चरण-स्पर्शम !!

घंटी बजाने के दरवाज़ा खुला तो मैंने देखा कि मेरे मित्र का छोटा वाला बेटा काकू खड़ा है। मुझे देख यकायक वो आगे कि ओर झुका और चरण-स्पर्श कर लिए। मैं क्या पूछने वाला हूँ उसे भी पूर्वज्ञात था। बोला- बैठो अंकल पापा अभी आते हैं।
नवयुग में भी जब अपनी संस्कृति को महसूस करता हूँ तो मन खुश हो जाता है। काकू के पापा आते तब तक मैंने संस्कृति पर विचारना आरम्भ कर दिया था।
समूचे विश्व में चरण-स्पर्श कि रीति सिर्फ हमारे देश में ही है। और जहां जहां बची है वो घर- परिवार ‘संस्कारवान’ कि संज्ञा से नवाज़े जाते हैं। सोचा जाये तो हमारे पूर्वजों द्वारा सौंपी गई यह अनमोल विरासत है , जमा पूँजी है। जिसका यशगान हमें सुनने को मिल जाता है। एक ओर ‘पश्चिम’ के लिए होड़ मची है तो वहीँ समूचा पश्चिम टकटकी आँखों से पूर्व को तक रहा है।
इंग्लिश के religion और भारत के ‘धर्म’ में बड़ा फर्क है। जहां वो ‘इति ‘ हो जाते हैं, वहाँ हमारी संस्कृति का सफ़र शुरू होता है। विवेकानंद ने अमेरिका जाकर संस्कृति का जो परचम लहराया उसे कोई कैसे भूल सकता है। touch the feet
चरण-स्पर्श के अनेकों लाभ हैं। प्रत्यक्ष भी और परोक्ष भी। बड़े छोटे में ‘कायदे’ कि शुरुवात होती है, वहीँ हाथ मिलाउ कल्चर में जैसे’बराबरी कि होड़ सी रहती है। स्वाभाविक है चरण स्पर्श के बाद गुरु-शिष्य, या बड़े-छोटे कि भावना जन्म ले लेती है। अहंकार … जो कि मानव कि सहज वृत्ति है का शमन करने में अचूक है चरण-स्पर्श। तर्क- वितर्क और अवमानना कि सम्भावनाएं नेपत्थ्य में चली जाती हैं। आपके मन में यदि कोई द्वेष जग बैठा है तो पिघलने लगता है।
चरण-स्पर्श के वैज्ञानिक पहलू पर गौर करें तो इसका रिश्ता उन अदृश्य तरंगों से है जो किसी विज्ञ पुरुष के शारीर में चलायमान रहती है और गुरुत्वाकर्षण उसे चरणों कि तरफ बढ़ाए रहता है। . जब हम ऐसे किसी व्यक्तित्व को स्पर्श करते हैं तो तरंगें चरण-स्पर्श करने वाले को भी प्रभावित करती है।
विश्व में टच थेरेपी किसी ना किसी रूप में विद्यमान रही है। किस्से -कहानियों में परी कि जादुई छड़ी के छूते ही जैसे सब कुछ ठीक हो जाता है।
गले मिलना या बाथ भरना , हाथ मिलान, सदैव प्रिय रहा है। अत्यधिक रोष या ख़ुशी से जब हमारे हार्मोन्स अतिरेक होने लगते हैं तब ‘स्पर्शता’ से उन्हें एक दिशा मिलती है। जैसे ख़ुशी में गले मिलकर हैम ‘सकारात्मक’ हो उठते हैं।
खैर बात चरण-स्पर्शम कि थी। इस क्रिया से मनों के मैल उतरने लगते हैं , और रिश्तों का समीकरण अपना स्वरुप बना लेता है।
महाभारत-काल में सिरहाने बैठे दुर्योध्न और पैरों के पास बैठे अर्जुन में से श्री कृष्ण कि कृपा पाने वाले अर्जुन ही। थे। श्रीराम -रावण के धर्मयुद्ध में रामजी ने लक्ष्मणजी से कहा- जाओ और रावण से नीति कि शिक्षा ग्रहण करो और हाँ रावण के चरण जरुर छूना। उसके बाद देह त्यागते रावण ने लक्ष्मणजी को गूढ़ रहस्यों का ज्ञान कराया।
कुछ सीखना हो तो विनम्रता पहली जरुरत होती है।
…। आज के युग में हम अपने बच्चों को चरण-स्पर्श का मोल अवश्य समझाएं…. क्या आप सहमत हैं मुझसे !!

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
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2 Responses to चरण-स्पर्शम !!

  1. चरणस्पर्श की परम्परा उत्तरप्रदेश में अधिक है। वय का और सवर्णता का आदर – दोनो है। इसमें जिसके चरणस्पर्श किये जा रहे हैं, उसपर भी गुरुता का भार रहता है!

    • alokdilse says:

      हमारी संस्क्रति और धर्म का उद्गम रहा है उत्तरप्रदेश। भगवान श्री राम और श्री कृष्ण की जन्मभूमि वहीँ तक सीमित नहीं रह गई , कही महान साहित्यकारों , चिंतकों और देशभक्तों की जननी है उत्तरप्रदेश की धरा। निश्चित ही संस्कृतियों को संरक्षित करने वाला प्रदेश रहा है सर आपका गृह राज्य। साधुवाद ।

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