घट के राम

पूरा आश्रम , ‘हरे राम हरे राम..’के संकीर्तन से गुंजायमान हो रहा था।
गुरु भाई ही नहीं , लग रहा था जैसे पेड़ की शाखों पर बैठे पंछी भी अपनी कलरव में प्रभुनाद कर रहे थे। हवा में फैला हुआ ईश स्वर तन मन में संचारित होने लगा था।
श्री पुष्कर जी के सप्त -ऋषि घाट पर स्थित पावन आश्रम !!
आज गुरुपूर्णिमा थी और माँ-पिताजी मुझे अपने गुरु आश्रम में लाये थे ।
बंगाली बाबा नाम से पहचाने जाने वाले गुरुदेव श्री सीताराम ओंकार नाथ जी महाराज का आश्रम था वह। बाबा अक्सर कलकत्ता से पुष्कर जी आकर प्रवास करते थे।

धुंधली यादों के धरातल पर किसी ठोस वजह का तो भान नहीं , बस इतना भर याद कि पिताजी ने उन्हें  गुरु मान कर उनसे दीक्षा ली।
फिर पूरा परिवार उनका अनुगामी बना।
आज मुझे दीक्षा के लिए लाये थे पिताजी।New Doc 38_1_20151230220337689
बाबा एक कम्बल पर बैठे हुए थे। कृष काया, ठोडी पर लंबी सफ़ेद दाढ़ी, जटाओं सी केश राशि, तन पर एक रामनामीऔर कमर अंगरखी , झुकी हुई कृष काया और चेहरे पर गाम्भीर्य …
उनके चारों और बैठे अनुयायी सतत हरे राम हरे राम..नाम के प्रवाह  में लीन थे। आत्मविभोर कर देने वाला वातावरण था।
पिताजी ने पुष्कर जी के घाट पर पुनः एक बार स्नान किया। मुझे भी अपना हाथ पकड़ कर डुबकी लगवाई। और सफ़ेद धोती पहनाई ।
मैं नव पोशाक में खुद को बड़ा असहज महसूस कर रहा था। पूछने पर माँ ने बताया की दीक्षा कार्यक्रम है अतः धवल वस्त्र पहनाये हैं।
मुझे क्या पता था भविष्य के गर्भ में शुभ्र रंग मेरा इन्तजार कर रहा है।
घाट पर कोई मछलियों के लिए दाना बेच रहा था। माँ ने मेरे हाथों से मछलियों को दाना डलवाया। उस वक्त तो वह मेरे लिए एक कोहतूल भरा कार्य था। आज उसका मर्म समझ में आता है।
हमारे वैष्णव धर्म की व्याख्या बहुत ही विशाल है। चींटी से लेकर हाथी तक सभी को भोजन कराने को हम “धर्म” समझते आये हैं।
मैं अपनी माँ के भावों को अब समझने लगा हूँ कि क्यूँ वो, चींटी, चिड़ियाँ, गाय, श्वान, कपोत सभी को अन्न स्वरूप आहार देना मुझे समझाया करती थी।
आज मैं अपने बच्चों को इन सब बातों का मर्म समझा कर अपनी माँ की नीति को अगली पीढ़ी में पहुँचाना चाहता हूँ। हमारा धर्म इसी तरह फलित होता रहता है।
नहा धोकर मैं गुरु दीक्षा के लिए एक कुशा के आसन पर बैठने का निर्देश हुआ।
कुछ ही समय पश्चात गुरुदेव पधारे। उन्होंने मेरे सर पर अपना हाथ रखा और झुक कर मेरे कानों में,
एक मन्त्र का उच्चारण किया-
|| हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे,
हरे कृष्णा हरे कृष्णा , कृष्णा कृष्णा हरे हरे||

