घट के राम

पूरा आश्रम , ‘हरे राम हरे राम..’के संकीर्तन से गुंजायमान हो रहा था।
गुरु भाई ही नहीं , लग रहा था जैसे पेड़ की शाखों पर बैठे पंछी भी अपनी कलरव में प्रभुनाद कर रहे थे। हवा में फैला हुआ ईश स्वर तन मन में संचारित होने लगा था।
श्री पुष्कर जी के सप्त -ऋषि घाट पर स्थित पावन आश्रम !!
आज गुरुपूर्णिमा थी और माँ-पिताजी मुझे अपने गुरु आश्रम में लाये थे ।
बंगाली बाबा नाम से पहचाने जाने वाले गुरुदेव श्री सीताराम ओंकार नाथ जी महाराज का आश्रम था वह। बाबा अक्सर कलकत्ता से पुष्कर जी आकर प्रवास करते थे।

धुंधली यादों के धरातल पर किसी ठोस वजह का तो भान नहीं , बस इतना भर याद कि पिताजी ने उन्हें  गुरु मान कर उनसे दीक्षा ली।
फिर पूरा परिवार उनका अनुगामी बना।
आज मुझे दीक्षा के लिए लाये थे पिताजी।New Doc 38_1_20151230220337689
बाबा एक कम्बल पर बैठे हुए थे। कृष काया, ठोडी पर लंबी सफ़ेद दाढ़ी, जटाओं सी केश राशि, तन पर एक रामनामीऔर कमर अंगरखी , झुकी हुई कृष काया और चेहरे पर गाम्भीर्य …
उनके चारों और बैठे अनुयायी सतत हरे राम हरे राम..नाम के प्रवाह  में लीन थे। आत्मविभोर कर देने वाला वातावरण था।
पिताजी ने पुष्कर जी के घाट पर पुनः एक बार स्नान किया। मुझे भी अपना हाथ पकड़ कर डुबकी लगवाई। और सफ़ेद धोती पहनाई ।
मैं नव पोशाक में खुद को बड़ा असहज महसूस कर रहा था। पूछने पर माँ ने बताया की दीक्षा कार्यक्रम है अतः धवल वस्त्र पहनाये हैं।
मुझे क्या पता था भविष्य के गर्भ में शुभ्र रंग मेरा इन्तजार कर रहा है।
घाट पर कोई मछलियों के लिए दाना बेच रहा था। माँ ने मेरे हाथों से मछलियों को दाना डलवाया। उस वक्त तो वह मेरे लिए एक कोहतूल भरा कार्य था। आज उसका मर्म समझ में आता है।
हमारे वैष्णव धर्म की व्याख्या बहुत ही विशाल है। चींटी से लेकर हाथी तक सभी को भोजन कराने को हम “धर्म” समझते आये हैं।
मैं अपनी माँ के भावों को अब समझने लगा हूँ कि क्यूँ वो, चींटी, चिड़ियाँ, गाय, श्वान, कपोत सभी को अन्न स्वरूप आहार देना मुझे समझाया करती थी।
आज मैं अपने बच्चों को इन सब बातों का मर्म समझा कर अपनी माँ की नीति को अगली पीढ़ी में पहुँचाना चाहता हूँ। हमारा धर्म इसी तरह फलित होता रहता है।
नहा धोकर मैं गुरु दीक्षा के लिए एक कुशा के आसन पर बैठने का निर्देश हुआ।
कुछ ही समय पश्चात गुरुदेव पधारे। उन्होंने मेरे सर पर अपना हाथ रखा और झुक कर मेरे कानों में,
एक मन्त्र का उच्चारण किया-
|| हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे,
हरे कृष्णा हरे कृष्णा , कृष्णा कृष्णा हरे हरे||

