घट के राम

पूरा आश्रम , ‘हरे राम हरे राम..’के संकीर्तन से गुंजायमान हो रहा था।
गुरु भाई ही नहीं , लग रहा था जैसे पेड़ की शाखों पर बैठे पंछी भी अपनी कलरव में प्रभुनाद कर रहे थे। हवा में फैला हुआ ईश स्वर तन मन में संचारित होने लगा था।
श्री पुष्कर जी के सप्त -ऋषि घाट पर स्थित पावन आश्रम !!
आज गुरुपूर्णिमा थी और माँ-पिताजी मुझे अपने गुरु आश्रम में लाये थे ।
बंगाली बाबा नाम से पहचाने जाने वाले गुरुदेव श्री सीताराम ओंकार नाथ जी महाराज का आश्रम था वह। बाबा अक्सर कलकत्ता से पुष्कर जी आकर प्रवास करते थे।

धुंधली यादों के धरातल पर किसी ठोस वजह का तो भान नहीं , बस इतना भर याद कि पिताजी ने उन्हें  गुरु मान कर उनसे दीक्षा ली।
फिर पूरा परिवार उनका अनुगामी बना।
आज मुझे दीक्षा के लिए लाये थे पिताजी।New Doc 38_1_20151230220337689
बाबा एक कम्बल पर बैठे हुए थे। कृष काया, ठोडी पर लंबी सफ़ेद दाढ़ी, जटाओं सी केश राशि, तन पर एक रामनामीऔर कमर अंगरखी , झुकी हुई कृष काया और चेहरे पर गाम्भीर्य …
उनके चारों और बैठे अनुयायी सतत हरे राम हरे राम..नाम के प्रवाह  में लीन थे। आत्मविभोर कर देने वाला वातावरण था।
पिताजी ने पुष्कर जी के घाट पर पुनः एक बार स्नान किया। मुझे भी अपना हाथ पकड़ कर डुबकी लगवाई। और सफ़ेद धोती पहनाई ।
मैं नव पोशाक में खुद को बड़ा असहज महसूस कर रहा था। पूछने पर माँ ने बताया की दीक्षा कार्यक्रम है अतः धवल वस्त्र पहनाये हैं।
मुझे क्या पता था भविष्य के गर्भ में शुभ्र रंग मेरा इन्तजार कर रहा है।
घाट पर कोई मछलियों के लिए दाना बेच रहा था। माँ ने मेरे हाथों से मछलियों को दाना डलवाया। उस वक्त तो वह मेरे लिए एक कोहतूल भरा कार्य था। आज उसका मर्म समझ में आता है।
हमारे वैष्णव धर्म की व्याख्या बहुत ही विशाल है। चींटी से लेकर हाथी तक सभी को भोजन कराने को हम “धर्म” समझते आये हैं।
मैं अपनी माँ के भावों को अब समझने लगा हूँ कि क्यूँ वो, चींटी, चिड़ियाँ, गाय, श्वान, कपोत सभी को अन्न स्वरूप आहार देना मुझे समझाया करती थी।
आज मैं अपने बच्चों को इन सब बातों का मर्म समझा कर अपनी माँ की नीति को अगली पीढ़ी में पहुँचाना चाहता हूँ। हमारा धर्म इसी तरह फलित होता रहता है।
नहा धोकर मैं गुरु दीक्षा के लिए एक कुशा के आसन पर बैठने का निर्देश हुआ।
कुछ ही समय पश्चात गुरुदेव पधारे। उन्होंने मेरे सर पर अपना हाथ रखा और झुक कर मेरे कानों में,
एक मन्त्र का उच्चारण किया-
|| हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे,
हरे कृष्णा हरे कृष्णा , कृष्णा कृष्णा हरे हरे||