खड़ाऊ पहने उनके चरणों में मैंने सर झुकाया। मुझे
आशीर्वाद देकर वे  अगले दिक्षुक की तरफ बढ़ गए।
9-10 बरस की उम्र रही होगी मेरी। इन सब बातों का अर्थ समझ पाना मेरे बस में नहीं था। पिताजी ने सहमति दी है तो जरूरी ही होगा। बस यही समझ कर अपने कर्म को अपनी जिम्मेदारी समझ लिया करता था।
गुरुदेव की वजह से मेरा घर राममय रहता था। पिताजी माँ एवं बहनें नित्य ही राम का नाम पुस्तिका में लिखते रहते थे। 12-13 वर्ष की वय तक आते आते मैंने भी यह लेखन आरम्भ कर दिया।
हर वर्ष गुरुपूर्णिमा को हम अपनी लिखी हुई राम नाम की पुस्तिकाएं गुरु आश्रम में ले जाकर गुरुदेव को भेंट करते। इसे ही वह गुरु दक्षिणा कहते थे।
आश्रम का मुख्य कक्ष ऐसी पुस्तिकाओं से अट जाया करता था।
मैं नहीं समझता कितना पाप / पूण्य का लेखा हुआ होगा , लेकिन राम नाम में मेरी श्रद्धा बहुत गहरी हो गई।
नवरात्रि के शक्ति पूजन के दिनों में भी मेरे घर में श्री राम जी की ही पूजा होती थी।
घर का नाम तक ‘श्री राम कुञ्ज ‘ रखा गया था।
आज ऐसे नाम नहीं मिलते अब ‘विला’ हो गए हैं।
मातृ या पितृ छाया भी हैं कहीं कहीं, लेकिन हकीकत कुछ और।
…आज उस आश्रम का नक्शा बदल गया है।
गुरुदेव के देवलोकगमन के पश्चात वहां काफी समय तक उनके शिष्य राम जप किया करते थे । फिर एक समय ऐसा भी आया जब आश्रम में जाने वाले भक्तों की संख्या में कमी होती गई।
और राम नाम का संकीर्तन फिर ऑडियो सिस्टम के द्वारा जारी रखा गया।
पिछले दिनों मैं हर बार की तरह हीअपने आश्रम में गया।
हर वक्त खुला रहने वाला आश्रम का मुख्य द्वार आज बंद था। उसे धकेल कर अंदर गया तो सन्नाटा फैला पड़ा था। बंदरों की एक टोली जरूर पेड़ों पर धींगा मस्ती कर रही थी।
उनका वो सन्नाटा तोडना मुझे अच्छा लग रहा था।
मालूम हुआ , वहा एक रखवाला रखा गया जो शायद भोजन व्यवस्था के प्रयोजन से कही इधर उधर था।
आँखें बंदरों की उछल कूद पर थीं मेरी, किन्तु कान उस निरंतर उठती हुई ध्वनि को तलाश रहे थे जब अब रुक गयी थी। वो राम जप का ऑडियो सिस्टम अब स्थिर हो चला था ।
मैं जैसे किसी अदृश्य सशक्ति के द्वारा निर्देशित हो रहा था। मानो बाबा कह रहे हों….
“आलोक , यहाँ भले यह संकीर्तन रुक गया , किन्तु अपने ह्रदय में तुम राम नाम का जाप यूँ ही सतत् बनाये रखना। यूँ ही..जब तक सांस थक न जाए जब तक…..!!”

 

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एक संस्मरण- गांव में फूल चुनने की रस्म:-