खड़ाऊ पहने उनके चरणों में मैंने सर झुकाया। मुझे
आशीर्वाद देकर वे  अगले दिक्षुक की तरफ बढ़ गए।
9-10 बरस की उम्र रही होगी मेरी। इन सब बातों का अर्थ समझ पाना मेरे बस में नहीं था। पिताजी ने सहमति दी है तो जरूरी ही होगा। बस यही समझ कर अपने कर्म को अपनी जिम्मेदारी समझ लिया करता था।
गुरुदेव की वजह से मेरा घर राममय रहता था। पिताजी माँ एवं बहनें नित्य ही राम का नाम पुस्तिका में लिखते रहते थे। 12-13 वर्ष की वय तक आते आते मैंने भी यह लेखन आरम्भ कर दिया।
हर वर्ष गुरुपूर्णिमा को हम अपनी लिखी हुई राम नाम की पुस्तिकाएं गुरु आश्रम में ले जाकर गुरुदेव को भेंट करते। इसे ही वह गुरु दक्षिणा कहते थे।
आश्रम का मुख्य कक्ष ऐसी पुस्तिकाओं से अट जाया करता था।
मैं नहीं समझता कितना पाप / पूण्य का लेखा हुआ होगा , लेकिन राम नाम में मेरी श्रद्धा बहुत गहरी हो गई।
नवरात्रि के शक्ति पूजन के दिनों में भी मेरे घर में श्री राम जी की ही पूजा होती थी।
घर का नाम तक ‘श्री राम कुञ्ज ‘ रखा गया था।
आज ऐसे नाम नहीं मिलते अब ‘विला’ हो गए हैं।
मातृ या पितृ छाया भी हैं कहीं कहीं, लेकिन हकीकत कुछ और।
…आज उस आश्रम का नक्शा बदल गया है।
गुरुदेव के देवलोकगमन के पश्चात वहां काफी समय तक उनके शिष्य राम जप किया करते थे । फिर एक समय ऐसा भी आया जब आश्रम में जाने वाले भक्तों की संख्या में कमी होती गई।
और राम नाम का संकीर्तन फिर ऑडियो सिस्टम के द्वारा जारी रखा गया।
पिछले दिनों मैं हर बार की तरह हीअपने आश्रम में गया।
हर वक्त खुला रहने वाला आश्रम का मुख्य द्वार आज बंद था। उसे धकेल कर अंदर गया तो सन्नाटा फैला पड़ा था। बंदरों की एक टोली जरूर पेड़ों पर धींगा मस्ती कर रही थी।
उनका वो सन्नाटा तोडना मुझे अच्छा लग रहा था।
मालूम हुआ , वहा एक रखवाला रखा गया जो शायद भोजन व्यवस्था के प्रयोजन से कही इधर उधर था।
आँखें बंदरों की उछल कूद पर थीं मेरी, किन्तु कान उस निरंतर उठती हुई ध्वनि को तलाश रहे थे जब अब रुक गयी थी। वो राम जप का ऑडियो सिस्टम अब स्थिर हो चला था ।
मैं जैसे किसी अदृश्य सशक्ति के द्वारा निर्देशित हो रहा था। मानो बाबा कह रहे हों….
“आलोक , यहाँ भले यह संकीर्तन रुक गया , किन्तु अपने ह्रदय में तुम राम नाम का जाप यूँ ही सतत् बनाये रखना। यूँ ही..जब तक सांस थक न जाए जब तक…..!!”

 

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गुलाब जिंदगी ?

हर पल खुशियां
नृत्य, रास
हंसी के छल्ले
खिलते चेहरे..
जिंदगी यहीं तक नहीं !

गुलाब जिंदगी
काँटों का अहसास
तीखी तो कभी
मीठी वेदना
अव्यक्त भय
पलटते मोहरे
और
बदलते चेहरे
यही है..जिंदगी !!
🌿

#अलफ़ाज़_मेरे

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आशीर्वाद की अनुभूति~

(7 अप्रैल 2017)