खड़ाऊ पहने उनके चरणों में मैंने सर झुकाया। मुझे
आशीर्वाद देकर वे  अगले दिक्षुक की तरफ बढ़ गए।
9-10 बरस की उम्र रही होगी मेरी। इन सब बातों का अर्थ समझ पाना मेरे बस में नहीं था। पिताजी ने सहमति दी है तो जरूरी ही होगा। बस यही समझ कर अपने कर्म को अपनी जिम्मेदारी समझ लिया करता था।
गुरुदेव की वजह से मेरा घर राममय रहता था। पिताजी माँ एवं बहनें नित्य ही राम का नाम पुस्तिका में लिखते रहते थे। 12-13 वर्ष की वय तक आते आते मैंने भी यह लेखन आरम्भ कर दिया।
हर वर्ष गुरुपूर्णिमा को हम अपनी लिखी हुई राम नाम की पुस्तिकाएं गुरु आश्रम में ले जाकर गुरुदेव को भेंट करते। इसे ही वह गुरु दक्षिणा कहते थे।
आश्रम का मुख्य कक्ष ऐसी पुस्तिकाओं से अट जाया करता था।
मैं नहीं समझता कितना पाप / पूण्य का लेखा हुआ होगा , लेकिन राम नाम में मेरी श्रद्धा बहुत गहरी हो गई।
नवरात्रि के शक्ति पूजन के दिनों में भी मेरे घर में श्री राम जी की ही पूजा होती थी।
घर का नाम तक ‘श्री राम कुञ्ज ‘ रखा गया था।
आज ऐसे नाम नहीं मिलते अब ‘विला’ हो गए हैं।
मातृ या पितृ छाया भी हैं कहीं कहीं, लेकिन हकीकत कुछ और।
…आज उस आश्रम का नक्शा बदल गया है।
गुरुदेव के देवलोकगमन के पश्चात वहां काफी समय तक उनके शिष्य राम जप किया करते थे । फिर एक समय ऐसा भी आया जब आश्रम में जाने वाले भक्तों की संख्या में कमी होती गई।
और राम नाम का संकीर्तन फिर ऑडियो सिस्टम के द्वारा जारी रखा गया।
पिछले दिनों मैं हर बार की तरह हीअपने आश्रम में गया।
हर वक्त खुला रहने वाला आश्रम का मुख्य द्वार आज बंद था। उसे धकेल कर अंदर गया तो सन्नाटा फैला पड़ा था। बंदरों की एक टोली जरूर पेड़ों पर धींगा मस्ती कर रही थी।
उनका वो सन्नाटा तोडना मुझे अच्छा लग रहा था।
मालूम हुआ , वहा एक रखवाला रखा गया जो शायद भोजन व्यवस्था के प्रयोजन से कही इधर उधर था।
आँखें बंदरों की उछल कूद पर थीं मेरी, किन्तु कान उस निरंतर उठती हुई ध्वनि को तलाश रहे थे जब अब रुक गयी थी। वो राम जप का ऑडियो सिस्टम अब स्थिर हो चला था ।
मैं जैसे किसी अदृश्य सशक्ति के द्वारा निर्देशित हो रहा था। मानो बाबा कह रहे हों….
“आलोक , यहाँ भले यह संकीर्तन रुक गया , किन्तु अपने ह्रदय में तुम राम नाम का जाप यूँ ही सतत् बनाये रखना। यूँ ही..जब तक सांस थक न जाए जब तक…..!!”

 

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इजराइल और भारत

मैं इजराइल का व्यक्तिगत रूप से आरंभ से ही समर्थक रहा हूँ।
मेरा मानना है कि विशेषताओं को सम्मान और समर्थन दोनों ही दिए जाने चाहिए।
इस लिहाज से इजराइल नज़रे इनायत का हकदार है।
इजराइल के नागरिकों में राष्ट्रीयता कूट कूट कर भरी होती है और उसे इस मामले में जापान के समकक्ष रखा जा सकता है।
इजराइल का हर नागरिक परोक्ष रूप से सैनिक है।
क्षेत्रफल से तुलना करें तो इजराइल राजस्थान से भी छोटा है और पानी की भारी कमी वाला देश है।
फिर भी कृषि के क्षेत्र में इजराइल अपनी आवश्यकताओं का 85% अन्न स्वयं उत्पादित करता है।
वहां कृषि को पानी ,फैला कर नहीं अपितु उसी तरह दिया जाता है जैसे किसी व्यक्ति को ड्रिप चढ़ाई जाती हो।
पानी की एक बूंद खराब नहीं कि जाती। इसके अतिरिक्त इजराइल अपने waste water का 70 प्रतिशत पुनः कृषि योग्य बना लेता है।
हथियार तकनीक में इजराइल का कोई सानी नहीं।
भारत अपनी कुल आयातित अस्त्र शस्त्र का 7% प्रतिशत इजराइल से ही खरीदता है।
कोरिया जो कि ISIS जैसे आतंकवाद से जूझ रहा है, इजराइल से सटा हुआ है किंतु मजाल कि ISIS इजराइल की तरफ आंख उठाकर भी देख ले।
कल्पना करें यदि सीरिया भारत से सटा देश होता।