कुछ दिन पूर्व अपने रिश्तेदार के “फूल चुनने” की रस्म पर एक गाँव मे जाना पड़ा।
समयानुसार सब कार्यक्रम हुआ और पास की एक नदी में स्नान करके सब लौट गए , मैं भी गृह नगर आ गया ग्रामीण जीवन की ढेर सारी खूबियों के साथ जो नगरों में दिखलाई नही पड़ती।
बारिश के बावजूद कई वृद्ध और युवक रस्म का हिस्सा बने।
मेरे परिचित को न किसी से कुछ कहना पड़ा न दिशा निर्देशन … सब कुछ मशीन की तरह होता गया।
दो उम्रदराज व्यक्ति एक टाट का कपड़ा लेकर अतिरिक्त राख और लकड़ी के कोयलों को हटाने लगे । दो सज्जन सर, सीने और चेहरे की अस्थियों का बारीकी से संग्रहण करने लगे। बताते हैं कि फूल चुनने की प्रक्रिया में मिली अस्थियों में दांत चुनने का बड़ा महत्व है जो गंगा में जाकर विसर्जित होने वाली अस्थियों में शुमार होते हैं।
एक सुनियोजित छपरे के नीचे बनी साफ सुथरी शव दाह वेदिका स्वच्छ करके गो मूत्र छिड़क कर पवित्र किया गया। उसके पश्चात उस पर पुष्प बिखेरे गए। उससे पूर्व दो तीन युवक पास बने हेण्डपम्प से 7-8 बाल्टी और दो मटके पानी भर लाये थे और समस्त जगह को पानी छिड़क कर साफ किया गया था।
एक युवक गोबर ले लाया उससे चिता की जगह को नीपा गया।
एक युवक ताजी हरी ढाब( एक विशेष प्रकार की घास जो पित्र- तर्पण के समय उंगली में पहनी और शिखा में टाँकी जाती है) ले आया उससे अंगूठी नुमा रचना तैयार की गई।
कुछ लोग कंडे जलाकर खीर बनाने में व्यस्त हो गए।
तदुपरांत नीपी हुई जगह पर दो मटके रखे गए जिनपर मालाएं बांधी गईं।
उसके पश्चात पत्तल दोने रखकर उनपर खीर, नमकीन, मिठाई, (यहाँ तक कि चाय भी बनाकर रखी गई।) दीये अगरबत्ती लगाकर उसके पश्चचात घर के सभी सदस्यों ने हाथ मे जल लेकर आचमन किया और मिठाई और खीर अग्नि में जलते हुए कंडों पर घृत डालकर भोग लगाया।
इस प्रकिया के दौरान सबने ढाब की अंगूठी अपनी उंगली में सजाई और जनेऊ निकाल कर हाथ की उंगलियों में अटकाकर सारी रस्म पूरी की।
इसमें देखने वाली बात है कि गाँव के सभी पुरुष जनेऊ निकालकर आराम से समस्त प्रक्रिया दोहराते रहे किंतु जितने भी शहरी थे अधिकांश ने जनेऊ नही पहन रखी थी और बना जनेऊ के ही उन्होने रस्म अदा की।
कहना न होगा कि शहर में बस कर इन्सान ने संस्कारों से दूरी बना ली है जबकि देहात में वो आज भी जिंदा हैं।
शहरों में रस्मों को छोटा भी किया जाता रहा है। गांव में फूल बीनने की रस्म का यह मेरा पहला अनुभव था जो शहरों की तुलना में बड़ा और कदाचित पूर्ण रूप में था।
शायद शहर में इंसानों के पास इतनी देर तक रुकने की फुर्सत नही है इसलिए रस्में छोटी होती गई हैं।
मैंने भी अब जनेऊ पहनने का निर्णय ले लिया है क्योंकि ब्राह्मण परिवार में जन्म लेकर जनेऊ मैं भी नही पहनता।

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टिमटिमाता दीया

कभी मुखर हुए
कभी होंठों को सिया है
जिंदगी क्या है
टिमटिमाता दीया है

कभी थोड़े में
कभी चौड़े में
खुद की समायोजित किया है
जिंदगी भी क्या है
इक़ टिमटिमाता दीया है

खशियों संग रास रचाई है
कभी गम का हलाहल पिया है
जिंदगी..

