रेल के डिब्बे में भारत- दर्शन !!

क्या आप भारत भ्रमण करना चाहोगे ? तो भारतीय रेल का एक सफ़र आपके लिए काफी मददगार हो सकता है। ऐसा मैं इसलिए भी नहीं कह रहा कि मैं इस विभाग से जुड़ा जो हुआ हूँ। एक यात्री के नजरिये से भी मैंने ये महसूस किया है कि चाँद घंटों कि यात्रा में भी भारत के विराट दर्शन किये जा सकते हैं। जैसे कि श्री कृष्ण ने युद्ध के रण में अर्जुन को विराट दर्शन दे दिए थे।
…आज जब एक सिख य़ात्री को अन्य यात्रियों द्वारा यह कहते हुए पाया कि ‘ पापाजी आपको बर्फी का एक पीस तो लेना ही होगा।

जब तक मैं अपना मोबाइल कैमरा ऑन करता 'पापाजी' मिठाई का पीस खाकर वापस अपनी मैगज़ीन में व्यस्त हो गए थे।

जब तक मैं अपना मोबाइल कैमरा ऑन करता ‘पापाजी’ मिठाई का पीस खाकर वापस अपनी मैगज़ीन में व्यस्त हो गए थे।

वस्तुतः भारतीय बहुत भावुक होते हैं। दिमाग का उपयोग करते करते भी दिल बीच में आ जाता है। गाड़ियों में जहर खुरानी जैसी घटनाएं अंजाम लेती रहती हैं। नशीले पदार्थों का अनजाने में सेवन कर कइयों ने धोखा पाया है लेकिन… ये मनुहार हमारा पीछा कहीं नहीं छोड़ती। किसी के यहाँ भोजन करने जब हम जाया करते थे तो मेरी माँ से मेरी अक्सर जिरह चलती थी कि माँ वो आंटी जबरन ही क्यों परोसे जाती है ? मैं नहीं जाऊँगा निमंत्रण पर। कहाँ तक मना किया जाए। वक्त के साथ अब समझ में आने लगा कि ये प्यार हर कहीं उपलब्ध नहीं होता। होटल में खाने जाओ तो कोई ज़िद नहीं करने वाला है। उस मनुहार कि चमकती सच्चाई तब समझ में आने लगती है।
जब बच्चे किसी टूर पर निकलें … तो माँ की अनगिनत नसीहतें गाड़ी रवाना होने तक निर्बाद चलती रहती हैं। लेकिन गाड़ी में सफ़र के दौरान हम खुद मनुहारों के साये में चले आते हैं। भावुकता चहुँ ओर से बरसने लगती है। गाड़ी चली नहीं कि। …। ‘आप कहाँ तक जा रहे हैं/’ …’अरे बलिया में तो हमारी ताई भी रहती है ‘ … ‘आप आइये ना कभी आगरे में। … ताजमहल घूमने लायक है। ( ये भूल जाएंगे कि पास ही बहने वाली यमुनाजी यूं लगता है कोई नाला बह रहा है। …क्या ये भी देखने आयें ,तुम्हारे आगरे में। .) … लेकिन जहां प्यार होता है , वहाँ तर्क वितरक नहीं चला करते। प्यार मनुहार में हम सब पि एच डी हैं। बातों और आग्रहों के सिलसिले कभी कभी मोबाइल नंबर के आदान प्रदान तक चले आते हैं।
….लेकिन विदेशों में ये मनुहार , ये लिहाज नहीं चलते। facebook पर मेरी एक माँ सामान कैनेडियन मित्र हैं। उम्र ७० वर्ष है। मेरी माँ चल बसी दुनिया से तो में भावुक हो उन्हें ही माँ सम्बोधित करने लगा। फलस्वरूप वो मुझे dear son लिखने लगीं। लेकिन एक बार मैंने उनके घर कि तस्वीर डाउनलोड करली जिसमे दूर उनका पोता भी दीख पड रहा है तो वो बिफर पड़ी। …कि इस तरह बिन पूछे तस्वीर लेना अपराध है। मेरा मन कुंठित हो गया। फिर कुछ दिन बाद यह सोच कर मैंने खुद को शांत किया कि विदेशियों के पास भावुकता का ऐसा रत्न नहीं है जो भारत में बिखरा पड़ा है।
भावुकता में आकर हम अपना अंशदान कर डालते हैं। …चहे वो लम्पट नेता हो या मुस्टंडा भिखारी ! जरा सी रहम कि भीख हमारी आँखों पर कपडा डाल देती है………यहि हमारी संस्कृति है। प्रेमाभिव्यक्ति कि बाढ़ में हम सब बहा डालते हैं। शायद यही वजह है कि पुरे विश्व में हम अलग पहचान रखते हैं। …। आज ही कि ये बात थी और आज ही का सोच। …इसी के चलते कब मैं जयपुर से कोटा आ पहुंचा। ।सफ़र का पता ही ना चला। ।!!

About alokdilse

भारतीय रेलवे में यात्री गाड़ियों के गार्ड के रूप में कार्यरत.. हर वर्ष नए वृक्ष लगाने का शौक.. जब मन् भावुक हो जाता है , लिखना आरम्भ कर देता हूँ। ईश्वरवादी, राष्ट्रवादी और परम्परावादी हूँ। जियो और जीने दो में यकीन है मेरा।
This entry was posted in Uncategorized. Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s