70 साल बाद मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं जो इजराइल जा रहे हैं।
आखिर इतने उन्नत और सामरिक दृष्टि से मजबूत राष्ट्र की भारत की पूर्व सरकारों ने उपेक्षा क्यूँ की!!
शायद इजराइल के शत्रु राष्ट्र फिलिस्तीन से पंगा नहीं चाहा हो पूर्व प्रधानमंत्रियों ने!!
कहीं ये मुस्लिम जगत का तुष्टिकरण तो नहीं!!
मोदी जी इजराइल जाएंगे किन्तु फिलिस्तीन नहीं।
नीतियां स्पष्ट हों तो राष्ट्र आगे बढ़कर हाथ मिलाते हैं।
जब चीन आंख दिखा रहा है तो भारत के साथ अमेरिका, इजराइल ,जापान खड़े हैं। कल ही फ्रांस ने भी कहा है कि वह इस मामले।में भारत के साथ खड़ा है।
ड्रेगन को आंख दिखाने के बदले विश्व को अपने समर्थन में खड़ा करने की नीयत से मोदीजी ने विश्व भ्रमण किया है!!
अमेरिका सहित अन्य देशों की हाल ही की यात्राओं में मोदी जी ने जितनी भी रातों की नींद थी, वो यात्रा के दौरान अर्थात हवाईजहाज में ही पूरी की है, लेकिन इस बात को मीडिया जगत में जगह नहीं मिलेगी।
इजराइल भारत का बर्षों पुराना हितैषी रहा है।
इजराइल के पासपोर्ट पर एक सूचना स्पष्ट लिखी होती है।
*पाकिस्तान को छोड़ समस्त विश्व के लिए मान्य*
बता दूं ,पाकिस्तान जब से अस्तित्व में आया है तब से इजराइल , पाक विरोधी रहा है।
अगर चीन भारत से युद्ध करता भी है तो इजराइल भारत का सक्रिय रूप से सहयोग करेगा इसमे अतिशयोक्ति नहीं।
और अंत मे इतना और बताता चलूं , इजराइल भारत के साथ रिश्ते रखकर विश्व में अपनी जगह उच्च राष्ट्रों के बीच रखना चाहता है, क्यूंकि इजराइल जानता है आज भारत की स्थिति विश्व मे विश्वसनीय है।
फिर वो चाहे शांति स्थापना हो या फिर अंतरिक्ष तकनीक !!

#जय भारत
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इमली का पेड़

अजमेर की जिस सुनसान सड़क पर सीना तान कर अकेले खड़े इमली के पेड़ को देखकर डर जाया करता था, आज उसके चारों ओर कतार से बाजार सज चुके हैं।
पेड़ को इतना भी नहीं बख्शा कि धूप से परेशान राहजन या मवेशी उसकी छाया में सुकून पा सकें।
प्रकृति का सम्मान करने और उसकी महत्ता को समझने वाले कम ही होते हैं।
पिछले 40 वर्ष से उस सड़क पर मेरे बचपन का गवाह एक बस वही है !
इमली का वृक्ष साल भर हरा भरा रहने वाला वृक्ष है। इसका फल खट्टा मीठा होता है जिसे इमली के रूप में जाना जाता है। भारतीय रसोई में इमली को जगह मिली हुई है। कई व्यंजनों में स्वाद बढ़ाने के लिए इमली का उपयोग होता है। इसके बीज में औषधीय गुण होता है। हम तो इन बीजों को दो भागों में विभक्त करके चंगा पौ नामक क्रीड़ा में पासों के रूप में काम मे लेते थे। इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है, अतः फर्नीचर के लिए काम मे आती है। अब तो फर्नीचर में भी बहुधा प्लास्टिक, या स्टेनलेस स्टील का उपयोग होने लगा है। लकड़ी उपलब्ध न हो पाने की वजह से भी नए प्रयोगों ने जन्म लिया होगा।
कहाँ से आये बहुतायत में इतनी लकड़ी !!
जैसे तैसे वृक्षारोपण को प्रोत्साहित किया जा रहा है तो लोग आसानी से बड़े हो जाने वाले वृक्ष लगाकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं, ताकि उनमें बार बार पानी खाद देने और उनकी सार संभाल करने के झंझट से मुक्ति मिल जाये! अब आम, शहतूत, जामुन, इमली  के विशाल वृक्षों की आधारशिला कौन रखता है!