इक़ टिमटिमाता दीया है

अपनों का उजाला मिला
कभी तन्हाई का सिला
बिन किनारों का दरिया है
जिंदगी टिमटिमाता दीया है

कब तलक बचाओगे
तेल रीतेगा और बुझ जाओगे
कौन बेफिक्री से जिया है
जिंदगी टिमटिमाता दीया है
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मन-

मनता नहीं थमता नही
मन चंचल है समझता नहीं
सब से जीते और मन से हारे
बहुत चाहा मन सधता नहीं

मन की गति प्रकाश से ज्यादा
मन राजा और जीवन प्यादा

मन के मारे हार है पाई
मन नहीं समझत है भाई

मन को थामने योग किये
मन दौड़ा सर पाँव लिए

ऐसा कोई मंत्र न पाया
जो मन को बाँध है पाया

मन की महिमा कैसे जानूं

पल में तोला पल में पर्वत
गरल कभी तो कभी है शर्बत

प्रभु कहते हैं मैं मिल जाऊँ
मन थम जाए तो सामने आऊँ

प्रभु भी परीक्षा लेते हैं
कैसे उनमें मन लगाऊँ

रे मन तू कितना पापी है
संताप कराता दिल दुखाता
कैसे तुझसे पार मैं पाऊँ !
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मेरी कविता- “चंद्र”

नित्य गगन की करो सवारी
चन्द्र तुम्हारी बात है न्यारी

नया रोज रूप तुम धरते
प्रेम उपासक तुम पर मरते
है मामा बतलाती महतारी
चंद्र तुम्हारी बात है न्यारी

लाख सितारे रंग हैं भरते
सारे जगत को जगमग करते
रैन की तुम बिन सूनी अटारी
चंद्र तुम्हारी बात है न्यारी

धवल तुम्हारा रूप रंग है
महादेव का श्रृंगार अंग हैं
सोलह कलाओं के अधिकारी
चंद्र तुम्हारी बात है न्यारी

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अमरूदों की खेती

गाँव में छोटा सा घर था हमारा। यूँ तो 40 बीघा जमीन हुआ करती थी मगर पीढ़ियों के बँटवारे होते होते अब हमारे हिस्से में 10 बीघा का खेत बचा था। पिताजी ने हल चलाकर मेहनत करके उसी से घर चलाया था। छोटा था, तब परिवार के साथ मिलकर मैं उसमें हाथ बँटाया करता।
गाँव की स्कूल में पढ़ा था मगर मैं बचपन से महत्वाकांक्षी था।
मेरे एक खास सहपाठी के बड़े भाई upsc की परीक्षा पास कर तहसीलदार हो गए थे।
जब कभी गाँव आते तो उनके रुतबे और तरक्की को देखकर मैं भी कुछ बनने का सपना पाले बैठा था।
खूब मेहनत की मगर पारिवारिक परिस्थितियां मुझे हिलाती रहती थी।
शायद मेरे किस्मत के पन्ने पर राज योग न था।
मैं हर जगह असफल रहा ।
विवाह योग्य उम्र थी , मगर बेरोजगारी आड़े आती थी।काम का बोझ बढ़ता जा रहा था। पिताजी बात बात पर खेती के कामों में मेरा मुंह देखने लगते। जवान बेटा था , वो चाहते थे मैं उनके कार्यों में हाथ बँटाऊं मगर मैं खेती से उचटता था।

