरत को तय करते हैं। शायद कोई रक्तबीज ही हो..!!

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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