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इमली का पेड़

हाँ तो बात कर रहा था मैं अपने मौहल्ले की मेन सड़क पर लगे उस इमली के पेड़ की। अपने बड़ों को मैंने कहते सुना था कि इमली के पेड़ पर भूत रहते हैं। मेरे बाल अवचेतन पर स्वाभाविक था गहरा असर पड़ा। रात क्या दिन में भी मैं उसके पास से गुजरने में डरता था। तब उस रोड़ पर आबादी बहुत विरल थी। मुझे उधर से गुजरना हो तो मैं किसी साथ कि तलाश किया करता था। रात में तो मैं कल्पना भी नही कर पाता था कि इमली के उस कद्दावर और घने वृक्ष को देख भी सकूँ।
वृक्षों को बचाने के लिए ही “भूत” नामक डर को फैलाया जाता होगा ताकि लोग उसे नुकसान न पहुंचाएं। पीपल और वट वृक्ष के प्रति भी ऐसा ही भय व्याप्त रहता है । ये सभी वृक्ष मानव समाज और प्रकृति के लिए बहुत बड़ा योगदान हैं।
आज जब मैं अपने गृह नगर के मौहल्ले में पहुंचता हूँ तो उस वृक्ष को देखकर अतीत में खो जाता हूँ। वो बचपन का डर एक पल के लिए लौटकर आता है किंतु ज्ञान उसे पल भर में समाप्त भी कर देता है।
हमेशा की तरह मेरा पुनः सबसे अनुरोध रहेगा । वृक्ष मानव जीवन का बहुत बड़ा सहारा हैं। आज जो विशाल वृक्ष हम देखते हैं उसके लिए हमे अपने पूर्वजों के लिए कृतघ्न होना चाहिए।
लेकिन हम हमारे उत्तराधिकारियों को क्या देकर जा रहे हैं ?

 

 

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शंटिंग के दौरान रखी जाने वाली सावधानियां

