घट के राम

पूरा आश्रम , ‘हरे राम हरे राम..’के संकीर्तन से गुंजायमान हो रहा था।
गुरु भाई ही नहीं , लग रहा था जैसे पेड़ की शाखों पर बैठे पंछी भी अपनी कलरव में प्रभुनाद कर रहे थे। हवा में फैला हुआ ईश स्वर तन मन में संचारित होने लगा था।
श्री पुष्कर जी के सप्त -ऋषि घाट पर स्थित पावन आश्रम !!
आज गुरुपूर्णिमा थी और माँ-पिताजी मुझे अपने गुरु आश्रम में लाये थे ।
बंगाली बाबा नाम से पहचाने जाने वाले गुरुदेव श्री सीताराम ओंकार नाथ जी महाराज का आश्रम था वह। बाबा अक्सर कलकत्ता से पुष्कर जी आकर प्रवास करते थे।

धुंधली यादों के धरातल पर किसी ठोस वजह का तो भान नहीं , बस इतना भर याद कि पिताजी ने उन्हें  गुरु मान कर उनसे दीक्षा ली।
फिर पूरा परिवार उनका अनुगामी बना।
आज मुझे दीक्षा के लिए लाये थे पिताजी।New Doc 38_1_20151230220337689
बाबा एक कम्बल पर बैठे हुए थे। कृष काया, ठोडी पर लंबी सफ़ेद दाढ़ी, जटाओं सी केश राशि, तन पर एक रामनामीऔर कमर अंगरखी , झुकी हुई कृष काया और चेहरे पर गाम्भीर्य …
उनके चारों और बैठे अनुयायी सतत हरे राम हरे राम..नाम के प्रवाह  में लीन थे। आत्मविभोर कर देने वाला वातावरण था।
पिताजी ने पुष्कर जी के घाट पर पुनः एक बार स्नान किया। मुझे भी अपना हाथ पकड़ कर डुबकी लगवाई। और सफ़ेद धोती पहनाई ।
मैं नव पोशाक में खुद को बड़ा असहज महसूस कर रहा था। पूछने पर माँ ने बताया की दीक्षा कार्यक्रम है अतः धवल वस्त्र पहनाये हैं।
मुझे क्या पता था भविष्य के गर्भ में शुभ्र रंग मेरा इन्तजार कर रहा है।
घाट पर कोई मछलियों के लिए दाना बेच रहा था। माँ ने मेरे हाथों से मछलियों को दाना डलवाया। उस वक्त तो वह मेरे लिए एक कोहतूल भरा कार्य था। आज उसका मर्म समझ में आता है।
हमारे वैष्णव धर्म की व्याख्या बहुत ही विशाल है। चींटी से लेकर हाथी तक सभी को भोजन कराने को हम “धर्म” समझते आये हैं।
मैं अपनी माँ के भावों को अब समझने लगा हूँ कि क्यूँ वो, चींटी, चिड़ियाँ, गाय, श्वान, कपोत सभी को अन्न स्वरूप आहार देना मुझे समझाया करती थी।
आज मैं अपने बच्चों को इन सब बातों का मर्म समझा कर अपनी माँ की नीति को अगली पीढ़ी में पहुँचाना चाहता हूँ। हमारा धर्म इसी तरह फलित होता रहता है।
नहा धोकर मैं गुरु दीक्षा के लिए एक कुशा के आसन पर बैठने का निर्देश हुआ।
कुछ ही समय पश्चात गुरुदेव पधारे। उन्होंने मेरे सर पर अपना हाथ रखा और झुक कर मेरे कानों में,
एक मन्त्र का उच्चारण किया-
|| हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे,
हरे कृष्णा हरे कृष्णा , कृष्णा कृष्णा हरे हरे||