बीती रात मुझे पूरे समय नींद नहीं आई। हाँ तड़के कोई 4 बजे बाद कोई आँख लगी होगी।
लेकिन आँख लगने के बाद जो मैंने स्वप्न में देखा तो अब तक पछता रहा हूँ कि मेरी आँख क्यों खुली ? मैं उस परमानंद के प्रसाद को और अधिक लेना चाह रहा था । कोई साढ़े 5 बजे आँख खुली और मैं उस आनंद-यात्रा से बाहर निकल आया था। उठते ही मैनें श्री गजानंद जी , हनुमान जी आदि देवताओं को अश्रुपूरित आंखों से नमन किया और देर तक पुलकित रहा और संभवतः पूरे दिन रहूंगा भी!
अभी रामनवमी गुजरी ही है और मैं अस्पताल में बीमार अवस्था में 4 दिन निराहार दवाइयों और ड्रिप पर काट कर कल ही आया हूँ अर्थात मेरे आधे नवरात्रे परमात्मा की कृपा से निराहार अवस्था में हो गए थे।
मेरे पिताजी ने भगवान् राम के भजन पूजन की एक संध्या या पूरी रात का आयोजन किया जिसमें मेरे परिवार के अनेकानेक बड़े पधारे थे। भगवान् राम लक्ष्मण सीता माँ हनुमान जी की बड़ी बड़ी तस्वीरें सजी हुई थीं।
एक महंत द्वारा केसर मिलाकर खूब भांग बांटी जा रही थी। सामने बैठे थे कमाल भाईसाब।, जो महंत के भांग बांटने के कार्क्रम में सहयोगी रूप में उपस्थित थे । बाउजी के पड़ौसी मित्र और अपने स्वजाति मित्र लाडली प्रसाद जी समेत कई पड़ौस के सज्जन पधारे थे।
एक बड़े भंडारे का आयोजन हुआ जिसमें पूड़ी, आलू की सब्जी और हलवे का भोजन सैंकड़ों लोगों ने किया। मेरी भुआ, मम्मीजी, किरण समेत सभी बहनें और भुआ जी की समस्त पुत्रियों और जवाइयों समेत समस्त परिवार शामिल हुआ।
सबसे बड़ी बात बाऊजी ने हनुमान जी का रूप धारण किया और झांकी के रूप में भगवान् राम के समक्ष घोटा लेकर खड़े हुए थे।
मैंने उनकी कुछ तस्वीरें मोबाइल में लेने का प्रयास भी किया।
बाउजी को इस रूप में देखकर और समस्त परिवार को एक साथ काफी अंतराल बाद भोजन करते हुए देखकर मैं बहुत प्रसन्न था।
लेकिन सपना तो सपना ही होता है। टूटना था….टूट गया।
सुबह के साढ़े पांच बजे थे। मैंने उठकर भगवान् की मूर्ति को हाथ जोड़े और इस अद्भुत दर्शन से रोमांचित करने के लिए आंसूओं के साथ धन्यवाद दिया।
प्रभु की, और मेरे घर के बड़े जनों की, माता पिता और सभी वृद्ध जनों की कृपा बनी रहे। कमल भाईसाब तो मेरे स्वप्न में अक्सर आते हैं लेकिन आज समूचा परिवार दर्शन दे गया।
मैं अभिभूत हूँ।
आप जो भी बड़े छोटे हैं अन्य परिजनों से मेरे इस स्वप्न को बाँटें और अर्थ निकालने का प्रयास करें, घर के बड़े जनों और ईश्वर ने क्या संदेश और क्या आदेश दिया था।

