‘ मानव कि बस्ती में.… ‘

बहुमंजिला इमारत के छठे माले पर रहता हूँ मैं अपनी पत्नीजी और दो बच्चों के साथ। जब हम नए नए ही स्थानापन्न हुए थे यहाँ तो ऊपर से नीचे देखने पर डर के मारे सिहर उठते थे। मैं तो मन ही मन मुम्बई कि बहुमंजिला इमारतों में रहने वालों कि दाद दिया करता था जो कि हमारी इमारत से कई गुना ज्यादे ऊंची होती होंगी। अब तो लगता है कि छः माले कोई बहुत ज्यादा तो नहीं हैं। शहर के बाह्य इलाके में होने के कारण अब भी यहाँ देहात के से दर्शन होते हैं। खुले खेत , वृक्ष की कतारें और शहरी भीड़भाड़ से कोसों दूर , धान कि खेती वाले दिनों में …एक सुहाती गंध..… लेकिन जब आगंतुक आते ही यह कहदे कि ‘बहुत दूर आ बसे हो…..’ तो सच में पत्थर सा लगता है।  सब को तो खुश किया नहीं जा सकता ! हम भी नए युग से हैं … खुद को खुश कर लिया है बस। इमारत के अंतिम सोपान पर मेरा आवास है … A -७ , ६०१. उजाले की अधिकता और सन्न सी आती हवाओं के चलते कुछेक खिड़कियाँ तो कभी खुलती ही नहीं। गर्मियों में तो चुभती धूप से बचाव की खातिर मोटे कपडे के पर्दों से उन्हें ढांकना पड़ता है। छोटे और शनै-शनै विस्तार लेते शहरों में बहुमंजिला इमारतों कि संस्कृति ने पैर तो जमा लिए हैं किन्तु शैशव काल में ही हैं। इमारतों में रहने वाले लोग भी खुले दिल से इस संस्कृति को स्वीकारते नज़र आने लगे हैं… कोई भी अवसर हो, चाहे त्यौहार हो या दुःख की घड़ियाँ … सहभागिता का नया रसायन आकार ले रहा है। सामूहिक रूप से बिजली , पानी , चौकीदारों का मेहनताना, बाग़ बगीचों और बच्चों के झूलों के रखरखाव के खर्च ,सभी से सामान रूप से प्राप्त कर लिया जाता है। एक समिति का निर्माण कर छोटे मोटे मुद्दों को भी निबटा लिया जाता है। यूं कहें कि गाँवों की व्यवस्था नवजीवन ले रही है तो गलत नहीं होगा। सच्ची कहूँ तो मैंने इस व्यवस्था को आत्मसात कर लिया है। किन्तु जिक्र आज भद्रजनों कि बस्ती का नहीं बल्कि उन अबोध जीवों का है जो मानव के साये को अपना आशियाना बना लेते हैं। हमारे समाज में इनका भी अपना स्थान है। मेरी बंद खिड़की की मुंडेर पर रोज़ एक कबूतर का जोड़ा आ कर बैठता है। कई बार दिन में भी दीख पड़ता है। कपोत तो दर्जनों हैं यहाँ ,जो इमारत की मुंडेर और ऊपरी छज्जों पर आशियाने बनाए हुए हैं, लेकिन मैं दो कबूतरों को रोज़ ही देखते देखते उनसे मोह पाल बैठा हूँ। मैं जानता हूँ कि यदि उन्हें मेरा अहसास भी हो गया तो वे जगह बदल देंगे लेकिन मैं अपने एक तरफ़ा प्यार से ही संतुस्ट हूँ।

मेरी खिड़की  का एक बाशिंदा

मेरी खिड़की का एक बाशिंदा

कबूतर एक निहायत शांत और सीधी वृत्ति वाला जीव है। अपने बड़ों से मैंने उसे ब्राहमण भी कहते पाया है। शायद उसका आहार और जीने का तरीका उसे यह नाम दिलवाता हो। बंद खिड़की के शीशों से उनकी प्रणय लीलाएं और गुटरगूं गुटरगूं मुझे रोमांचित किये रहती हैं। जी करता है उन्हें पकड़ कर दुलारूं लेकिन मेरा ये प्यार मैं जानता हूँ वो फूटी आँख भी पसंद नहीं करेंगे। हाँ इनकी एक और भी बड़ी दुश्मन है बिल्ली…। उसे देखते ही कबूतर का दिल जैसे कांप कर सूख जाता है। लोग कहते हैं कि वे मारे डर के अपनी आँखें बंद कर लेते हैं। चतुरसुजान इसे मूर्खता कि संज्ञा देते हैं …कि मुसीबत को आता देख आप आँख बंद कर लेते हैं तो मुसीबत दूर नहीं हो जाती। सही भी है, आज के युग में भोला, मूर्ख ही कहलाता है। तड़के ही कुछ सेवाभावी इन जीवों को चुग्गा दाल देते हैं। उनका ‘धर्म’ निभ जाता है और इनकि उदरपूर्ति हो जाती है। भोर का खटका हुआ नहीं कि इनके पंखों और गले से आती गुटरगूं से अलसही भोर में जैसे चटक सी आ जाती है। रेडियो के ज़माने में सुबह सुबह वो ‘आकाशवाणी’ की धुन को मैं आज भी बहुत याद करता हूँ। पक्षियों का सुबह का कलरव जादुई असर करता है । वो शंखनाद सा करते हैं कि उठ जाओ नई स्फूर्ति का संचार कर लो।

२४ घंटों में एक सुबह ही होती है जो मेरा ध्यान सबसे ज्यादा इनकी ओर जाता दिखाई पड़ता है। सुना है बीमार को इनके पंखों से टकराकर आती हवा दी जाए तो रोग जल्दी ,जाता है … और इनकी गुटरगूं भी मस्तिष्क को स्पंदित करती है। स्वार्थी दृष्टिकोण अपनाकर देखें तो भी सौदा बुरा तो नहीं है। ये मूक जीव कभी किसी को आहत तो नहीं करते।  ये कपोत सही मायनों में हमारे ‘शांतिदूत’ ही हैं। चाहे वो सफ़ेद हों या सलेटी रंग के।

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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3 Responses to ‘ मानव कि बस्ती में.… ‘

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  2. Rakesh Ravi says:

    I have been following gyandutt ji,s hulchul for a long time and came across you and your blog. I liked it and read them all. I will keep coming back. I liked your language as well as the content.

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