खड़ाऊ पहने उनके चरणों में मैंने सर झुकाया। मुझे
आशीर्वाद देकर वे  अगले दिक्षुक की तरफ बढ़ गए।
9-10 बरस की उम्र रही होगी मेरी। इन सब बातों का अर्थ समझ पाना मेरे बस में नहीं था। पिताजी ने सहमति दी है तो जरूरी ही होगा। बस यही समझ कर अपने कर्म को अपनी जिम्मेदारी समझ लिया करता था।
गुरुदेव की वजह से मेरा घर राममय रहता था। पिताजी माँ एवं बहनें नित्य ही राम का नाम पुस्तिका में लिखते रहते थे। 12-13 वर्ष की वय तक आते आते मैंने भी यह लेखन आरम्भ कर दिया।
हर वर्ष गुरुपूर्णिमा को हम अपनी लिखी हुई राम नाम की पुस्तिकाएं गुरु आश्रम में ले जाकर गुरुदेव को भेंट करते। इसे ही वह गुरु दक्षिणा कहते थे।
आश्रम का मुख्य कक्ष ऐसी पुस्तिकाओं से अट जाया करता था।
मैं नहीं समझता कितना पाप / पूण्य का लेखा हुआ होगा , लेकिन राम नाम में मेरी श्रद्धा बहुत गहरी हो गई।
नवरात्रि के शक्ति पूजन के दिनों में भी मेरे घर में श्री राम जी की ही पूजा होती थी।
घर का नाम तक ‘श्री राम कुञ्ज ‘ रखा गया था।
आज ऐसे नाम नहीं मिलते अब ‘विला’ हो गए हैं।
मातृ या पितृ छाया भी हैं कहीं कहीं, लेकिन हकीकत कुछ और।
…आज उस आश्रम का नक्शा बदल गया है।
गुरुदेव के देवलोकगमन के पश्चात वहां काफी समय तक उनके शिष्य राम जप किया करते थे । फिर एक समय ऐसा भी आया जब आश्रम में जाने वाले भक्तों की संख्या में कमी होती गई।
और राम नाम का संकीर्तन फिर ऑडियो सिस्टम के द्वारा जारी रखा गया।
पिछले दिनों मैं हर बार की तरह हीअपने आश्रम में गया।
हर वक्त खुला रहने वाला आश्रम का मुख्य द्वार आज बंद था। उसे धकेल कर अंदर गया तो सन्नाटा फैला पड़ा था। बंदरों की एक टोली जरूर पेड़ों पर धींगा मस्ती कर रही थी।
उनका वो सन्नाटा तोडना मुझे अच्छा लग रहा था।
मालूम हुआ , वहा एक रखवाला रखा गया जो शायद भोजन व्यवस्था के प्रयोजन से कही इधर उधर था।
आँखें बंदरों की उछल कूद पर थीं मेरी, किन्तु कान उस निरंतर उठती हुई ध्वनि को तलाश रहे थे जब अब रुक गयी थी। वो राम जप का ऑडियो सिस्टम अब स्थिर हो चला था ।
मैं जैसे किसी अदृश्य सशक्ति के द्वारा निर्देशित हो रहा था। मानो बाबा कह रहे हों….
“आलोक , यहाँ भले यह संकीर्तन रुक गया , किन्तु अपने ह्रदय में तुम राम नाम का जाप यूँ ही सतत् बनाये रखना। यूँ ही..जब तक सांस थक न जाए जब तक…..!!”

 

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बादल को घिरते देखा है

आनंद का रास रचाने
आये शब्द समूहों को
गुँथे हुए मन के धागों में
पंख फैलाये भावों को
किलकारी भरते देखा है
बादल को घिरते देखा है

उमड़ घुमड़ मन का प्रवाह
बह जाने का शंखनाद करे
लहरें ले लेकर हिलोरें
ख़्वाबों के दल आह्लाद* करे
जग ना सुने द्वंद हृदय का
रग रग थर्राए, प्रतिकार करे
आसक्ति रथ उतरे धरा पर
अमृत सा अहसास धरे
मन की मंथर गति रस धारा को
चित में उतरते देखा है
मन बादल को घिरते देखा है
मैंने मन को घुमड़ते देखा है
🌿
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*आह्लाद=प्रसन्नता

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खाली कुर्सियां

हैं खाली कुर्सियां अब
कोई नहीं बैठता इनपर
किसे फुरसत है
सोफे में धँस कर
वीडियो, कम्प्यूटर पर
दृश्यों का कृत्रिम आनंद लेने से,
मुझे याद आता है
बरामदे में लगाकर
दो कुर्सियां ,
मां पिताजी बैठा करते थे
और होता था
दार्शनिक मनन अपरिमित विषयों पर
और मैं उन कुर्सियों के
गोल गोल चक्कर लगाने में
ही मस्त रहा करता था,
उनके जाने के बाद
हैं कुर्सियां खाली अब…😔