जैसे जिस्म की धमनियों में 24 घंटे रक्त प्रवाहित रहता है उसी तरह दिन रात हर घड़ी हजारों हजार गाड़ियां दौड़ती रहती हैं।
इन गाड़ियों के आरंभिक स्थल से लेकर मार्ग में वाणिज्यिक और यांत्रिक कारणों और गंतव्य स्थल पर भी शंटिंग कार्य की आवश्यकता होती है।
शंटिंग आपरेशन एक ऐसी सामूहिक प्रक्रिया है जिसमे दो या दो से अधिक कर्मचारियों के आपसी तालमेल की जरूरत पड़ती है। इस प्रकार यह एक जरूरी उद्यम हो जाता है हमे कुछ सावधानियों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
1) शंटिंग की गति के लिए जो नियम बनाया गया है उसके अनुरूप किसी भी दशा में गति 15 kmph से अधिक नहीं होनी चाहिए।
2)जिस स्टेशन पर शंटिंग की जानी है उसके SWR से हम भली भांति अवगत हैं यह भी सुनिश्चित हो।
3)जो भी शंटिंग कार्य है उसको भली भांति समझकर हमने आवश्यक प्राधिकार प्राप्त कर लिए हैं।
4) एक कोच/ वैगन के मामले में जिस रोलिंग स्टॉक को काटा जाना है वह सही है जैसे कि कोई पार्टी कोच गाड़ी से अलग करना है तो हमने कोई दूसरा कोच न काट दिया हो।
5) शंटिंग में प्रयुक्त हाथ संकेतों में दिन में लाल- हरी झंडियां और रात्रि में लाल- हरी led युक्त बत्ती का प्रयोग हो । लाल आस्पेक्ट खराब हो जाने पर सफेद बत्ती का नियमानुसार उपयोग हो अन्यथा सफेद बत्ती शंटिंग कार्यों में वर्जित है।
6) जिन रोलिंग स्टॉक मे मानव हों अर्थात आर्मी गाड़ी के डिब्बे, श्रमिकों से भरे डिब्बे, या यात्री गाड़ी के डिब्बे 8 kmph से अधिक गति में शंटिंग न किये जाएं।
7)शंटिंग के लिहाज से अलग अलग रोलिंग स्टॉक की अलग अलग गति सीमा है उनका पालन हो।
8) यात्री गाड़ी की शंटिंग है तो ध्यान रहे इंजन कटने के बाद शेष बचे भाग के आखिरी कोच का कॉक खोल दिया गया है ताकि उसका प्रेशर ड्राप हो जाये और गाड़ी लुढकने का डर न रहे। और इंजन काटने से पहले ब्रेकवान का हैंड ब्रेक वान्ध दिया गया है यह सुनिश्चित किया जाए।
9) शंटिंग के लिए जो अधिकृत व्यक्ति है वो ही शंटिंग करे, ऐसा न हो गार्ड साब ड्राइवर साब को चाय पीने ले जाये, और शंटिंग सहायक ड्राइवर करे। ध्यान रखें गार्ड बंधुओं आपकी चाय की मिठास कहीं कडुवाहट में न बदल जयें।
10) शंटिंग सही स्थान से करवाई जाए। लीवरमेन फ्रेम से ही संकेत दे रहा है कहीं ऐसा न हो पास वाली लाइन का चालक जिसे घर पहुँचने की जल्दी है, वो रवाना हो जाये।
11) शंटिंग के दौरान मार्शलिंग का भी पूरा घ्यान रखा जाए अन्यथा संचालन के दौरान हुई गड़बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है।
12)दोस्तों, शॉर्टकट न अपनाएं। बहुत पहले जब मैं मालगाड़ी गार्ड था, एक बार यार्ड में दुर्घटना होते होते बची।
गाड़ी को जल्दी चलाने का दबाव था वैक्यूम गाड़ी के हौज़ पाइप को रखने के लिए वैगन में डमी प्लग नही था । समय बहुत लग रहा था, इतने में यार्ड मास्टर आये और उन्होंने हौज़ पाइप को अपनी हथेली से बंद कर निर्धारित वैक्यूम बना दिया । अब ट्रेक में वो आगे और पीछे शंटिंग का वैगन और इंजन! इतने में जोर का झटका आया और मैंने बिना कोई पल गंवाए उन्हें तुरंत बाहर खींच लिया। आप समझ सकते हैं कैसा हादसा हो सकता था।
साथियों, मेरे एक मित्र अक्सर कहते थे ” खड़ी का जवाब है पड़ी का नहीं ”

समय कितना लगे ये बाद कि बात है लेकिन संरक्षा की अनुपालना हमारा परम ध्येय हैं हम इससे चूकें नही।
धन्यवाद साथियों!!

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गुलाब जिंदगी ?

हर पल खुशियां
नृत्य, रास
हंसी के छल्ले
खिलते चेहरे..
जिंदगी यहीं तक नहीं !

गुलाब जिंदगी
काँटों का अहसास
तीखी तो कभी
मीठी वेदना
अव्यक्त भय
पलटते मोहरे
और
बदलते चेहरे
यही है..जिंदगी !!
🌿

#अलफ़ाज़_मेरे

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आशीर्वाद की अनुभूति~

(7 अप्रैल 2017)

