‘दस में से एक गया बचे नौ’

अतीत हमारा पीछा नहीं छोड़ता । क्या आप मेरी इस बात से सहमत हैं? शायद ना भी हों , लेकिन मेरा जड़वत् विशवास है , अतीत से जुडी यादें हमारा सतत् अनुसरण करती हैं।
आज आंग्ल संस्कृति का नया वर्ष 2016आरम्भ हुआ ।
नव वर्ष की पूर्व संध्या से ही समूची दुनियां जश्न में उतरने लगी । पता नहीं मेरे साथ क्यूँ होता है जब दुनियां खुशियों में डूबने को आतुर हुई रहती है, मैं अवसाद में उतरने लगता हूँ।
लगता है जैसे ,सब मिलकर खुशियों का आडम्बर रच रहे हैं..! हर जगह शोर शराबा…. कहाँ मिलती हैं खुशियाँ!! यही सोचते हुए नए साल की पहली ही सुबह मैं लिखने को विवश हो उठा और मन का अचरज कुछ यूँ कागज़ पर उतरा-
इक हूक सी उठती है दिल में हर रोज़  यहाँ
दुनियां तेरा शोर शराबा कुछ भी तो नहीं

खैर , यह मेरा निजी ख़याल भी हो सकता है। लेकिन जब एक सन्देश मैंने शोशल साईट पर देखा तो मन को सम्बल मिला।
वो यूँ था~
एक और ईंट गिर गई दीवार ऐ ज़िन्दगी से
नादाँ कह रहे है, नया साल मुबारक हो!!

पढ़ कर बहुत अच्छा लगा कि मैं दुनियां में निराला नहीं…ना ही अकेला हूँ, जैसा की श्री मति जी अक्सर कह देती हैं।
फिर लगा कही मैं निराशावादी तो नहीं बनता जा रहा !! मेरे सोच की गाडी पुनः पर्वतीय इलाकों की सी घुमावदार राह पर दौड़ने लगी थी।

मैंने कई बार अपने विचारों की पुष्ठि की है। कभी लगता है जैसे मेरी राह, मेरी आह को ज्यादा चुनती है।
बदलते हुए साल मुझे बहुत तकलीफ देते हैं। पुराने साल की केंचुली उतारने के लिए सभी अपनी ख्वाहिश का जतन करते हैं।
घर से बाहर आनंद की तलाश….!!

मेरे लिए मिथ्या धारणा से ज्यादा कुछ नहीं! आप जो सुकून घर में पाते हैं क्या वही आप बाहर पा सकते हैं? फिर हम क्यूँ इतना भटकते हैं? तन से …और मन से भी!! मेरे नजरिये से ‘घर’ का तोड़ दुनियां में कहीं है ही नहीं। घर से बड़ा रिसोर्ट घर से बड़ी ऐशगाह  कहीं नहीं है। जो नहीं मानते वो भी एक दिन मानेंगे , ऐसा मेरा मन कहता है।
नव वर्ष के स्वागत के लिए मुझे मेरा पुश्तैनी घर ही आरामदेय लगा । पुरानी शैली का घर..काफी बड़ा सारा कच्चा आँगन। कुछ छोटे कुछ बड़े वृक्ष..और कृत्रिमता तो लेशमात्र नहीं!!
उन वृक्षों में बाबूजी  के हाथों में पनपा एक आंवले का पेड़..खूब फल देता आ रहा है । आस पड़ौस की महिलाएं आंवला नवमी के पूजन दिवस पर हमारे यहां पूजा करने आती तो मुझे आंतरिक रूप से गर्व का अहसास होता था। ऐसा सुखमयी हमारा यह वृक्ष !!

बाबूजी ने जीवन पर्यन्त आंवले का सेवन किया । नतीजा ये रहा , जब तक जिए, निरोगी रहे। उन्होंने अपने निकम्मे बेटे को इतनी भी तकलीफ नहीं आने दी कि उन्हें जाकर संभालने की जिम्मेदारी उठानी पड़े।
आंवले के वृक्ष के नीचे बैठना मुझे बहुत भाता है। उसके पीले पड़ते हुए पत्तों और उनपर लगे आंवलों को मैं देर तक निहारता रहता हूँ। बाबूजी और मेरे बीच वह वृक्ष एक याद बन कर खड़ा है।IMG-20160102-WA0061.jpg
आँगन में रखे मुड्डों पर परिजनों के साथ चाय पीना और कुछ गप्पें लगाना मेरी उस आंग्ल नव वर्ष की पार्टी में शुमार था। और मैंने इसे ही जीवन का यथार्थ माना भी  है।
चमक दमक और फ़िज़ूल खर्च वाली पार्टियों में मैं खुद को असहज महसूस करता हूँ। वहां मेरे लिए सुकून नहीं होता। लगता है जैसे हर शै एक आडम्बर है। लोग बेवजह अतिउत्साह का प्रदर्शन करते हैं। छोटी छोटी बातें बढ़ा चढ़ा कर बतियाते हैं। छोटी सी उपलब्धि को बखाना जाता है जैसे कोई गौरवमयी इतिहास सुनाया जा रहा हो।
उनकी बातों से लगता है, धरती पर दुःख , अभाव ,गरीबी है ही नहीं !
तकलीफ तब बढ़ जाती है जब रात में गले से लिपट लिपट कर नाचने वाले लोग कुछ समय पश्चात एक दूजे की आलोचना करते देखे जा सकते हैं। ये कैसा साथ ? प्यार इंसानों से है या फिर इच्छा पूर्ति से!! नजर के सामने समूचा दृश्य बदल जाता है। सर्कस में दो चेहरे लगाकर घूमने वाला जोकर एक हकीकत लगने लगता है। हम यहाँ दो नहीं तीन नहीं , कई कई चेहरे लेकर जीते हैं।
एक है जन्म दिवस। यह भी मुझे नव वर्ष की भाँति ही कचोटता है। ज़िन्दगी का एक साल कम हो गया तो ख़ुशी कैसे मनाई जाये।
लेकिन मैंने देखा है । ख़ुशी की आड़ में लोगों को आडम्बर चाहिए। भौंडे नृत्य चाहिए। खाना पीना चाहिए। वह सब शालीनता की सीमा में हो तो अच्छा लगता है किन्तु वह हमें उन्मुक्तता का तड़का लगी हुई चाहिए! अब यह कैसी चाहत है!!
आडम्बर हमारा अंतःवस्त्र बन गया है। दम्भ और दिखावा भड़काऊ इत्र की गंध सा फ़ैल गया है जो कुछ देर के आनंद की व्याख्या करता है। उसके बाद या तो उसका आभास नहीं होता!! या फिर वो सर चढ़ कर बोलता है।
कोई नुक्सान नहीं !! मैंने महसूस किया है कि कछुए की भाँति अपने खोल में सिमट कर रहने में कोई नुक्सान नहीं है। इस तरह आप दुनियां का भला ही करते हैं। जब लोग जश्न मनाते मनाते उलझ पड़ते हैं तो यही धारणा पुष्ट होकर गहरे में पैठ जाती है।
मां कहती थी, ढोल और डूंगर (पहाड़)..सब दूर से सुहाने लगते हैं।
बस, अति विनम्रता के साथ हाथ जोड़ सभी का अभिवादन करते चले जाइए..जीवन सुखमय रहेगा..!
मेरे लिए किसी नव वर्ष का जश्न बस इतना मात्र ही है।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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