एक दुपहरी जीवन की …

अपने एक रिश्तेदार के शैक्षणिक कार्य से मुझे कोटा खुला विश्वविद्द्यालय जाना पड़ा। जब मैं वहां पहुंचा तो ‘लंच’ का समय चल रहा था। राजस्थान का कोटा शहर वर्ष-पर्यन्त पानी से लबालब रहने वाली चम्बल नदी के किनारे बसा हुआ है। जिसके चलते भूजल स्तर ऊंचा बना रहता है। शहर के ऊंचे ऊंचे और हरे कचनार वृक्षों से इस बात का अंदाजा सहज ही लग जाता है। विश्वविद्द्यालय का प्रांगण भी हरीतिमा से लदपद था। जेठमास की दुपहरी और गर्मी से बचने के लिए हमने कुञ्ज से प्रतीत होते एक लॉन की शरण ले ली।
हम वहां की नरम दूब और कोयलों कलरव का आनंद लेने लगे थे। सहसा मेरी बेटी का ध्यान एक महिला पर जा टिका जो हमसे थोड़ी दूरी बना कर बैठने का प्रयोजन कर रही थी। बालों में लगाया गया अत्यधिक मात्र में तेल , लुढ़क कर चहरे पर आ रहा था। ताम्रवर्णी मुखमंडल पसीने और तेल की उपस्तिथि से तनाव सा पैदा करता प्रतीत हो रहा था। neelam ji 3
मैं उसे गौर से देखने लगा। मुझे मेरी पिछला आगमन याद आ गया जब मैंने इसी महिला को एक कोने में बेंच पर बैठे तल्लीनता से लेखन का कार्य करते पाया था। हाव भाव कुछ ऐसे थे मानो ५ मिनिट बाद उत्तरपुस्तिका को निरीक्षक द्वारा लिया जाये और काफी कुछ लखना बाकी रह गया हो।

 लॉन में बैठी लिखती हुई महिला नीलम सिंह

लॉन में बैठी लिखती हुई महिला नीलम सिंह


सहसा मैंने अपनी बेटी से कहा- ये महिला अभी ‘कुछ’ लिखना आरम्भ कर देगी, और कुछ क्षणों बाद अक्षरशः वैसा ही हुआ। अब मेरी जिज्ञासा बढ़ चली की आखिर , , हाथ में कागज़ का बण्डल साथ में बेतरतीब से कपड़ों से ठूंस ठूंस कर भरा गया एक थैला , आखिर ये महिला क्या कर रही है ? मेरा सारा ध्यान उस विस्मितकारी व्यक्तित्व पर टिक गया था। महिला होने के नाते शालीनता का विशेष परिचय देते हुए मैंने पूछा – ‘ मैडम , आप यह क्या तैयार कर रही हैं ?’
‘ Perhaps you don’t know , I too was an employee here in this university as a stenographer from the beginning of year 1987 when this was founded here . ‘
मैं उसकी धारा प्रवाह अंग्रेजी सुन कर हतप्रभ था। हिंदी भाषी क्षेत्र होने के कारण राजस्थान में बहुधा हिंदी ही उपयोग में लाई जाती है। विशिष्ट छाप छोड़ने के मद्देनज़र कुछ पढ़े लिखे लोग अंग्रेजी का उपयोग करते हैं। सहसा उसकी आवाज़ कर्कश और तेज़ होती चली गई। अचानक उसने एक याचना मय सवाल दाग दिया – ‘ will you give me please 10 rupees?’ मैंने कुछ सोचा और २० का एक नोट उसे पकड़ा दिया। फिर कुछ सोचने के बाद वो पुनः बोली- आप मुझे ५ रुपये और देंगे? मैंने एक सिक्का और उसकी ऒर बढ़ा दिया। अब मेरी हिम्मत बढ़ने लगी , जैसे उसने मुझे पूछताछ जारी रखने की अनुमति दे दी हो। …. लेकिन सहसा ही उसने रुख बदल लिया। ‘ देखिये देखिये आप आप बहुत अच्छे इंसान हैं। you have helped to me . you are a great man . but let me please do some work .’ फिर यकायक उसने अपना सामान समेटना आरम्भ कर दिया और चल पड़ी। कुछ ऐसी दूरी पर जहां से मैं न दिखाई दूँ , जा बैठी। मैं उसके बदले व्यवहार को समझने की कोशिश करने लगा।
और  वो अचानक चल दी …

और वो अचानक चल दी …


कुछ दूरी पर बैठा एक व्यक्ति मेरी स्थिति को भांप पास आ बैठा। पूछने पर उसने अपना नाम रामेश्वर और वहां का माली होना बताया।
रामेश्वर कहने लगा – ‘ आप जिन महिला से अभी बतिया रहे थे , उसका नाम नीलम सिंह है। इसी यूनिवर्सिटी में इंग्लिश की स्टेनोग्राफर थी। इंग्लिश में M . A . है। इनके पति भी यही कार्यरत थे। अचानक हुए उनके देहावसान ने इनका मानसिक संतुलन खो दिया है। इन्हे सेवानिवृत्ति दे दी गई है, और पेंशन यही के बैंक में जमा हो जाती है।
मैंने कुछ दुःख मिश्रित भाव के साथ पूछा – ‘ इनका कोई और है इस दुनिया में ? रामेश्वर बोला- ‘ एक बेटा है जो कभी कभार आता है पेंशन निकलवाने। ‘ रामेश्वर आगे बोलता रहा , लेकिन मुझे सारी तस्वीर जैसे साफ़ दिखाई देने लगी थी। आगे की कहानी का जिक्र करने की वजह नहीं रह जाती है , लेकिन एक बिंदु पर रह रह कर मेरा ध्यान जाता रहा – हमने व्यवसायिक शिक्षा में यूँ मानो झंडे गाड़ दिए हैं किन्तु पारिवारिक रिश्तों में हमारा विवेक और ज्ञान तार तार होने लगा है। छोटे होते परिवारों ने मन और दिल उससे भी कई गुना छोटे कर दिए हैं। एक सवाल हमारी सरकार को भी कठघरे में खड़ा करता है। बच्चों, महिलाओं और वृद्धों के मूलभूत अधिकारों को हम संरक्षित नहीं कर पाये हैं। इस दिशा में हम वैश्विक स्टार पर काफी पीछे हैं।
मैंने पुनः नीलम जी की तरफ रुख किया। मन में जैसे भारीपन आ गया था। मुझे देखकर वो किंचित मुस्कुराई , पर भय मिश्रित भाव लिए बुदबुदाने लगी। ” मेरा तो कोई नहीं है , मैं मैं कहाँ जाउंगी अब ?’ यह कहते कहते उसने अपना रुख मोड़लिया था , जैसे उसे पता था , किऔरों की तरह मैं भी उसके लिए कुछ नहीं कर पाउँगा।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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1 Response to एक दुपहरी जीवन की …

  1. Babbal Mahaur says:

    सच कहु तो आपके इस ब्लॉग में जीवन का एक ऐसा सच छुपा है जिससे आधुनिक पीढ़ी समझने प्रयास भर भी नहीं करती, और इसका मूल कारण हमारे परिवारों में घटती संस्कारों की भावना है।।।

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