बीती रात मुझे पूरे समय नींद नहीं आई। हाँ तड़के कोई 4 बजे बाद कोई आँख लगी होगी।
लेकिन आँख लगने के बाद जो मैंने स्वप्न में देखा तो अब तक पछता रहा हूँ कि मेरी आँख क्यों खुली ? मैं उस परमानंद के प्रसाद को और अधिक लेना चाह रहा था । कोई साढ़े 5 बजे आँख खुली और मैं उस आनंद-यात्रा से बाहर निकल आया था। उठते ही मैनें श्री गजानंद जी , हनुमान जी आदि देवताओं को अश्रुपूरित आंखों से नमन किया और देर तक पुलकित रहा और संभवतः पूरे दिन रहूंगा भी!
अभी रामनवमी गुजरी ही है और मैं अस्पताल में बीमार अवस्था में 4 दिन निराहार दवाइयों और ड्रिप पर काट कर कल ही आया हूँ अर्थात मेरे आधे नवरात्रे परमात्मा की कृपा से निराहार अवस्था में हो गए थे।
मेरे पिताजी ने भगवान् राम के भजन पूजन की एक संध्या या पूरी रात का आयोजन किया जिसमें मेरे परिवार के अनेकानेक बड़े पधारे थे। भगवान् राम लक्ष्मण सीता माँ हनुमान जी की बड़ी बड़ी तस्वीरें सजी हुई थीं।
एक महंत द्वारा केसर मिलाकर खूब भांग बांटी जा रही थी। सामने बैठे थे कमाल भाईसाब।, जो महंत के भांग बांटने के कार्क्रम में सहयोगी रूप में उपस्थित थे । बाउजी के पड़ौसी मित्र और अपने स्वजाति मित्र लाडली प्रसाद जी समेत कई पड़ौस के सज्जन पधारे थे।
एक बड़े भंडारे का आयोजन हुआ जिसमें पूड़ी, आलू की सब्जी और हलवे का भोजन सैंकड़ों लोगों ने किया। मेरी भुआ, मम्मीजी, किरण समेत सभी बहनें और भुआ जी की समस्त पुत्रियों और जवाइयों समेत समस्त परिवार शामिल हुआ।
सबसे बड़ी बात बाऊजी ने हनुमान जी का रूप धारण किया और झांकी के रूप में भगवान् राम के समक्ष घोटा लेकर खड़े हुए थे।
मैंने उनकी कुछ तस्वीरें मोबाइल में लेने का प्रयास भी किया।
बाउजी को इस रूप में देखकर और समस्त परिवार को एक साथ काफी अंतराल बाद भोजन करते हुए देखकर मैं बहुत प्रसन्न था।
लेकिन सपना तो सपना ही होता है। टूटना था….टूट गया।
सुबह के साढ़े पांच बजे थे। मैंने उठकर भगवान् की मूर्ति को हाथ जोड़े और इस अद्भुत दर्शन से रोमांचित करने के लिए आंसूओं के साथ धन्यवाद दिया।
प्रभु की, और मेरे घर के बड़े जनों की, माता पिता और सभी वृद्ध जनों की कृपा बनी रहे। कमल भाईसाब तो मेरे स्वप्न में अक्सर आते हैं लेकिन आज समूचा परिवार दर्शन दे गया।
मैं अभिभूत हूँ।
आप जो भी बड़े छोटे हैं अन्य परिजनों से मेरे इस स्वप्न को बाँटें और अर्थ निकालने का प्रयास करें, घर के बड़े जनों और ईश्वर ने क्या संदेश और क्या आदेश दिया था।

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सिक्के का दूसरा पहलू

पूरा परिवार दूरदर्शन में ऑंखें गड़ाए कपिल शर्मा के शो में डूबा हुआ था कि अचानक बिजली गुल हो गई।
निराशाओं के स्वर फूटने लगे! कोई ‘धत तेरे की’, कोई ‘मर गए’, कोई ‘ओ तेरी ! ‘…जैसे शब्दों के माध्यम से अपनी हताशा दर्शा रहा था। तलाश किया तो मोमबत्ती नहीं मिली।
बचपन में तो लालटेन तैयार रखते थे माँ पिताजी मगर अब जमाना काफी आगे निकल गया है।
4 लोगों के छोटे से परिवार में कोई क्या क्या देखे!
आखिर में तय हुआ चलो छत पर चला जाए तब तक आ ही जायेगी बिजली।
गाँव से बड़े भाईसाब भाभी जी आये हुए थे।
छत पर अर्से बाद आया था। पूरे शहर की बिजली नदारद थी । हर तरफ अँधेरा.. मगर आसमान टिमटिमाते तारों से जगमगा रहा था। काफी समय के बाद आसमान को इस तरह निहारना अच्छा लग रहा था। मेरा भतीजा आकर पूछने लगा, चाचा देख कर बताओ सप्तऋषि मंडल कहाँ है?
उसका सवाल मुझे झकझोर गया। बचपन लौट आया था । ये सवाल तो कभी मेरा भी हुआ करता था अपनी बहनों से जब हम गर्मियों में छत पर सोया करते थे। तारों की भांति भाँति की काल्पनिक रचनाओं को भी बनाकर निहारा करते थे।
बिजली गुल हुई तो हाल ही के चुनावों में मुद्दा बनी गुल बिजली का जिक्र छिड़ गया। सटी हुई छत पर पड़ौस के तिवारी जी भी दीवार कूद कर आ गए थे, चर्चां से जुड़ने के लिए।
यूपी के चुनावों में बिजली का क्या किरदार रहेगा ये तो परिणाम बताएँगे लेकिन बिजली का गुल होना मुझे जरूर मोह रहा था।
कभी टीवी तो कभी कंप्यूटर और रहा सहा मोबाइल भी समय छीन लेता है। अंदर ही अंदर गुल हुई बिजली को मैं धन्यवाद दे रहा था। रूटीन की लाइफ से कुछ हटकर सबका इकट्ठे होकर बतियाना मन को सुकून पहुंचा रहा था।
आज का सबसे ज्वलंत मुद्दा , जो कि चर्चाओं में आ जाता है और वह है समय का अभाव।
अरे भई, समय तो उसी रफ़्तार से चलता आ रहा है मगर अचरज है हम समय से भी तेज हो गए हैं। साथ साथ चलता हुआ समय, अब ओझल हो जाता है।
भाईसाब किसी सामाजिक कार्यवश आ गए थे तो मिलना हो गया लेकिन उनसे कैसी शिकायत! जब समय का रोना मैं भी रोता हूँ।
बातों का दौर चला । दिल में एक तसल्ली थी कि बिजली गुल होने के बहाने ही सही थोड़ी देर के लिए कृत्रिम जिंदगी से निकल आये थे।

