‘ चाय पे चर्चा …’

“ओ भैया ज़रा तीन चाय बनाना ! और हाँ शक्कर कम…!!
इस पंक्ति का मेरे साथ बरसों या यूं कहें दो दशकों तक गहरा नाता रहा है। मैं रेलवे में गार्ड के पद पर नियुक्त हूँ.. जिसके चलते पटरियों पर चलते हुए काफी अरसा बिताया है।
चाय पे चर्चा करने से पहले एक अहम बात का जिक्र करना चाहूंगा और वो ये कि आमजन की धारणा में मालगाड़ियां किसी भी स्टेशन पर घंटों खड़े कर दिए जाने के लिए बदनाम रही हैं। वो सज्जन जिनका रेलवे से वास्ता कभी कभार का ही रहता है वो मुझसे मुलाक़ात के दौरान पहला प्रश्न यही दागते हैं कि गाडी जंगल में खड़ी हो जाये तो आपको डर नहीं लगता ? मैं भी व्यंगात्मक तरीके से अक्सर कह देता- अजी जंगल रहे ही कहाँ !! सब जगह तो इंसान ने कब्ज़ा कर लिया। फिर बात में बात निकल आती कि लुटेरों के रूप में इंसान भी तो आ सकते हैं !! तब मैं बैक फुट पर जाते हुए सफाई देता कि तेजी का ज़माना है गाड़ियां रूकती नहीं। और खतरा हो तो संचार साधन इतने हैं कि तुरंत बचाव के रस्ते खुल जाते हैं। लेकिन कडुवी हकीकत ये है कि व्यक्तिगत सुरक्षा के मुद्दे ने हमें इतना परेशान नहीं किया जितना रात की नौकरी और नींद भूख और अनियमित दिनचर्या ने परेशान किया है।
…और ऐसे में गाँवों की झौंपडीनुमा वो चाय की दूकानें जो तन और मन को सुकून पहुंचाती थी वो अविस्मरणीय हैं . ज़िस मंडल में मैं काररत हूँ वहां के छोटे मोटे करीब सभी स्टेशनों की चाय की बोडियां रनिंग स्टाफ़ की गवाह बन चुकी होगी।
गाडी के चालक दल के साथ चाय की थड़ी पर जाकर मुड्डियों या पत्थर की पट्टियों पर बैठ कर चाय की चुस्कियां सुकून देता थ. और हाँ कम शक्कर और तेज़ चाय पत्ती की हिदायत देना कभी नहीं भुलाया जाता था.कुछ चाय वाले तो इतनी स्वादी चाय बनाते कि उस पर शक किया जाने लगता की कहीं ये चाय में डोडे का चूरा तो नहीं मिला रहा !! वक्त के साथ चाय का पैमाना छोटा होता ही गया. बड़ी कांच की गिलास पहले तो पतली हुईं फिर धीरे हीरे छोटी भी होती गई। एक गाँव का चाय वाला तो ऐसा नाकवाला था कि ग्राहक को अपनी गिलास खुद ही धोनी पड़ती। समय के साथ प्लास्टिक के आये गिलासों ने तो हद कर दी। ना हाथ सुरक्षित ना होंट और स्वास्थ्य को भी खतरा … ! खैर गेहूं के साथ घुन का भी नंबर आता है चाय के भक्तों ने सब कुछ अंगीकार कर लिया।
ज़िन्दगी में रुआब रखने वाली चाय … मज़े की बात तो ये कि रेलवे में आने से पहले मेरे जीवन से नदारद थी। माँ बाबूजी ने चाय को जाने क्यों मुझसे दूर ही रखा। बचपन में उनके साथ कही जाता तो अभ्यागत को पूर्व ही हिदायद दे दी जाती कि मैं चाय नहीं पीता हूँ। और जैसा कि मुझे अनुमान हो जाता था कि चाय नहीं होने की बिना पर मेरे लिए दूध शिकंजी या शरबत आदि की मनुहार होगी जो माँ पूर्ण शिष्ट्ता बरतते हुए मना करवा दिया करती थी। मैं तब बहुत हीनता महसूस किया करता था। बचपन की इस हीनता को मैंने समय के साथ रेलवे में आने पर उतार फेंका ।
मैंने काफी गहनता से अनुभव किया है कि किस तरह एक चाय की मनुहार से कई लोग रिश्तों नातों में तब्दील हो जाते हैं। कोई टेबल पर काम अटका हुआ हो या किसी को मान देना हो तो फ़ौरन चाय का ऑफर…! बस गाडी पटरी पर चलने लग जाती है। घर में हम पति पत्नी जाने कितने कामों में उलझे रहते हैं लेकिन सुबह शाम की चाय हमें दो पल साथ साथ सोचने का मौका दे देती है।
सच मानिए चाय की प्याली कमोबेश हिन्दुस्तानियों के दिलों पर तो राज़ करती है और करती रहेगी। कहनी भी सुनी है….” चाय के प्याले में तूफ़ान .” … मेरे हिसाब से आशय यही रहा होगा वहां कि किस तरह एक चाय हलक से उतर कर अंदर के तूफ़ान को प्याले के हवाले कर देती है !
आप मेरी बात से सहमत तो हैं ना…य़ा चाय पर बुलाना होगा !!

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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1 Response to ‘ चाय पे चर्चा …’

  1. छोटे स्टेशन के बाहर चाय की थड़ी —- अपने प्रोबेशन के दिनों की याद हो आयी।

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