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मेरी कविता- नृत्य

हर्ष, क्रोध, और
जय को दर्शाना हो
नृत्य से बेहतर क्या,
जब किसी को
कमतर दिखलाना हो
भोले ने तांडव कर
हाहाकार मचाया
मां काली ने महिषासुर वध कर
तांडव नृत्य दिखलाया
मोहिनी नृत्य द्वारा विष्णु ने
भस्मासुर से मुक्त कराया
कान्हा ने मारा नाग कालिया
फन पर था नृत्य दिखाया
नृत्य योग है नृत्य साधना
नृत्य वशीकरण नृत्य कामना
घूम रही है धरा हमारी
ये नृत्य वसुंधरा का
नृत्य नहीं महज मनोरंजन
ये प्रदर्शन परंपरा का
नहीं हैं स्थिर एक योग में
हैं गतिमान सभी हम
जीवन – नृत्य है गृहस्थ
कहीं ज्यादा… कभी कम !
——————————

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किताबें..

आज (23 अप्रैल 2019) विश्व पुस्तक दिवस है इस अवसर पर मेरी एक कविता….

किताबें खो गई हैं
बातें रह गईं हैं
मोबाइल की चाहत में
कहीं रखकर भूल गया हूँ शायद
कहां रक्खी थी किताब
बिस्तर के सिरहाने नहीं
चाय की टेबल पर भी नहीं है
अक्सर वार्डरोब में कपड़ों के
नीचे दबा कर रख दिया करता था
रात को सोते वक्त पढ़ा करता था
कुछ पन्ने मगर..

क्या अब किताब की जरूरत नहीं है?
अब तो मोबाइल आ गया है
शायद खुद से भी ज्यादा जरूरी..
रखने से पहले नया निटिफिकेशन
आ जाता है..
उसमें वक्त गुजर जाता है
समय कहां से लाऊं किताब के लिए
मगर कुछ तो था उसमें..
वो कागज़ की खुशबू
और वो पन्ना उलटकर जो रखता था
कुछ पंक्तियों को
अंडरलाइन करने का मज़ा भी
कुछ और था
मैं अक्सर भुला दिया करता था खुद को
किताबों में उलझने के बाद..
वो गहराई, वो अपनत्व का भाव
किताबों सा , कहीं नहीं मिलता
चार्जर, पावर बैंक कुछ भी तो नही
मांगती थी किताबें
जब भी चाहता हाजिर हो जाती किताबें
मेरी तन्हाई की राज़दार
मेरी किताबें..
सीने पर रखकर सोने का
मजा कुछ और था
किताबों के साथ जीने का
मजा कुछ और था..