बतियाते हुए भाईसाब विषयांतर होने लगे थे। बीच बीच में तिवारी जी का हूँ का संपुट  दर्शा रहा था इंसान अपने अतीत से कितना लगाव रखता था।
भाईसाब का मत था कि आधुनिक देन मोबाइल सुविधाओं के साथ साथ खोखला भी बना रहा है। कई बीमारियां सिर्फ मोबाइल की देन होता जा रहा है।सर झुकाए मोबाइलरत प्राणी मोबाइल से परे कुछ नहीं सोच रहा। उसकी बैटरी 30 प्रतिशत से नीचे आते ही व्यग्रता देने लगती है।
खबरों और सूचनाओं का आदान प्रदान जरूर तुरत फुरत हो जाती है लेकिन डाकिये का इंतजार और खत की उत्सुकता अब कवियों और साहित्य चर्चाओं में ही मिलेगी।
हर चीज में जल्दी और कम समय में परिणाम ….फिर भी इंसान के पास वक्त नहीं।
तिवारी का समर्थन चर्चा को और अधिक उत्साही बना रहा था।
ये नेट…इस नेट में दुनियां उलझती जा रही है।
क्यों, सही न कहता हूँ बोलो, भाईसाब के इस कथन पर मुझे हां में गर्दन हिलानी ही पड़ी । मैं सोच रहा था जाने कब बिजली आएगी, भाईसाब तो आज टेक्नोलॉजी को रौंधे मानेंगे। मगर हकीकत तो यही थी तकनीक ने मानवता को रौंधना आरम्भ कर दिया है।
उस रात कुछ पल बचपन जैसे गुजरे थे
कोई अहसास था जो छूकर निकला था।
ये दौर कितना अजीब था
जो कहाँ ले आया मुझे।
दे गया बनावटीपन और
छीन ले गया नैसर्गिकता मेरी।

आदतन मैं कुछ शायराना हो चला था ।
अक्सर भावुकता में डूबना अच्छा लगता है। वक्त को पकड़ना चाहता हूँ और बंद मुट्ठी की रेत सा सरक जाता है ये।
फिर एक शोर उठा!
बिजली लौट आई थी। हम अतीत और बचपन से लौट आये थे हकीकत के पथरीले धरातल पर।
सबको रूटीन जिंदगी का दंश बेदने लगा । किसी को रसौई तो किसी को टीवी देखना था।
समय फिर सरपट दौड़ने लगा था…बनावटी सड़क पर…।

