बात सीधी सोच की ..

   दुर्घटना की वजह से उन्हें एक अस्थि रोग – चिकित्सालय में भर्ती करवाना पड़ा। चाहे परिस्तिथिवश ही सही मगर आराम मुद्रा में देख कर मुझे सुखद अनुभव हो रहा था। मोटरसाइकिल से फिसल पड़ने के कारन उनकी बाई टांग में घुटने से नीचे की हड्डी टूट गई थी। डॉक्टर ने यह कहकर उन्हें सांत्वना दी कि आपके घुटने से नीचे की हड्डी टूटी है प्रभु का आशीर्वाद है कि आपके घुटने की कटोरी सकुशल है। यही वाक्य अब उनके लिए सकारात्मकता लिए ब्रह्म वाक्य बन गया है।
ये ज़नाब मेरे जानकार एवं मित्र भी हैं। हम अलग अलग उद्यम एवं पृष्ठभूमि से हैं , किन्तु विचारों की लेशमात्र एकरूपता दो व्यक्तियों को करीब ला देती है।
   ५१ वर्षीय श्री आनद सिंह पेशे से अद्ध्यापक हैं। एक बार उनके अनुरोध पर , मैं उनके साथ एक शिवालय गया था। शहर से दूर निर्जन भूमि पर बना वो १६ वी सदी का शिवालय मेरे खयालातों से मिलता जुलता हुआ प्रतीत हो रहा था। वहां जाकर कबूतरों के दाने पानी का प्रबंध करना एवं शिवालय के गर्भगृह की साफ़ सफाई का उनका प्रस्ताव मुझे लुभा रहा था। मैंने अपनी सहमति जता दी थी। और मैं इस उपक्रम में उनके साथ हो गया था। दूसरों के लिए जीना और सात्विकता के द्वारा परोपकार हेतु मेरा वोट हमेशा पक्का रहता है। ऐसे कार्यों के द्वारा मेरी आत्मा का पोषण होता है मैं ऐसा महसूस करता हूँ।
आनंद सिंह जी यहीं तक सीमित नहीं रह जाते। मंदिरों में जाकर दीपदान (खासकर हनुमानजी के मंदिर मे जाना) और सरकारी चिकित्सालयों में जाकर निर्धन मरीजों के मध्य मुद्रा का वितरण करना उनके सकारात्मक उन्माद में शुमार हैं। यहां मैं उनसे कुछ पृथक हो जाता हूँ। ५० मरीजों में जाकर ५० -५० रूपये बांटने से बेहतर है एक असहाय को २५०० रूपये की मदद दें। ये आंकड़ों का खेल मुझे कुछ रुचता नहीं। जब लक्ष्य कई धाराओं में विभक्त हो जाता है तो अपना असर क्षीण कर देता है। किन्तु अलग विचारधारा के होते हुए भी मैं आत्मिक रूप से उनका समर्थन करता हूँ कि कमोबेश चिंतन सकारात्मक है। इसी की सख्त जरुरत है हमारे समाज को। दुर्जन बन कर अन्य प्राणियों का चैन हर लेने से बेहतर है एक सामान्य जीवन एक गुमनामी का जीवन जी लेना। यही सोच मुझे भीतर से निर्णायक होने मदद करती रही है।
   आनंद सिंह जी प्रत्येक वर्ष आने वाली हनुमान जयंती पर चौगुने उत्साह के साथ भंडारा करते रहे हैं। इतने उत्साहित रहते हैं कि अति संवाद -उच्चारण से अपना गला बैठा लेते हैं। सुबह से लेकर श्याम तक मोबाइल से लेकर आमने सामने के संवाद में हनुमान जी के जन्म दिवस की हार्दिक बधाइयां चलती रहती हैं। बहुधा वो बजरंगबली को कर्नल कहकर सम्बोधित करते हैं और एक सिपाही की तरह ही बराबर सेल्यूट लगता है फिर।
बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती। भीष्म पितामह , भगत सिंह , और चंद्रशेखर आज़ाद के जन्म दिवस भी इसी उत्साह एवं आत्म अतिरेकता के साथ स्मरण किये जाते हैं। जिस मिटटी में क्रांतिकारी आज़ाद ने अंतिम साँसें ली थी वहां की माटी में ये जनाब लोट पोट हो आये हैं। उनकी इन हरकतों से उनके प्रति सहसा आदर-भाव भी उत्पन्न हो जाता है।
   अस्पताल के पलंग पर इसलिए रुआंसे नहीं हुए कि उनका पैर क्षत विक्षत हुआ था। अपितु इसलिए कि ‘बाबा’ (हनुमानजी) का जन्मदिवस नहीं मनाया जा सका। आज उनकी इसी सकारात्मकता ने मुझे उनपर लिखने को विवश किया है कि ;बाबा ने घोटे से मारा है , जरूर कहीं कोई गलती हुई होगी’ …. और। …’ सजा तो घुटना टूट जाने की थी किन्तु थोड़ा सा नीचे की हड्डी तोड़ कर बाबा ने सूली की सजा सुई में बदल दी है। घुटना टूट जाता तो सब कुछ चौपट हो चुका होता। ‘
सचमुच। …. पागलपन तक की हद तक की गई भक्ति किसी लक्ष्य तक पहुचाये या नहीं किन्तु ‘सकारात्मक’ भाव…अनन्त पा लेने के समरूप है।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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1 Response to बात सीधी सोच की ..

  1. जिन्दगी जीने के लिये और अवसाद को दूर रखने के लिये जुनून चाहिये। आनन्द सिंह ने वह पा लिया है। जुनून/पैशन अगर है तो क्या नहीं हो सकता!

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