मगर अब मजबूरी वश में खेत के उस छोटे से टुकड़े की तरफ मुड़ने लगा था । मैं खेत पर जाकर मिटी के ढेले उठाकर जमीन पर मारा करता था। सोचता था अरे ओ खेत क्या तुम मुझे आगे नही बढ़ने दोगे!? तुम चाहते हो पिताजी की तरह मैं भी यहाँ पसीना बिखेरता रहूँ!! और इस 10 बीघा जमीन के टुकड़े में खुद को खपा दूँ!
और इसी तरह…दिन गुजरते रहे।
फिर गांव में एक बार कैश क्रॉप के बारे में समझाने सहकारी समिति की तरफ से मनोनीत एक दल आया। उसने समझाया किस तरह कम लागत पर अमरूद की खेती से अच्छी आमद हो सकती है।
मेरे पास कोई रोजगार न था न आमदनी का कोई जरिया।
मैंने जब तक कुछ और जतन न हो अमरूद की खेती करने का निर्णय लिया और खुद को दांव पर लगाने की ठान ली। और कोई राह भी न थी। बारिश की ऋतु में अमरूद की पौध लगाई गई । धीरे धीरे पौधे बढ़ने लगे। तीन साल में अमरूदों का बगीचा बन गया। इस बार उन पर फूल आने लगे। मेरी आंखों में सपने रंग भरने लगे। कुछ समय मे ही फल की बोराई फूटने लगी। इस बार की सर्दियों में अमरूद का बगीचा शबाब पर था। शहर से ठेकेदारों की टीम फसल का ठेका लेने आने लगी थी।
मैं घर पर खाना खाकर सौया हुआ था। तभी दरवाजे की कुंडी बजी।
दरवाजा खोला तो कुछ व्यापारियों को पाया जो अमरूदों की खरीद की बोली लगाने और सौदा तय करने के उद्देश्य से आये थे।
इस तरह ऊपर नीचे करके 10 लाख में अमरूद उठाने का ठेका हुआ। पेपर वगैरह की खाना पूर्ति के बाद वो लोग चले गए।
मैं हैरत में था। जिस खेत को मैं बेगार समझता था उसने मुझे बहुत कुछ बना दिया था।
अमरूदों से आमद और लोन लेकर मैंने कुछ समय बाद और जमीन खरीद ली। अब कृषि ही मेरा सपना थी और नित रोज उन्नत कृषि के बारे में मंथन मेरी दिनचर्या थी आजीविका थी।

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बीस साल आगे

  

कल्पनाओं पर आधारित एक उपन्यास को पढ़ते पढ़ते जाने कब आँख लग गई लेकिन रोचक तो जब लगा कि सुबह उठा तो कल्पना हकीकत बन गई थी।

घुटनों में यकायक उठे दर्द के साथ सिंक तक गया और शीशा देखा तो सर के ज्यादा तर बाल सफेद हो गए थे । आँखें मली तो जाग्रत अवस्था मे पाया।
तभी शीशे में पीछे नजर आया , मिसेज भी कुछ झुकी झुकी सी लड़खड़ाती मेरी ओर ही आ रही थी।
क्या बनाना है आज? और सुनो प्लीज अब कामवाली बाई लगवा लो जीवन भर तो खूब काम किया मगर अब नही होता..”
उसे मेरे सफेद बालों को देखकर बिल्कुल भी हैरत नही हुई…मेरे विस्मय पर उल्टे बोली, तुम भी न ऐसे व्यवहार कर रहे हो जैसे बीस साल छोटे हो गए हो!
मैंने कहा तुम्हारी चाल को क्या हुआ?
वो बोलीं क्या हुआ जैसा रोज होता है वही हुआ!
इतने में बेटा ड्राइंग रूम में आया उसे देखा तो उसे भी अधेड़ जैसा पाया..
आते ही बोला,
पापा हमारी सोसाइटी में कल से प्राणायाम का शिविर लग रहा है आप भी जाना…
सेहत के लिए अच्छा है। मैं भी समय एडजस्ट करके अपना प्रोग्राम बनाता हूँ। सुबह 6 बजे से है। मै बोला इतना जल्दी!
तो उसने तपाक से जवाब दिया जैसे पहले से ही इसके लिए तैयार हो, ” रोज 4 बजे उठकर घर भर में खटर पटर करते रहते हो और 6 बजे जल्दी लग रहा है?” मैं बुरी तरह विस्मृत था , ये हो क्या रहा है
तभी देखा दूध वाला भी बदल गया है और दूध बॉटल में लाया है । मैंने कहा अरे आज वो लीटर का पैमाना और दूध का चरा कहाँ है और साइकिल की जगह मोटरसाइकिल कब ले ली।
वो शायद जल्दी में था और मुस्कुराकर चला गया।
तब यकायक मैंने देखा, घर की सजावट बदल गई थी। मेज पर रखा टीवी दीवार पर टंग गया था। पर्दे साज सज्जा और फर्नीचर सब बदल गया था। और कोने में रखा टेलीफोन अब गायब था।
मुझे लगा दूसरों के घर मे तो नही आ गया!!
अखबार की सज्जा भी बदल गई थी । वो ब्लैक एंड वाइट अखबार रंगीन पत्रिका सा हो गया था
उसे उठाकर देखा, तो तारीख पर नजर गई। शायद सन गलत छप गया था । 2021 कि जगह 2041…!
तभी आंख खुल गई….मैं हड़बड़ा कर उठा और सीधे काँच के सामने गया तो देखा , सफेद बालों की मात्रा बहुत कम थी।
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हमारी जुदाई शक्ति

