घट के राम

पूरा आश्रम , ‘हरे राम हरे राम..’के संकीर्तन से गुंजायमान हो रहा था।
गुरु भाई ही नहीं , लग रहा था जैसे पेड़ की शाखों पर बैठे पंछी भी अपनी कलरव में प्रभुनाद कर रहे थे। हवा में फैला हुआ ईश स्वर तन मन में संचारित होने लगा था।
श्री पुष्कर जी के सप्त -ऋषि घाट पर स्थित पावन आश्रम !!
आज गुरुपूर्णिमा थी और माँ-पिताजी मुझे अपने गुरु आश्रम में लाये थे ।
बंगाली बाबा नाम से पहचाने जाने वाले गुरुदेव श्री सीताराम ओंकार नाथ जी महाराज का आश्रम था वह। बाबा अक्सर कलकत्ता से पुष्कर जी आकर प्रवास करते थे।

धुंधली यादों के धरातल पर किसी ठोस वजह का तो भान नहीं , बस इतना भर याद कि पिताजी ने उन्हें  गुरु मान कर उनसे दीक्षा ली।
फिर पूरा परिवार उनका अनुगामी बना।
आज मुझे दीक्षा के लिए लाये थे पिताजी।New Doc 38_1_20151230220337689
बाबा एक कम्बल पर बैठे हुए थे। कृष काया, ठोडी पर लंबी सफ़ेद दाढ़ी, जटाओं सी केश राशि, तन पर एक रामनामीऔर कमर अंगरखी , झुकी हुई कृष काया और चेहरे पर गाम्भीर्य …
उनके चारों और बैठे अनुयायी सतत हरे राम हरे राम..नाम के प्रवाह  में लीन थे। आत्मविभोर कर देने वाला वातावरण था।
पिताजी ने पुष्कर जी के घाट पर पुनः एक बार स्नान किया। मुझे भी अपना हाथ पकड़ कर डुबकी लगवाई। और सफ़ेद धोती पहनाई ।
मैं नव पोशाक में खुद को बड़ा असहज महसूस कर रहा था। पूछने पर माँ ने बताया की दीक्षा कार्यक्रम है अतः धवल वस्त्र पहनाये हैं।
मुझे क्या पता था भविष्य के गर्भ में शुभ्र रंग मेरा इन्तजार कर रहा है।
घाट पर कोई मछलियों के लिए दाना बेच रहा था। माँ ने मेरे हाथों से मछलियों को दाना डलवाया। उस वक्त तो वह मेरे लिए एक कोहतूल भरा कार्य था। आज उसका मर्म समझ में आता है।
हमारे वैष्णव धर्म की व्याख्या बहुत ही विशाल है। चींटी से लेकर हाथी तक सभी को भोजन कराने को हम “धर्म” समझते आये हैं।
मैं अपनी माँ के भावों को अब समझने लगा हूँ कि क्यूँ वो, चींटी, चिड़ियाँ, गाय, श्वान, कपोत सभी को अन्न स्वरूप आहार देना मुझे समझाया करती थी।
आज मैं अपने बच्चों को इन सब बातों का मर्म समझा कर अपनी माँ की नीति को अगली पीढ़ी में पहुँचाना चाहता हूँ। हमारा धर्म इसी तरह फलित होता रहता है।
नहा धोकर मैं गुरु दीक्षा के लिए एक कुशा के आसन पर बैठने का निर्देश हुआ।
कुछ ही समय पश्चात गुरुदेव पधारे। उन्होंने मेरे सर पर अपना हाथ रखा और झुक कर मेरे कानों में,
एक मन्त्र का उच्चारण किया-
|| हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे,
हरे कृष्णा हरे कृष्णा , कृष्णा कृष्णा हरे हरे||