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शहर में तेंदुआ

शहर के एक हिस्से में खास तौर से रात में गहन सन्नाटा बढ़ने लगा था। यह कोई ठिठुरती हुई रातों की वजह से नहीं , ना ही गुंडागर्दी, लूटपाट की वारदातें बढ़ गई थीं.. बल्कि एक तेंदुआ शहर में घुस आया था। तेंदुआ भी ऐसा कि रातों में कभी सड़क तो कभी लोगों के घरों की बालकनी तक में नज़र आने लगा।
शहर के जिस हिस्से में तन्दुए की मजूदगी पाई गई उस हिस्से में अधिकांश आर्मी एरिया है जो कि कांटेदार झाड़ियों और कई किस्म के बड़े वृक्षों से आच्छादित है। इस क्षेत्र के साथ जो भी कॉलोनियाँ लगी हुई हैं उनमें भी खुलेपन की वजह से सघन हरियाली रहती है।
अंधेरे 5 बजे के बाद प्रातः भ्रमण वालों की अच्छी खासी तादाद आर्मी एरिया की उस साफ सुथरी सड़क पर रहती है।
जब से कुछेक ने तेंदुआ देखा तब से वह सड़क सवेरे 8 – 9 बजे तक भी सुनसान रहती है। व्हाट्सअप पर उसकी मौजूदगी के दृश्य डाले जाने लगे।
ऐसे वक्त में अफवाह फैलाने वालों की भी कमी नहीं होती। किसी ने सड़क पार करते शेर की तस्वीरें डाल दीं जबकि तेंदुआ पाया गया था।
मैं सोच कर हैरान रह जाता हूँ आखिर लोगों को गलत बात, गलत सूचना या अफवाह फैलाने से आखिर मिलता क्या होगा? क्या अच्छाई के साथ हमेशा बुराई का होना भी जरूरी है!!
तेंदुए के रात में शिकार के लिए घूमने और दहशत फैलाने की घटनाओं में इजाफा होता चला गया।
उस अर्ध वन्य क्षेत्र से सटे सरकारी बंगलों में तेंदुए के पैरों के निशान नज़र आने लगे उसके बाद तो
अखबारों में भी खबरें बढ़ने लगीं । पूरे इलाके में रात को अघोषित कर्फ्यू के हालात हो गए।
वन विभाग ने एड़ी चोटी का जोर लगा रखा था , पिंजरा लगवाया गया मगर..सफलता का चांद दूर दूर तक नज़र नहीं आ रहा था। उधर सरकारी महकमा भी अब कुम्भकर्णी नींद से जगने को मजबूर हुआ।
पूरा शहर तेंदुए के आगमन पर हैरानी के साथ आक्रोशित भी होता जा रहा था मगर कहीं कोई एक चर्चा नहीं कि आखिर तेंदुआ जंगल जैसा अपना खूबसूरत घर छोड़कर क्यों शहर में भटक रहा होगा ? किसी ने नहीं सोचा होगा जानवरों के घर उजड़ते हैं तब वे भोजन की तलाश में मानव बस्तियों में आने को मजबूर हो जाते हैं। क्या हम रोटी की तलाश में परदेस तक नहीं चले जाते!!
अपना राजी राजी अपना घर आखिर कौन छोड़ना चाहता है!
मनुष्यों की बस्ती में तेंदुए ने आने की हिमाकत तो कर ली है मगर, कितने दिन रुक पायेगा! एक न एक दिन एक छोटी सी धायं करती हुई गोलीनुमा सुई आएगी और उसे बेहोश कर देगी , या फिर किसी जाल में या शिकंजे में खुद को फंसा लेगा,
और इस तरह बेहोशी की हालात में पिंजरे की हद से होते हुए जंगल तक पहुंचा दिया जाएगा। कुछ तो इनका नसीब उल्टे कलयुग में आकर संवर गया है कि ये महज़ बेहोश किये जाते हैं , मारे नहीं जाते वरना अब तक उसकी इहलीला समाप्त हो चुकी होती।
इन जंगली जानवरों को शायद पता नहीं शहरों में वस्त्रों में ढंके छुपे हुए उनसे ज्यादा खूंखार जानवर रहते हैं।
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अम्मा जी