कल रात एक अद्भुत अहसास हुआ । जिसे हम स्वप्न कहते हैं उसे मैं जाग्रत अवस्था मे देख रहा था।
भगवन प्रकट हुए और बोले तुम दुख में सबके काम आते हो । हृदय से सरल हो। मै तुमसे प्रसन्न हूँ बोलो क्या मांगते हो !
मैं हतप्रभ था क्या माँगू फिर जैसे तैसे करके बोला प्रभो भविष्य को जान पाऊँ ऐसी शक्ति दे दो।
प्रभु ने ‘तथास्तु’ कहा और किसी को अपनी शक्ति बताते ही और गलत उपयोग करते ही शक्ति लौट जाएगी बतलाकर अंतर्धान हो गए। मैं बहुत हर्ष और आश्चर्य की मिली जुली अवस्था में था।
मैंने भविष्य में जाकर अपनी मौत की वजह को जानने का प्रयास किया।
मैंने देखा मेरी मृत्यु गले के कैंसर से होनी थी।
साथ ही मैंने देखा मेरे बच्चों को मेरी कोई परवाह न थी। सब मर्जी की करते थे । अपनी बीमारी में मेरी पत्नी के सिवा कोई न था।
मैं घबरा कर उठ बैठा। लेकिन कोई सपना नही टूटा था। मुझमें भविष्य काल को पढ़ने की शक्ति आ गई थी। मैं पूरी चेतन अवस्था के साथ अपनी दिव्य ताकत को जान रहा था। और उसके दुरुपयोग पर उसके लौट जाने के खतरे से भी परिचित था।
अगले दिन से ही मैंने अपनी मृत्यु पर गौर करना शुरू कर दिया। मुझे सिगरेट और गुटखे की आदत थी। मैंने इनकी भयावहता को जान लिया था और इनको हटाने के लिए प्रतिबद्ध हो उठा था।
साल भर में मैंने अपनी इन बुरी आदतों से छुटकारा पा लिया।
मैने अपने बच्चों को सनातन धर्म की महत्ता और हर तरह के श्रेष्ठ संस्कारो की शिक्षा की व्यवस्था की।
मेरी पत्नी जी मेरे परिवर्तन पर हतप्रभ थी मगर मैं उसे भी बता नही सकता था।
मैंने कैंसर की हर वजह को जानकर उससे दूरी बनाने के हर संभव प्रयास किये।
धीरे धीरे मैने अपने परिवार के मार्ग में आने वाली विपत्तियों को जानकर उनका निराकरण आरम्भ कर दिया।
समय बीतता गया मेरी अवस्था बुढ़ाने लगी थी। फिर एक रात देखा यमराज मुझे लेने आ गए।
मैं उठ खड़ा हुआ और बोला प्रभो, मैं कैंसर से मरने वाला था और कैंसर मेरे दूर दूर तक नही है।
आप कैसे ले जा सकते हैं मुझे!
यमराज बोले अमर तो सिर्फ महादेव हैं जो अनादि से अनंत तक हैं अन्यथा जाना तो सभी को पड़ता है। तुम कैंसर से बच गए वरना मुझे बहुत पहले ही आना पड़ता। तुमने अपने पूरे परिवार की विपत्तियों को लगभग दूर कर दिया और महादेव की कृपा से सकुशल जीते चले आ रहे हो। किंतु जाना तो होगा। उन्हीने जैसे ही मेरा हाथ पकड़ा मेरी नींद खुल गई।
मुझमें जैसे ज्ञान का प्रकाश जगमगा उठा था।
अगली सुबह मैंने हाथ जोड़कर प्रभु से तन मन और आत्मा से याचना की। हे प्रभो ! आपकी शक्ति आपको ही समर्पित!
जब जाना ही है तो फिर कैसे प्रपंच !
रही बात विपत्तियों से बचने की तो तुमने मानवता को विवेक दिया है। हम उसका इस्तेमाल करें और विपत्तियों से बचे रहें।
ऐसा लगा जैसे प्रभु ने कहा हो…’तथास्तु’!
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हालात

