शेरखान की सवारी

” वक्त ” …. बहुत ही दमखम और वज़नदार शब्द है यह। कभी इसके हाथों हमारा चीरहरण होता है तो कभी सीताहरण की तरह हम ही अपह्रत हो जाते हैं। शेष रह जाती हैं तो बस यादें।
यादों के जखीरे से आज जो मै आपके सँग बांटना चाहता हूँ वो है … शेरखान कि सवारी। sherkhaan
चलिए आपको लिये चलता हूँ अपने बचपन के शहर अजमेर मे … जहां मैं पला बढ़ा। . ज्यादा औद्योगिकरण नहीं हो पाने के कारण अजमेर आज भी कुछ पुरानी परंपराएं ओढ़े हुए है, और एक जिसका जिक्र मैं यहां करना चाह्ता हूँ वो हैं अजमेर की सडकों पर सरपट दौडते ताँगे। घोड़े की टप-टप आवाज के साथ सफ़र का शाही अन्दाज़। बचपन में देखा करता था एक नगर सेठ को जो रोज़ाना सुबह सवेरे बड़े से थैले मे रोटियां भरकर ताँगे मे बैठ जाते थे और धीरे धीरे बढ़ता हुए तांगा और पीछे मिलते मार्ग पर घूमते हुए कुत्ते और गायें …. सेठजी का इस तरह रोटियां बांटते जाना मुझे बहुत लुभाया करता था जो ना जाने आज कहाँ लुप्त हो गया। उस दौर में बहुचर्चित फ़िल्म शोले का ताँगा भीं खूब सराहा गया .
हुआ यूं कि मेरी बेटी ताँगा देख एकाएक उसमेँ बैठ्ने की ज़िद कर बैठीं। कुछ पल सोचने के बाद मै भी सहमत हो गय। दरअसल ताँगे में बैठने का अनुभव मै अपनी बेटी के साथ बांटना चाह रहा था। फिर क्या था … मोलभाव के बाद हम ताँगे पर सवार थे। पीछे की और बैठे परिजनों कि तरफ़ से आतीं हुई विस्मयमिश्रित ख़ुशी की हलकी चीखो से मे प्रसन्न हो रहा था और अपने निर्णय से संतुष्ट भी। आगे की तरफ बैठा मैं अब ‘पीछे’ लौटने लगा था। तांगेवाला २०-२२ वर्षीय युवक था।

taangewaalaa  -mukhtaar

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उसके साथ मैं अब मित्रवत और भावुक हो चला था। पूछने पर उसने बताया कि यह रोज़ाना 150 किलोमीटर तक दौड़ लगा सकता है। इससे पहले कि हैरानगी बढ़ती इतिहास स्मरण होने लगा था कि किस तरह युद्ध के सैनिक एक रात या दिन मे गांव के गांव लांघ जाते थे। ज्यादातर ये घोड़े ही आवागमन के तीव्रतम साधन हुआ करते थे। निर्णायक युद्ध इन्ही पर सवार होकर लड़े जाते थे। महाराणा प्रताप और झांसी की रानी के घोडे इतिहास मे अमर हो गये। फिर मुझे अपने ही प्रश्न पर एकाएक हंसी आ गई कि.… क्या ये थकता नहीं ? भूल गया कि वक्त के सिवा सब कुछ थक जाता है।
घोडा सचमुच ‘घोडा’ होता है। कलपुर्जों के आधुनिक युग में शक्ति का मापदण्ड इसी ‘हार्सपावर’ के रूप में जाना जाता है।
तांगेवाले क नाम मुख्तार थ। उसने बताया ” बाबूजी मै जब ११ साल का था तब ख्वाज़ा के दरबार मे आया था और तब से यहीं का होकर रह गया।” कारण पूछने पर मालूम हुआ कि अम्मीजान के इंतकाल के बाद अब्बू ने दूसरा निक़ाह कर लिया और उस अनाथ क़ी सुध लेने वाला अब कोई बचा न था। माँ चली जाती है तो भाग्यशाली हीं संवर पाते हैं। फिर मुझे थोड़ी ख़ुशी हुई जब उसने यह कहा कि अब यह ताँगा और शेरखान दोनो मेरे हैं। मैं जान गया था कि मुख्तार का वफ़ादार घोङा ही शेरखान था। रास खींचकर जब मुख्तार चिल्लाता … ‘शेरखान… और तेज़, साब को जल्दी पहुँचाना है ‘ तो सचमुच , वो हवा से बातें करने लगता। उधर मेरी बिटिया खुश हो चली थी इधर मै दार्शनिकता मे गोते लगा रहा था। सचमुच , एक जानवर जितना प्यार इन्सान को दे सकता है , उठना एक इन्सान इन्सान को नही । पूछने पर मुख्तार ने बताया कि शेरखान को रोजाना 10 किलो अनाज का दाना चाहिए। विस्मय की गुंजाइश ना थी क्यूँकि उसकी मेहनत और ताकत सब कुछ बयान कर रहीं थी। उतरते वक्त मैंने उसे 20 रुपए ज्यादा दिए। ना जाने किसके खातिर। …शेरखान के लिये या मुख्तार के वास्ते !! पर बचपन मे दर्जनों बार सवारी करने के बाद भी इस बार शेरखान की सवारी मुझे नया अनुभव दे गयी थी।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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3 Responses to शेरखान की सवारी

  1. शेरखान के लिये बीस ज्यादा देना बहुत ठीक किया। पर कितने लोग यह भावना रखते हैं।

  2. alokdilse says:

    आप सच ही कहते हैं सर…उन लोगों को तो नमन ही करूँगा जिन्होंने बेजुवानों की आवाज को सुना है और यथासंभव उन्हें अपने जीवन में जगह भी दी है।

  3. Pingback: शेरखान की सवारी | ajoshi1967

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