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दरारें

आज शाम अपने किसी ख़ास जन से मुलाक़ात हेतु उनके निवास स्थान तक गया था।
चूंकि वहां अक्सर आना जाना होता है अतः औपचारिकता को कहीं जगह नहीं है।
बैठे हुए टेबल पर एक कार्ड पर नजर पड़ी।
कार्ड विवाह निमंत्रण का था किंतु कुछ अलग सा प्रतीत हो रहा था। जहां हिंदू धर्म में वैवाहिक पत्रिकाएं मुख्यतया रिद्धि सिद्धि के देव और भारत के आराध्य श्री गजानन महाराज के चित्र ,उनके आह्वान और आशीर्वाद के साथ सजी होती हैं उस कार्ड पर ऐसा कुछ नहीं था लेकिन उस पर दो फोटो प्रमुखता से छपे हुए थे। एक गौतम बुद्ध और दुसरे भीमराव अंबेडकर।

New Doc 2017-03-06_1

वैवाहिक निमंत्रण-पत्रिका

पत्रिका के अंदरुनी पृष्ठ पर दृष्टिपात किया तो जय भारत ,जय भीम और नमो बुद्धाय के साथ चिरंजीवी का सौभाग्यवती आदि शब्दावली की जगह उपासक और उपासिका जैसे शब्दों के साथ वर वधु के नाम छपे हुए थे।
पूरे कार्ड में हिन्दू धर्म के देवताओं का कहीं जिक्र नहीं !
आज के आधुनिक परिवेश में कुछ लोग ईश्वरवाद को अलग रख कर अपने ही में जीते हुए देखे जाते हैं। वहां तक समझ आता है किंतु किसी मानव को महामानव के दर्जे से ऊपर ले जाते हुए भगवान् मान लेना तर्कसंगत नहीं लगता। ईश्वर और मानव को क्या समकक्ष रखा जा सकता है?
चूंकि हिन्दू रीतियों से परे हटकर किसी हिन्दू विवाह का कार्ड पहली बार मेरे सम्मुख था, कौतूहल का विषय बन गया था।
दो तीन बंधूवर और भी उपस्थित थे वहां।
चर्चा का अच्छा खासा विषय बन गया था। बहुत देर तक चिंतामग्न होते हुए वैचारिक झझावात मन को उद्वेलित कर रहे थे। आखिर कुछ हिंदुओं को हिंदुत्व से ही ऐसी क्या चिढ़ होने लगी? इस धर्म में ऐसी अपूर्णता कहाँ है जो अलग पंथ बनाकर उसका अनुसरण किया जाने लगे।

नदी से अलग होकर बहने वाली धाराएँ लक्ष्यविहीन होकर भूगर्तों में समाहित हो जाती हैं। किसी एक बिंदु पर जाकर हमें भी सोचना होगा कि खामी धर्म में नहीं तो हम में ही है जो बात यहां तक आ पहुंचती है। हिंदुत्व कोई धर्म ही नहीं अपितु सफल जीवन जीने की एक कला है। जरिया है। हमने जबरन किसी पर हिंदुत्व नहीं लादा।
जिस धर्म की पूजा अर्चना में ही विश्व का कल्याण और धर्म की स्थापना का संकल्प लिया जाता हो उस धर्म से उसी के लोगों का टूटकर विद्रोही हो जाने जैसा कार्य है यह।
अगर मुस्लिम , ईसाई या अन्य संप्रदाय हमारे आराध्य देव गणपति को न मानें वह समझ आता है किंतु हिन्दू ही हिंदुत्व और उसके आराध्य देवों की ऐसी उपेक्षा असहनीय है।
चर्चा में जो बात उभर कर आई उससे ज्ञात हुआ कि कुछेक जगह अनुसूचित जातियां और जन जातियां अब गौतम बुद्ध और भीमराव अंबेडकर को ही भगवान् का दर्जा देने लगी हैं। यहां तक कि महाराष्ट्र समेत कुछ हिस्सों में वैवाहिक रस्मे जैसे अग्नि को साक्ष्य मानकर लिए जाने वाले एक प्रमुख रस्म , सात फेरे भी अंबेडकर प्रतिमा के समक्ष लिए जाने लगे हैं।
किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता उसके देशवासियों के एकीकृत होकर मजबूती प्रदान करने में है किंतु यह sc/st का जहर अब आरक्षण ही नहीं अपितु अपने आराध्य देव और अपना धर्म ही अलग कर चलना चाह रहा है। दशकों से जातियों की आग में सुलग रहा भारत देश अब एक नए युग रहे पंथ का सामना करने जा रहा है ।कमोबेश एक समाज की नई सोच से तो ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। ऐसा क्यों किया जा रहा है समझ से परे है और शोध का विषय भी।

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