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सिक्के का दूसरा पहलू

पूरा परिवार दूरदर्शन में ऑंखें गड़ाए कपिल शर्मा के शो में डूबा हुआ था कि अचानक बिजली गुल हो गई।
निराशाओं के स्वर फूटने लगे! कोई ‘धत तेरे की’, कोई ‘मर गए’, कोई ‘ओ तेरी ! ‘…जैसे शब्दों के माध्यम से अपनी हताशा दर्शा रहा था। तलाश किया तो मोमबत्ती नहीं मिली।
बचपन में तो लालटेन तैयार रखते थे माँ पिताजी मगर अब जमाना काफी आगे निकल गया है।
4 लोगों के छोटे से परिवार में कोई क्या क्या देखे!
आखिर में तय हुआ चलो छत पर चला जाए तब तक आ ही जायेगी बिजली।
गाँव से बड़े भाईसाब भाभी जी आये हुए थे।
छत पर अर्से बाद आया था। पूरे शहर की बिजली नदारद थी । हर तरफ अँधेरा.. मगर आसमान टिमटिमाते तारों से जगमगा रहा था। काफी समय के बाद आसमान को इस तरह निहारना अच्छा लग रहा था। मेरा भतीजा आकर पूछने लगा, चाचा देख कर बताओ सप्तऋषि मंडल कहाँ है?
उसका सवाल मुझे झकझोर गया। बचपन लौट आया था । ये सवाल तो कभी मेरा भी हुआ करता था अपनी बहनों से जब हम गर्मियों में छत पर सोया करते थे। तारों की भांति भाँति की काल्पनिक रचनाओं को भी बनाकर निहारा करते थे।
बिजली गुल हुई तो हाल ही के चुनावों में मुद्दा बनी गुल बिजली का जिक्र छिड़ गया। सटी हुई छत पर पड़ौस के तिवारी जी भी दीवार कूद कर आ गए थे, चर्चां से जुड़ने के लिए।
यूपी के चुनावों में बिजली का क्या किरदार रहेगा ये तो परिणाम बताएँगे लेकिन बिजली का गुल होना मुझे जरूर मोह रहा था।
कभी टीवी तो कभी कंप्यूटर और रहा सहा मोबाइल भी समय छीन लेता है। अंदर ही अंदर गुल हुई बिजली को मैं धन्यवाद दे रहा था। रूटीन की लाइफ से कुछ हटकर सबका इकट्ठे होकर बतियाना मन को सुकून पहुंचा रहा था।
आज का सबसे ज्वलंत मुद्दा , जो कि चर्चाओं में आ जाता है और वह है समय का अभाव।
अरे भई, समय तो उसी रफ़्तार से चलता आ रहा है मगर अचरज है हम समय से भी तेज हो गए हैं। साथ साथ चलता हुआ समय, अब ओझल हो जाता है।
भाईसाब किसी सामाजिक कार्यवश आ गए थे तो मिलना हो गया लेकिन उनसे कैसी शिकायत! जब समय का रोना मैं भी रोता हूँ।
बातों का दौर चला । दिल में एक तसल्ली थी कि बिजली गुल होने के बहाने ही सही थोड़ी देर के लिए कृत्रिम जिंदगी से निकल आये थे।

बतियाते हुए भाईसाब विषयांतर होने लगे थे। बीच बीच में तिवारी जी का हूँ का संपुट  दर्शा रहा था इंसान अपने अतीत से कितना लगाव रखता था।
भाईसाब का मत था कि आधुनिक देन मोबाइल सुविधाओं के साथ साथ खोखला भी बना रहा है। कई बीमारियां सिर्फ मोबाइल की देन होता जा रहा है।सर झुकाए मोबाइलरत प्राणी मोबाइल से परे कुछ नहीं सोच रहा। उसकी बैटरी 30 प्रतिशत से नीचे आते ही व्यग्रता देने लगती है।
खबरों और सूचनाओं का आदान प्रदान जरूर तुरत फुरत हो जाती है लेकिन डाकिये का इंतजार और खत की उत्सुकता अब कवियों और साहित्य चर्चाओं में ही मिलेगी।
हर चीज में जल्दी और कम समय में परिणाम ….फिर भी इंसान के पास वक्त नहीं।
तिवारी का समर्थन चर्चा को और अधिक उत्साही बना रहा था।
ये नेट…इस नेट में दुनियां उलझती जा रही है।
क्यों, सही न कहता हूँ बोलो, भाईसाब के इस कथन पर मुझे हां में गर्दन हिलानी ही पड़ी । मैं सोच रहा था जाने कब बिजली आएगी, भाईसाब तो आज टेक्नोलॉजी को रौंधे मानेंगे। मगर हकीकत तो यही थी तकनीक ने मानवता को रौंधना आरम्भ कर दिया है।
उस रात कुछ पल बचपन जैसे गुजरे थे
कोई अहसास था जो छूकर निकला था।
ये दौर कितना अजीब था
जो कहाँ ले आया मुझे।
दे गया बनावटीपन और
छीन ले गया नैसर्गिकता मेरी।

