भूख और प्यार

प्यार और भूख…जी हाँ , आप इन्हें जोड़ कर मत देखिएगा। यहां भूख से मेरा तात्पर्य उदर-क्षुधा है।
दोनों ही तृष्णा , ….और आवश्यकता भी। दोनों के बगैर क्या जीवन संभव है?
उदर-क्षुधा , तन की ऐसी मांग है जैसे कोई वाहन की ईंधन- सुई लाल के निशान को पार कर आपको पर्स ढीला करने के लिए मजबूर कर दे। वहीं ,बगैर प्यार के भी जीवन रूखा सूखा हो जाता है। मैंने देखा है लोगों को ,जो प्यार के बगैर गमगीनियों में खो जाते हैं। कोई लत लगा बैठते हैं ।
सच कहें तो भूख जहां फ्यूल की तरह है ,तो प्यार उसमे मिलने वाले लुब आयल की तरह..जीवन में स्निग्धता लाने के लिए मिलने वाला आवश्यक सहारा..!

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दूनियां की सबसे सुकून भरी जगह- माँ की गोद

माँ के प्यार के बगैर..सोचिये जीवन!
एक एक पल ज़िंदा होने का हिसाब मांगता है जैसे।
लेकिन वे लोग भी बड़े जीवट के निकलते हैं जो बगैर माँ या पिता के जीवन की शुरुवात करते हैं।
कई बार पिता के अभाव में माँ में ही, वह समूचे विश्व के दर्शन करना आरम्भ कर देते हैं। मेरे पिता का जीवन भी बगैर उनके पिता के अपनी माँ के संरक्षण में ही आरम्भ हुआ।धारदार जीवन की पगडंडियां वे माँ के प्यार के सहारे सफलता पूर्वक पार कर पाये। माँ  ने उन्हें जीवन को सफलतम बनाने का साहस दिया प्रेरणा दी।
माँ -बाप के अलौकिक प्यार के अतिरिक्त एक और प्यार का अनूठा स्वरूप…भाई बहन और मित्रों का स्नेह बंधन!
लेकिन एक समय के बाद जब सभी वैवाहिक बंधनों में बंध जाते हैं, ये रिश्ते भी शिथिल होने लगते हैं।आपको प्यार करने वाली भगिनी ,सन्तानोत्पत्ति के पश्चात उन्हें ही वरीयता देगी जिन्हें उसने जन्म दिया। यह जीवन का सत्य है। इस सत्य को मैंने तब जाना जब मेरी बहनों के घर संसार बसे। उनके लिए पहले अब उनका स्वयं का परिवार था। जीवन की कड़ियाँ इसी तरह आगे बढ़ती हैं। यहां तक कि मामाजी एवं मौसीजी का स्नेह भी माँ के जाने के बाद वैसा नहीं रहा। हो सकता है मैं गलत होऊं!! यदि ऐसा है तो इसे मेरा निजी अनुभव मान कर भुला दिया जाय। पति पत्नी के रिश्ते के रूप में हुआ प्यार ध्रुवीकरण करने लगता है और नए आयामों को जन्म देता है।FB_IMG_1450670728582
एक भावनात्मक रिश्ते का नाम है मित्र या सखा । इस प्यार की महता को दर्शाने के लिए भगवान् स्वयं अवतरित हुए ।
भगवान् कृष्णा और सुदामा का प्यार हम सब जानते हैं। हाँ इस तरह के मित्र अब मिलते नहीं।
स्वार्थ नाम के घुन ने मित्रता को खोखला कर किया है। आज दुनियां में स्वार्थ किस कदर फैला किसी से छुपा नहीं। लोग बगैर स्वार्थ के एक दूजे का अभिवादन तक नहीं करते।
लेकिन…
यह भी कटु सत्य है इंसान सब से ज्यादा तो अपने आप से ही प्यार करता है। छोटा था तो माँ स्नेह मिश्रित कोतूहल से पूछा करती थी , ‘मैं मर जाउंगी तब क्या करेगा मेरा बेटा!’ मैं कहता था – मैं आपको मरने ही नहीं दूंगा माँ, और भगवान् ने आपको मृत्यु दे दी तो मैं भी आपके साथ मर जाऊँगा।
माँ चली गई छोड़ कर, मैं आज तक जिन्दा हूँ। माता पिता दोनों को चिता स्थल तक पहुंचा कर मैं अब तक ज़िंदा हूँ ,उनके बगैर!! किसे प्यार किया मैंने? उन्हें या खुद को?
क्या है आखिर प्यार..?
आज भी कोई अच्छे से बात कर लेता है तो, अपनत्व का सोता बहने लगता है। स्नेह फिर लगाव और फिर प्यार का अहसास देने लगता है।
क्योंकि जहां स्वार्थ नहीं होता वहां यदि आप कई बार जाना चाहें तो निश्चित ही यह प्यार है।
मेरी बात लगभग समाप्त हुई। अब आप यह मत पूछना , कि दुनियां में एक और जिस ‘प्यार’ का जिक्र सबसे ज्यादा होता है उसका तो जिक्र ही नहीं…!!

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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