उसे बेतरतीब बदहवास और बिखरे हुए कपड़ों में एक अधेड़ सज्जन को काँधे पर थामे किसी गाड़ी की सहायता मांगते देखा तो समझ गया वो उसका करीबी था और स्थिति काफी संवेदनशील थी।
“भैया हाथ जोड़ती हूँ मना मत करना किसी भी अस्पताल ले चलो जल्दी” मामला कोरोना की वजह से बिगड़ा हुआ लगता था। वो बीमार व्यक्ति उनका पति था और उसे श्वास लेने में दिक्कत आ रही थी। पत्नी की हालात देखकर समझा जा सकता था कि उन महिला के लिए जीने मरने का प्रश्न था।
मैंने ऑटो दौड़ा दिया। रास्ते भर महिला सांत्वना देती रही ‘ तुम घबराओ मत कुहू के पापा ठीक हो जाओगे तुम देखना। मैं हूँ ना”
उस महिला के मैं हूँ न शब्दो मे बज्र जैसी कठोरता थी।
जल्दी ही मैं उन्हें सिटी हॉस्पिटल ले गया। खूब भागा दौड़ी के बाद एक ही जवाब मिला’ बेड खाली नही है।”
मैं इस खतरे को भूल गया था कि उन दोनों को कोरोना पॉजिटिव हो सकता था। जो कि लग भी रहा था। अब मैं उनकी मनोदशा और तकलीफ से जुड़ने लगा था
उसके बाद एक के बाद एक कई अस्पतालों के दरवाजे खटखटाते रहे किंतु राहत की सांस कहीं नही मिली। हालात बिगड़ती जा रही थी और महिला ने अब ऑक्सिजन के अभाव में अपने पति के मुंह में मुंह से हवा देना शुरू कर दिया था। अस्त व्यस्त साड़ी में उस महिला को बिखरे हुए बाल और पति को कैसे भी जिंदा बचाने की जिद और तड़प को देखकर मैं अंदर तक हिल गया। आज लग रहा था ईश्वर दिख जाए तो उसे झकझोर डालूँ कि एक पराया इंसां होकर मैं टूट गया लेकिन तू इतना पत्थर कैसे!
और…अंत में उन महिला के पति ने अपनी पत्नी की बाहों में दम तोड़ दिया। मेरी जिंदगी की ये बेहद दर्दनाक और अब तक कि हिला देने वाली घटना थी।
मुझे समझ नही आ रहा था उन महिला को संभालूं या सरे राह हो रही उस दारुण घटना को।
मैं भूल गया कि मैं अपना ऑटो लेकर दो पैसे कमाने निकला था लेकिन दर्द में भीग उठा था।
किसी तरह हम निर्जीव देह लिए उन महिला के घर पहुँचे और रोती बिलखती महिला की बच्ची को साथ लिया।
शहर और हालात की निर्ममता ऐसी थी कि मदद के लिए कोई हाथ आगे नही आया।
मैं आज जिंदगी को कोस रहा था कि जिंदगी पाकर हमे क्या मिला।
मैं इस मानसिक स्थिति में नही था कि उन महिला के ऊपर सारे हालात छोड़कर निकल लूँ।
मेरा एक मानवीय रिश्ता था उस महिला के साथ जो अब तक जुड़ गया था।
मैं उन्हें लेकर सीधे शमशान घाट पहुंचा । बुद्धि जैसे आगे आगे अपने आप काम करती जा रही थी। जैसे मैं ही अब सब कुछ था । उन महिला और बच्ची की करुणा की भीख मांगती आँखों को देखकर पसीज गया था मैं।
मैने ही उनके लिए लकड़ियां खरीदी चिता जमाई और उनका दाह संस्कार करवाया।
आज तीसरा दिन था। मैं उनके घर पहुंचा कुछ खाने पीने का सामान इत्यादि लेकर।
भयंकर महामारी के हालात और ये दर्दनाक मंजर कितना मुश्किल होता है वो भी किसी महानगर में… मानवीयता को जिंदा रख पाना।
कुछ दिन इसी तरह उनकी दवा और भोजन इत्यादि की व्यवस्था में निकल गए । धीरे धीरे उनकी पारिवारिक स्थिति स्पष्ट होती चली गई। उनके नजदीकी रिश्तेदारों में कोई खास न था। जो थे वो फोन पर सांत्वना देकर ही काम चला रहे थे। उनके पति एक प्राइवेट इलेक्ट्रॉनिक कंपनी में कार्यरत थे।
गहरा जुड़ाव हो चुका था मुझे भी…न जाने क्यों!
चुंकि मैं भी अकेला ही था, मेरी संवेदनाएं उनके प्रति गहरी होती चली गई थी। समय गुजरा , हालात कुछ संभलने लगे थे।
फिर मैं एक दिन पूछ बैठा, ‘मुझसे शादी करोगी ?”
उन्होंने बेटी कुहू को बुलाया और सीने से चिपका लिया जैसे कहना चाह रही हों.. मेरे एक बिटिया भी है। संभाल पाओगे दोनों को?