आदतन मैं कुछ शायराना हो चला था ।
अक्सर भावुकता में डूबना अच्छा लगता है। वक्त को पकड़ना चाहता हूँ और बंद मुट्ठी की रेत सा सरक जाता है ये।
फिर एक शोर उठा!
बिजली लौट आई थी। हम अतीत और बचपन से लौट आये थे हकीकत के पथरीले धरातल पर।
सबको रूटीन जिंदगी का दंश बेदने लगा । किसी को रसौई तो किसी को टीवी देखना था।
समय फिर सरपट दौड़ने लगा था…बनावटी सड़क पर…।

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दरारें

आज शाम अपने किसी ख़ास जन से मुलाक़ात हेतु उनके निवास स्थान तक गया था।
चूंकि वहां अक्सर आना जाना होता है अतः औपचारिकता को कहीं जगह नहीं है।
बैठे हुए टेबल पर एक कार्ड पर नजर पड़ी।
कार्ड विवाह निमंत्रण का था किंतु कुछ अलग सा प्रतीत हो रहा था। जहां हिंदू धर्म में वैवाहिक पत्रिकाएं मुख्यतया रिद्धि सिद्धि के देव और भारत के आराध्य श्री गजानन महाराज के चित्र ,उनके आह्वान और आशीर्वाद के साथ सजी होती हैं उस कार्ड पर ऐसा कुछ नहीं था लेकिन उस पर दो फोटो प्रमुखता से छपे हुए थे। एक गौतम बुद्ध और दुसरे भीमराव अंबेडकर।

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वैवाहिक निमंत्रण-पत्रिका

पत्रिका के अंदरुनी पृष्ठ पर दृष्टिपात किया तो जय भारत ,जय भीम और नमो बुद्धाय के साथ चिरंजीवी का सौभाग्यवती आदि शब्दावली की जगह उपासक और उपासिका जैसे शब्दों के साथ वर वधु के नाम छपे हुए थे।
पूरे कार्ड में हिन्दू धर्म के देवताओं का कहीं जिक्र नहीं !
आज के आधुनिक परिवेश में कुछ लोग ईश्वरवाद को अलग रख कर अपने ही में जीते हुए देखे जाते हैं। वहां तक समझ आता है किंतु किसी मानव को महामानव के दर्जे से ऊपर ले जाते हुए भगवान् मान लेना तर्कसंगत नहीं लगता। ईश्वर और मानव को क्या समकक्ष रखा जा सकता है?
चूंकि हिन्दू रीतियों से परे हटकर किसी हिन्दू विवाह का कार्ड पहली बार मेरे सम्मुख था, कौतूहल का विषय बन गया था।
दो तीन बंधूवर और भी उपस्थित थे वहां।
चर्चा का अच्छा खासा विषय बन गया था। बहुत देर तक चिंतामग्न होते हुए वैचारिक झझावात मन को उद्वेलित कर रहे थे। आखिर कुछ हिंदुओं को हिंदुत्व से ही ऐसी क्या चिढ़ होने लगी? इस धर्म में ऐसी अपूर्णता कहाँ है जो अलग पंथ बनाकर उसका अनुसरण किया जाने लगे।

