दंश- कैंसर के.…!

आज अखबार पढ़ते वक्त मैं ठिठक पड़ा था। अखबार चटपटी ख़बरें हम तक पहुँचाने के लिए चर्चित रहते हैं। चाहे जो हो लेकिन सुबह कि चाय के साथ अगर अखबार न हो तो मज़ा नहीं आता। इधर-उधर की पचास ख़बरों के साथ साथ वैचारिक, धार्मिक, शैक्षणिक , नैतिक , सामाजिक और कुछ ह्रदय स्पर्शी ख़बरों की वजह से समाज में इनका वर्चस्व कायम है। हाथ पर हाथ धरे बैठने वालों के लिए तो दिन व्यतीत करने का जरिया ये हैं ही लेकिन उन व्यस्ततम इंसानों की सुबह की प्रमुख आवश्यकताओं में भी अखबार बेदखल कायम हैं। मैंने हाई सोसायटी में तो लोगों को अखबार के साथ ही टॉयलेट में जाते सुना देखा है।
‘… एक चार वर्षीया बाला ने अपने केश त्याग दिए , महज़ इसलिए कि उसकी एक दोस्त को रक्त-कैंसर था और कीमोथेरेपी के कारण उसके सर के बाल झड़ चुके थे.… और वो काफी असहज महसूस कर रही थी . ।उसे क्या मालूम कि वो इससे कई गुना बड़ी त्रासदी से गुज़र रही है। एक दोस्त द्वारा दूसरे दोस्त के लिए किया गया काफी बड़ा त्याग ही कहलाएगा। यद्यपि इतना गहरा सोच रखने के लिए यह उम्र काफी कच्ची है।

केश दान करती  बालिका …

केश – त्याग करती बालिका

कैंसर को मैंने उस वक्त काफी करीब से देखा है जब मेरी एक परिजन कैंसर से ग्रस्त हो गई थी। रोग का द्वितीय कालांश काफी दारुण गाथा लिए होता है , हर तरफ दर्द,तनाव, धन का व्यय और तन मन की टूटन। चाहे वो पीड़ित हो या परिजन। सजा कमोबेश एक सी ही है। मैं समझता हूँ इस रोग की जकड में आया मानव तीन तरफ़ा आघात झेलता है। रोग से संघर्ष, (अंग्रेजी चिकित्सा के मामले में ) खतरनाक रसायनों और तरंगों के जानलेवा दुष्प्रभाव और ऊपर से मानसिकता पर लगातार पड़ते आघात। मारे दहशत के जीने की इच्छाशक्ति जवाब देने लगती है। सर्प-दंश के मामले में भी अक्सर जहर से ज्यादा दहशत ही वार करती है।
कुछ समय पूर्व भारत के युवा खिलाडी युवराज सिंह कैंसरग्रस्त हो गए थे। किन्तु सामान्य जीवन में पुनः लौटकर उन्होंने अदम्य धैर्य और साहस का परिचय दिया था। मैं समझता हूँ उन्हें कैंसर मरीजों एवं उनके परिजनों के लिए ब्रांड एम्बेसेडर बन कर एक और मिसाल कायम करनी चाहिए , जिसमे उन्होंने कैंसर के भी चौक्के छक्के उड़ा दिए थे।
ज्यादातर मामलों में मुख्य रूप से मरीज के परिजन अपने धैर्य खो बैठते हैं। मिलने जुलने वालों और चिकित्सकों द्वारा दिखाए गए खौफ से घबराकर वो कई बार चिकित्सा पद्दति बदलने पर मजबूर हो जाते हैं। कोई आयुर्वेद की सलाह देता है तो कोई बाबा रामदेव के प्राणायाम और सुबह सुबह तुलसी दल चबाने के नुस्खे बताता है। कोई कहता है होम्योपेथी ज्यादा कारगर है तो कोई कहता है गोमूत्र और गोबर का निकाला गया पानी मिलाकर १६ बार छान कर पीने से सकारात्मक परिणाम आता है। और इसी ज़द्दोज़हद में मरीज की रोग अवस्था गम्भीर होती चली जाती है। अंततः चिकित्सालयों में बहुधा सुनने को मिल जाता है कि आप इन्हें घर ले जाएं। ।ये अब कुछ ही दिनों के मेहमान हैं। सोचिये क्या गुजरती है एक माँ पर, एक पति पर या एक बहिन या पत्नी पर? हर जीवन अनमोल होता है। कितनी वेदना होती है जब किसी अपने का जीवन यूँ हाथ से सरकता जाता है, जैसे बंद मुट्ठी से रिसती रेत! मैं समझता हूँ गंभीर रोगियों और उनके परिजनों से वार्ता में शब्दों को लेकर काफी लोचता एवं आत्मीयता अपनाये जाने की जरुरत है।
अभिनेता संजय दत्त अभिनीत एक फ़िल्म आई थी, ‘मुन्नाभाई एम बी बी एस ” . फ़िल्म का सन्देश था कि रोगी को दवा कि जितनी जरुरत होती है,उतनी ही सहानुभूति कि भी। दो अपनत्व भरे बोल और एक जादू की झप्पी(आलिंगन) पीड़ित को सकारात्मक ऊर्जा दे सकती है। मानवीय संवेदनाओं को दर्शाती इस फ़िल्म को सभी तबकों में काफी सराहना मिली थी। समस्या ये है कि मनुष्य समझता सबकुछ है लेकिन करने से हाथ भर दूर रह जाता है।
वे सचमुच ही बधाई के हकदार हैं जिन्होंने कैंसर के दैत्य को परास्त कर पुनः स्वस्थ जीवन में पदार्पण कर लिया है। मैं उनके लिए अन्तः मन से शुभकामनाएं प्रेषित करता हूँ.। और मन ही मन उस बच्ची को सलाम करता हूँ जिसने अपनी सखी की खातिर खुद को केश-विहीन कर लिया है। सन्देश यही कि  “आखिर बाल इतने भी कीमती नहीं !!”

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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3 Responses to दंश- कैंसर के.…!

  1. बेहतर है कि ब्लॉग की फुल फीड दी जाये, जिससे फीडरीडर में पढ़ा जा सके।

  2. हां मिल रही है। समस्या कुछ फीडरीडर में थी। 🙂

    • alokdilse says:

      शुभ संध्या सर,
      विषय भिन्न है किन्तु लक्ष्य बहुतेर मिलता जुलता है। मन के विचारों को साधकर दिशा देना।
      इस मामले में मैं बहुत कुछ आपको द्रोणाचार्य जी की ही तरह मानने लगा हूँ। वर्षों से विचारों का संचय था किन्तु निकास नहीं मिल पा रहा था। ‘मानसिक हलचल” तक आकर दिशा मिलने लगी है। आपका मार्गदर्शन एवं आलोचना दोनों का स्वागत करूँगा।

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