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ऐ हिंदी तुझमें माँ जैसा भाव है

ये कैसा लगाव है
ऐ हिंदी तुझमें माँ जैसा भाव है

उँगलियाँ थाम कर माँ ने
तुझ संग चलना सिखलाया
अ से अनार इ से इमली का
हर रस तुझमें पाया
लिखना पढ़ना अंग्रेजी में भी
बहुधा हुआ करता है
जाने क्यों मगर हिंदी से चाव है
ऐ हिंदी तुझमें माँ जैसा भाव है

सरकंडे की कलम बनाकर
तुझको ढाला लेखन में
लिख कर ,कह कर, पढ़ पढ़ कर
तुझको अपनाया तन मन ने
सुंदर लेखन में लगती प्यारी हो
तेरे लेखन में अद्भुत रिझाव है
ऐ हिंदी तुझमें माँ जैसा भाव है

अन्य भाषाओं का भी
जीवन में बहुधा लाभ मिला
जब जब तन्हा हुआ घबराया
मेरे चिंतन को मगर
हिंदी का साथ मिला
भाषाएँ सब बगिया जीवन की
हिन्दी बरगद की छाँव है
ऐ हिंदी तुझमें माँ जैसा भाव है

तुझे बोलता लिखता हूँ
पग पग पर तुझको पढ़ता हूँ
तुझमें बहकर उज्ज्वल हुआ
हिंदी की धारा में
माँ गंगा जैसा बहाव है
ऐ हिंदी तुझमें माँ जैसा भाव है

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वह तोड़ती पत्थर

( निराला जी की प्रसिद्ध कविता
वह तोड़ती पत्थर”
की पंक्ति पर आधारित मेरी रचना)

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वह तोड़ती पत्थर
रवि रश्मियों को कर उपेक्षित
कर्म रत होकर मगन
सन्तति है ध्येय उसका
बढ़ रही है वो निरंतर
वह तोड़ती पत्थर

प्रहार उसका प्रस्तरों पर
व्यवस्थाओं पर वार जैसे
नर्म हाथों में हथौड़ा
उठी हुई तरवार जैसे
घात करती हो अरि पर
वह तोड़ती पत्थर

स्वेद बूंदें चमक रहीं
श्रम तत्पर देह पर
कौंधती है दामिनी सी
लक्ष्य के है वो अश्व पर
वह तोड़ती पत्थर

तीर सा विदीर्ण करते
पुरुषों के चक्षु बाण
तोड़ रही हालात अपने
समक्ष उसके है पाषाण
स्वरूप का ही तो अंतर
वह तोड़ती पत्थर
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