नदी से अलग होकर बहने वाली धाराएँ लक्ष्यविहीन होकर भूगर्तों में समाहित हो जाती हैं। किसी एक बिंदु पर जाकर हमें भी सोचना होगा कि खामी धर्म में नहीं तो हम में ही है जो बात यहां तक आ पहुंचती है। हिंदुत्व कोई धर्म ही नहीं अपितु सफल जीवन जीने की एक कला है। जरिया है। हमने जबरन किसी पर हिंदुत्व नहीं लादा।
जिस धर्म की पूजा अर्चना में ही विश्व का कल्याण और धर्म की स्थापना का संकल्प लिया जाता हो उस धर्म से उसी के लोगों का टूटकर विद्रोही हो जाने जैसा कार्य है यह।
अगर मुस्लिम , ईसाई या अन्य संप्रदाय हमारे आराध्य देव गणपति को न मानें वह समझ आता है किंतु हिन्दू ही हिंदुत्व और उसके आराध्य देवों की ऐसी उपेक्षा असहनीय है।
चर्चा में जो बात उभर कर आई उससे ज्ञात हुआ कि कुछेक जगह अनुसूचित जातियां और जन जातियां अब गौतम बुद्ध और भीमराव अंबेडकर को ही भगवान् का दर्जा देने लगी हैं। यहां तक कि महाराष्ट्र समेत कुछ हिस्सों में वैवाहिक रस्मे जैसे अग्नि को साक्ष्य मानकर लिए जाने वाले एक प्रमुख रस्म , सात फेरे भी अंबेडकर प्रतिमा के समक्ष लिए जाने लगे हैं।
किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता उसके देशवासियों के एकीकृत होकर मजबूती प्रदान करने में है किंतु यह sc/st का जहर अब आरक्षण ही नहीं अपितु अपने आराध्य देव और अपना धर्म ही अलग कर चलना चाह रहा है। दशकों से जातियों की आग में सुलग रहा भारत देश अब एक नए युग रहे पंथ का सामना करने जा रहा है ।कमोबेश एक समाज की नई सोच से तो ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। ऐसा क्यों किया जा रहा है समझ से परे है और शोध का विषय भी।

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नई मुसीबत

सावन की झड़ी हो जैसे कोई,
ज्ञान बरस रहा है हर और से
क्या करूँ किसको मानूँ
अचरज में हूँ दुनियाँ के शोर से !
भूले घूमना फिरना हम,
‘इवनिंग विजिट’ पर अब
कोई नहीं आता जाता है,
मोबाइल से बच गए तो शेष वक्त
‘कपिल शर्मा का शो ‘ ले जाता है ।
घर के जालों और जंजालों को भूल
दो हंसों का जोड़ा ,
पलंग के  दो कोने पकड़ कर पड़ा है ।
रात मेमोरी साफ किये थे
सुबह उठे तो पाते हैं,
और नई सलाह मशविरों से
मोबाइल अटा पड़ा है !!

😯

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बसंत पंचमी

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सभी सनातन धर्मियों को बसंत पंचमी की शुभ कामनाएं..
माघ मास की पंचमी को आने वाला पर्व पीत रंग को समर्पित है।
खेतों में पीली सरसों, और खिलती हुई गेंहू- धान की बालियां, और ,आम के वृक्षों पर आती हुई बौराइयाँ..!
पीले वस्त्रों को धारण कर इस पर्व को मनाते हैं हिन्दू।
इस पर्व के अनेकानेक महत्त्व है।
आज माँ सरस्वती का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है।
यह पर्व कलाकारों के लिए उतना ही ख़ासा है, जितना शस्त्र पूजन के लिए विजयदशमी..!
आज ही के दिन सनातनियों के आराध्य भगवान्  श्री राम गुजरात प्रांत के डांग जिले में माँ शबरी के आश्रम पहुंचे थे और उनके हाथों मीठे फल खाये थे। भक्ति की प्रतीक माँ शबरी के आश्रम में आज भी वह शिला है जहां प्रभु विराजमान हुए थे।
ऐतिहासिक महत्व भी है आज के दिवस का!
आज ही के दिन 16 बार पराजित कर गौरी को छोड़ देने वाले और सत्रहवीं बार हारने पर अफगानिस्तान साथ ले जाये गए पृथ्वीराज चौहान ने चंदबरदाई के द्वारा सुझाये तरीके से गौरी पर शब्द भेदी बाण छोड़ा और मार गिराया था और बाद में कटारी से भी स्वयं को भी समाप्त कर लिया था।
और क्या लिखूं आज के लिए..
महाकवि सूर्यकांत निराला आज ही के दिन जन्मे थे ।
और मेरी प्रेरणाशक्ति जन्मदात्री मेरी माँ ने भी आज ही के दिन जन्म लिया था । माँ तुझे नमन !