जब तक मेरी शादी नहीं हुई थी, नौकरी के दौरान मुझे अपना किराए का कमरा कई दफा बदलना पड़ा। कुंआरों को घर में जगह देने से लोग बहुत सतर्क रहते हैं।
अनजाने शहर में कहीं रहने की ठौर पा लेना, एक छोटी मोटी परीक्षा उत्तीर्ण करने जैसा है।
अम्मा जी ने मुझे अपना बाहर वाला कमरा दे दिया था। शर्त ये थी कि साथ में छोटा कमरा भी लेना पड़ेगा, मतलब किराए में बढ़ोतरी.. खैर पैसे की दिक्कत नहीं थी,किचन भी मिल गया था, मैंने कमरा किराए पर ले लिया।
बिल्कुल मुख्य सड़क से लगता मकान था और बाहर के खुले चबूतरे पर अक्सर लोग आकर बैठ जाते और ऊंची आवाज में गपशप किया करते। रात में नौकरी कर के आने में यह बड़ा तकलीफ देय था कि शोर शराबा सोने ना देता। दिन में घर्र से निकलने वाली गाड़ियां यूँ लगता जैसे सड़क मेरे पलंग से सटी हुई हो। खैर..कमरा मिल गया यह ज्यादा अहम था।
मकान एक वृद्ध दंपत्ति का था जिनके दो बेटे थे। एक दिल्ली में और दूसरा स्थानीय बैंक में कार्यरत.. मगर उसका अपना अलग ही आशियाना था।
अम्मा और उनके पति(जिन्हें मैं बाबूजी संबोधित करता था) अपने पुश्तैनी मकान में रहा करते।
बाबूजी जहां सरल हृदयी थे , थोड़े शर्मीले स्वभाव के और हर वक्त मुस्कुराते रहते थे,अम्मा इसके उलट थी। जब भी किसी से कोई बात करनी होती, या सौदा पटाना होता, पहल अम्मा करती थी।
पहले ही दिन मेरा किरायानामा तैयार हो गया और बड़ी ही मृदुता के साथ आवश्यक शर्तों/ नियमों के बारे में उन्होंने मुझे अवगत करवाया था। हंसते हुए साथ में यह कहना नहीं भूली अम्मा , बेटा ये तो खाना पूर्ति हम सबसे ही करवाते आये हैं।
धीरे धीरे वक्त गुजरता रहा । मैं भी कई बार उनके ड्राइंग रूम में जाकर बैठ जाता। अम्मा बाबूजी से निकटता होने लगी थी।
मेरे स्वभाव से वो भी आश्वस्त होकर मेरे करीब आने लगे थे। अम्मा की कृपा से यूँ भी कृतार्थ होने लगा था कि उनके लिए मैं ‘ब्राह्मण देव’ था। अम्मा अक्सर कुछ न कुछ बनाकर दे दिया करती और कहती , ब्राह्मण देवता भोग लगा लो। मैं किचन में कुछ बनाता तो अम्मा सहृदयता से कहतीं – मैं मदद करवाऊं !
मैं जब सुबह ड्यूटी से लौट कर सो रहा होता तो बाहर की कुंडी खुली देखकर वो अंदाज़ा लगा लेती कि मैं रात नौकरी कर के आया हूँ और उसके बाद अम्मा बाबूजी सतर्क प्रायः रहते कि मेरी नींद में खलल ना पड़े। उस दौरान अम्मा दबी आवाज में चबूतरे पर बैठे लोगों को धीमी आवाज में बतियाने को कहा करती। उनका ये प्रेम देखकर में द्रवित हो उठता था।
एक आध बार अम्मा खुली खिड़की से झांककर भी सुनिश्चित कर लिया करती कि मैं सो रहा हूँ। जैसे ही मेरे उठने के बाद कि खटर पटर उसे सुनाई देती , वहः कुछ न कुछ खाने का नाश्ता आदि ले ही आती।
इस प्रकार भारी भरकम नाश्ते के बाद मैं दिन का भोजन बनाना टाल देता। जो मेरे लिए बड़ा सुकून का काम होता।
अम्मा शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त थीं और बाबूजी भी। अगर मैं उनके कक्ष तक नहीं पहुंचता तो अम्मा आ जाती , तब मुझे लगता अम्मा अब तो कम से कम मेरा आधा घंटा लिए मानेगी।
फिर अम्मा बतातीं कैसे वो बचपन में गांव के तालाब के पास जंगल जलेबी के पेड़ पर चढ़ कर जंगल जलेबी तोड़ती। कैसे एक बार सांड उनके पीछे पड़ गया था और कैसे उनके पिताजी का खौफ घर भर में रहा करता। अम्मा धारा प्रवाह बोलती। वो मुझे ये कहने का मौका नहीं देती कि अम्मा मैं दूध ले आऊँ वरना डेयरी बंद हो जाएगी।
अम्मा को इस बात से बेहद संतुष्टि थी कि मैं कोई व्यसन नहीं रखता था और लेखन का शौकीन था। जब भी अपनी नई कविता लिखता तब पहली श्रावक अम्मा जी ही होतीं।
अम्मा की दिमागी हालात 65 की उम्र में भी दुरुस्त थी। अखबार आते ही सीढ़ियों में बैठकर सबसे पहले वर्ग पहेली को पूरा करती, उसके बाद अन्य काम।
एक बार रात 11 बजे अम्मा जी के पास फोन आया कि उनके दोहिते का NDA में चयन हो गया तो अम्मा बहुत खुश हुईं। अपनी खुशी को 9 बजे सो जाने वाली अम्मा जी ने सबको फोन लगा लगा कर ख़ूब बांटा। आखिर मेरे कमरे की कुंडी खटखटाई। उनकी चहक और झरने की तरह उठती आवाज से उनकी खुशी को मैं पहले ही जान चुका था मगर अम्मा ने आंखों में गहराती हुई चमक के साथ जो बयान किया तो मुझे भी उसी रौ में बहकर शामिल होना पड़ा।
अम्मा तो कहकर चली गईं मगर मैं देर तक सोचता रहा, खुशी हो या गम के आवेग.. बांटे बगैर नहीं रुकते। यही मानव जीवन है। संभाषण जिंदगी का एक बड़ा पहलू है। उसके बगैर कुंठाएं जाग्रत हो जाती हैं।
ये ऐसा प्रवाह है जिसे बांधा नहीं जा सकता। इसके बह जाने में ही भलाई है।
अम्मा ‘ब्राह्मण देव ‘ कह कर जब भी कुछ खिलाती , उनके चेहरे पर संतुष्टि के गहरे भाव होते। तब वह एक मकान मालकिन नहीं , मां नजर आती। इतना स्नेह सिर्फ मां देती है।
अम्मा में बहुत सी खूबियां थी। दिन भर वो घर में घूमती रहती। सुबह कामवाली बाई आती तो खड़े रहकर घर भर की सफाई करवाती। ऊपर के बंद पड़े कमरों और सीढ़ियों में रोज धुलाई करवाना उनकी सफाई की सनक को दर्शाता था।
बिजली के बिल का जब अम्मा हिसाब लेती और 50 पैसे भी लौटाने होते तो भूलती नहीं। एक बार रात 12 बजे मैं लौटा तो अम्मा ने दरवाजा खटखटा कर मुझे 50 पैसे लौटाए थे। मैं कहता अम्मा ये क्या!!
अम्मा कहती, अगर रात ही को मर गई तो ऊपर जाकर ये कर्जा चुकाना पड़ेगा।
मैं सोचता, जो संस्कार बचपन में ढल जाते हैं उनकी जड़ें किस कदर गहरी हो जाती हैं कि उनका सिंचन जीवन पर्यन्त चलता रहता है।
अम्मा का किरदार मेरे जीवन में एकमेक होता जा रहा था।मुझे याद है मेरी शादी में अम्मा ने बाजार से मिठाई लाकर सबको बांटी थी और बाबूजी तो मेरी शादी की बारात में गए थे। उनके पैर पूर्णतः ठीक नहीं लेकिन उन्हें नाचते हुए देखना मुझे बहुत भावुकता दे रहा था।
जब दिल मिल जाते हैं, खून के रिश्ते बहुत पीछे रह जाते हैं। अम्मा का मैं तीसरा बेटा बन गया था। इसके उपरांत 2-3 साल तक जितने पारवारिक खुशी और गम के अवसर आये अम्मा ने अपने आपको सबमें शामिल किया।
वक्त भी कितना क्रूर है इस कदर बदलता है कि सब कुछ पीछे रह जाता है। अल्बम पलटते वक्त मुझे आज अम्मा का स्मरण हो रहा था। मेरा जीवन फ़्लैश बैक में गोते लगा रहा था।
शादी के कुछ समय बाद मैने फ्लैट खरीद लिया था। आज यादें घेर कर मुझे अम्मा के घर ले चली थीं।
अम्मा के घर का नक्शा बदल गया था । बाहर अब बाबूजी की नेम प्लेट नहीं थी। इसी से मेरा अंदेशा मुझे द्रवित कर रहा था। चबूतरियों पर अब कुछ निर्मित हो गया था। पूछताछ हुई तो पता चला बाबूजी के देहांत के पश्चात, उनके बेटों ने मकान बेच दिया था और अम्मा को अपने साथ ले गए। मैं हतप्रभ था खुद को अतीत तक तो ले आया था और आज अपराधी सा महसूस कर रहा था। जो दूसरी मां बन गई थी वो इस तरह गुमनाम हो जाएगी मुझे पश्चाताप हो रहा था।
फिर किसी ने ये कहकर उनसे जाकर मिलने के मेरे उत्साह पर पानी डाल दिया कि,”सुना है , अब तो अम्मा भी नहीं रहीं।’
✍️🌿