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साँसों में घुलता प्रदुषण

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कल टीवी देख रहा था। न्यूज़ आ रही थी। दिल्ली में लोगों को कचरा इत्यादि जलाने के लिए पाबन्द किया गया है। वायु प्रदूषण इतना कि तयशुदा मानकों को तोड़ता हुआ आंकड़ा भयावह स्थिति में है और दिल्ली को गैस चैम्बर में बदल दिया गया है। हो सकता है जल्दी ही सुनाई दे, गुलजार साहब के गीत बीड़ी जलाई ले, ओ रे पिया… सुरक्षा मानकों के चलते बैन कर दिया गया है।
यहाँ राजनीति करने की जरुरत नहीं किन्तु सरकारी और बहरहाल, गैर सरकारी, सरकारी, मानवीय लापरवाहियों और प्रकृति की घोर उपेक्षा , ने जिंदगी के आगे प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। कि सावधान हो जाइये ,’ आप मौत के दरवाजे तक चले आये हैं।
कारखाने तो ठीक पर स्कूल – कॉलेज की छुट्टियां , कई ऑफिस बंद…!
कौन जिम्मेदार है इन सबका!!
बचपन में घरों की छत पर रातों में लेट चाँद सितारे और गहराता हु खूबसूरत आसमान निहारा करते थे।
अब रातों में आसमान में तारों की बारात नजर नहीं आती। इतना प्रदूषित हो चले हैं हमारे शहर!
अँधा धुंध फैक्टरियों के बंटते परमिट और वृक्षों की कटाई, घरों ऑफिसों में AC का उपयोग और बदले में मिल रही है हवा में बढ़ती गर्मी और प्रदूषण। पर्यावरणविद और समाचार एजेंसियां अपना दर्द बांटती हैं, मगर उनकी आवाज कोई सुनने वाला नहीं।
…और आज हालात ये बन गए हैं कि ठण्ड के मारे गली के नुक्कड़ पर अलाव जलता है तो ‘इशू’ बन जाता है। हम इतने संवेदन शील स्तर पर पहुँच गए हैं सचमुच चौंका रहा है।
दिल्ली या फिर अन्य छोटे मोटे शहर ‘ गैस चैम्बर’ यूँ ही नहीं बन रहे!!
हमारी अक्षम्य लापरवाही समूचे जीव जगत पर भारी पड़ने लगी है। कुछ मानव सहयोग से बनी जहरीली हवाएं जो मौत का पैगाम बन रही हैं।
सल्फर ऑक्साइड -जो कि कोयले और तेल के जलने से उत्सर्जित होती है।
और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड प्राकृतिक गैस, जो कि कोयला या लकड़ी जैसे ईंधन के अधूरे जलने से उत्पन्न होती है। अँधा धुंध गाड़ियों जा उपयोग जहर उगल रहा है। आउट डेटेड गाड़ियां नष्ट नहीं की जातीं। गाड़ियों से होने वाला उत्सर्जन कार्बन मोनोऑक्साइड का एक प्रमुख स्रोत है।
कृषि प्रक्रिया से उत्सर्जित अमोनिया , कूड़े , सीवेज और औद्योगिक प्रक्रिया से उभरने वाली गंध भी हमारा वायुमंडल भयावह रूप से दूषित करती है।

सरकार हो, घर हों या फिर शिक्षण संस्थान, हमें सजग होना होगा। कुछ उपाय जो इस प्रदूषणीय मौत से बचाव दे सकते हैं वो इस प्रकार हो सकते हैं-
1- अधिकाधिक वृक्षों का लगाया जाना और उनकी कटाई रोकना। वृक्षारोपण की अनिवार्यता सभी के लिए हो।
2- सरकर द्वारा सभी को कुकिंग गैस उपलब्ध करवाना ताकि लकड़ी की कटाई रुके।
3- गाड़ियों के बजाय थोड़ी दूरी को पैदल, साइकिल रिक्शा, तांगे आदि के द्वारा पूरा किया जाये।
4- पेट्रोल डीजल का उपभोग अति सीमित हो।
कचरा जलाए बगैर उसका निस्तारण हो सके ऐसी विधियां ईजाद करना।
5- जागरूकता और सम्बंधित शिक्षा का प्रसारण सघनता और सजगता के साथ हो।
6-राष्ट्र प्रेम की भावना के साथ हम कार्य करें।

जागरूकता से ही जीवन संभव है अन्यथा मौत के तो कई बहाने हैं।

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