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अक्ल

” तुम्हारी माँ ही आई थीं ये रिश्ता लेकर हमारे घर , बात बात पर तुम्हारी फोटो लेकर मेरे परिवार वालों को दिखाती ‘देखो जोड़ी खूब जमेगी आपके बेटे के संग’, अक्सर विवेक अपनी पत्नी सरिता का इस तरह प्रतिकार करता, जब जब भी पत्नी के मुख से तंज सुनता, ‘मेरी अक्ल घास चरने गई थी जो तुमसे शादी की।’
मैं अपने घर की खिड़की से आती हुई ऊंची आवाज की उनकी नौक झौंक को अक्सर सुनता रहता। आवाजें कहां रुकती हैं। कान भी ऐसी ध्वनियों को बारीकी से पकड़ लेते हैं।
हमारे नए पड़ौसी थे विवेक और सरिता। शादी हुए कोई चार साल हुए होंगे। विवेक एक कपड़े की मिल में सेल्स मैनेजर था। लंबा, गोरा ,तीखे नैन नक्श और खुश मिजाज़ व्यक्तित्व। यूँ तो वह अपने हाल में खुश रहने वाला लड़का था । इतना वक्त नहीं उसके पास कि मुहल्ले में कभी चार कदम की चहल कदमी कर ले , हां त्योहारों पर जरूर मुखर हो उठता। सबके साथ नाचता उल्लास मनाता।
उसकी पत्नी सरिता भी कम न थी। इकहरा बदन, गौर वर्णी और आधुनिकता से ओत प्रोत। एक बच्चा होने के बावजूद वह कॉलेज की युवती लगती थी। जोड़ी दोनों की खूबसूरत थी, फबती थी । जो भी उन्हें साथ साथ देखता मन ही मन तारीफ किये बगैर नहीं रहता,उन्हें क्या मालूम नजदीक जाकर देखने पर इनके ख्यालात एक दूजे के बिल्कुल उलट थे ।
इंजिनियरिंग की डिग्री धारी थी सरिता। उसका मानना था, स्त्री अगर योग्य है तो अपने पैरों पर खड़ी हो। कमाए खाये और परिवार आधुनिकता की हवा में गोते लगाए। ज़िन्दगी बार बार नहीं आती, क्यूँ न इसे भरपूर जिया जाए।आज का दौर अर्थ युग है, पैसा है तो सब कुछ है।

विवेक मगर अलग ख़यालों का पक्षधर था। वह स्त्रियों के बाहर कामकाजी होने का धुर विरोधी था। उसकी नज़र में सुख पैसे में नहीं संतोष में, छोटी छोटी खुशियों में और अपनों के बीच मिलता है। पैसा जड़ों से दूर कर देता है। आकांक्षाओं का अंत नहीं होता और स्त्री रचना को बहुत सोच समझ कर गढ़ा है ईश्वर ने। उसे कोमलांगी बनाया है घर की लक्ष्मी बनाया है। बाहर की संघर्षरत दुनियाँ में हाथ पैर मारने की कहां जरूरत उसको ! स्त्रियों ने जाकर उतने ही मर्दों को बेरोजगार किया है।

सरिता जहां फास्ट फूड , घूमना फिरना, खरीददारी करना आदि में खुश रहती, विवेक अपनी कंपनी से छूट कर सीधा घर को रुख करता। बीबी की खुशी में , कभी कभी सरेंडर हो जाता और वो सब कुछ करता जिससे सरिता खुश रहे। सामंजस्य बैठा रहे इसके लिए वह अपनी ओर से पुरजोर कोशिश करता।
मगर कहते हैं ना, साथ रहते बर्तन टकराने की आवाज पैदा कर ही देते हैं।
विवेक और सरिता भी इससे अछूते न थे। बर्तनों की तरह ही वैचारिक रूप से टकराते रहते।
उनकी मीठी झड़पों की आवाज आते ही मेरी माँ मुंह में पल्लू दबाकर लगभग हंसी रोकते हुए कहती, ‘ लो तोता मैना का झगड़ा फिर चालू हो गया ।
मैं सोच में डूब जाता , दो भिन्न भिन्न सोच रख कर साथ साथ रहना कितना दुष्कर होता है, फिर भी लोग हैं कि शादी का रिस्क उठाने को तैयार हो जाते हैं।
कितना सटीक कहा गया है- अक्ल घास चरने चली जाती है।

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