खड़ाऊ पहने उनके चरणों में मैंने सर झुकाया। मुझे
आशीर्वाद देकर वे  अगले दिक्षुक की तरफ बढ़ गए।
9-10 बरस की उम्र रही होगी मेरी। इन सब बातों का अर्थ समझ पाना मेरे बस में नहीं था। पिताजी ने सहमति दी है तो जरूरी ही होगा। बस यही समझ कर अपने कर्म को अपनी जिम्मेदारी समझ लिया करता था।
गुरुदेव की वजह से मेरा घर राममय रहता था। पिताजी माँ एवं बहनें नित्य ही राम का नाम पुस्तिका में लिखते रहते थे। 12-13 वर्ष की वय तक आते आते मैंने भी यह लेखन आरम्भ कर दिया।
हर वर्ष गुरुपूर्णिमा को हम अपनी लिखी हुई राम नाम की पुस्तिकाएं गुरु आश्रम में ले जाकर गुरुदेव को भेंट करते। इसे ही वह गुरु दक्षिणा कहते थे।
आश्रम का मुख्य कक्ष ऐसी पुस्तिकाओं से अट जाया करता था।
मैं नहीं समझता कितना पाप / पूण्य का लेखा हुआ होगा , लेकिन राम नाम में मेरी श्रद्धा बहुत गहरी हो गई।
नवरात्रि के शक्ति पूजन के दिनों में भी मेरे घर में श्री राम जी की ही पूजा होती थी।
घर का नाम तक ‘श्री राम कुञ्ज ‘ रखा गया था।
आज ऐसे नाम नहीं मिलते अब ‘विला’ हो गए हैं।
मातृ या पितृ छाया भी हैं कहीं कहीं, लेकिन हकीकत कुछ और।
…आज उस आश्रम का नक्शा बदल गया है।
गुरुदेव के देवलोकगमन के पश्चात वहां काफी समय तक उनके शिष्य राम जप किया करते थे । फिर एक समय ऐसा भी आया जब आश्रम में जाने वाले भक्तों की संख्या में कमी होती गई।
और राम नाम का संकीर्तन फिर ऑडियो सिस्टम के द्वारा जारी रखा गया।
पिछले दिनों मैं हर बार की तरह हीअपने आश्रम में गया।
हर वक्त खुला रहने वाला आश्रम का मुख्य द्वार आज बंद था। उसे धकेल कर अंदर गया तो सन्नाटा फैला पड़ा था। बंदरों की एक टोली जरूर पेड़ों पर धींगा मस्ती कर रही थी।
उनका वो सन्नाटा तोडना मुझे अच्छा लग रहा था।
मालूम हुआ , वहा एक रखवाला रखा गया जो शायद भोजन व्यवस्था के प्रयोजन से कही इधर उधर था।
आँखें बंदरों की उछल कूद पर थीं मेरी, किन्तु कान उस निरंतर उठती हुई ध्वनि को तलाश रहे थे जब अब रुक गयी थी। वो राम जप का ऑडियो सिस्टम अब स्थिर हो चला था ।
मैं जैसे किसी अदृश्य सशक्ति के द्वारा निर्देशित हो रहा था। मानो बाबा कह रहे हों….
“आलोक , यहाँ भले यह संकीर्तन रुक गया , किन्तु अपने ह्रदय में तुम राम नाम का जाप यूँ ही सतत् बनाये रखना। यूँ ही..जब तक सांस थक न जाए जब तक…..!!”

 

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मेरा खेल-बैडमिंटन ~

छुट्टी का दिन.. और अलसाई सुबह !
कौन सोच सकता है 6 बजे तड़के उठ कर और कुछ नहीं तो टहलने निकला जाए!! मगर मैंने खेल के जरिये इसे अपनाने का विचार बनाया।
मुझे बैडमिंटन खेलने का शौक कॉलेज समय से रहा है! बड़ा मज़ेदार खेल है ये मगर..! इसके लिए मगर चार खिलाड़ी की जरूरत थी।
वो कहावत है ना , मरने पर कांधा देने वाले चार लोग मिल जाएं इतना तो बना कर रखना चाहिए!
मेरे इस शौक को पूरा करने के लिए मुझे खासी मशक्कत करनी पड़ी।
मैं मल्टी सोसाइटी में फ्लैट लेकर अभी हाल ही शिफ्ट हुआ हूँ। बिल्डर ने बैडमिंटन कोर्ट बना कर दिया है तो उसका लाभ क्यूँ न उठाया जाए ! इसी सोच ने मुझे बैडमिंटन जी ओर खींच लिया। बहुत समझाईश हुई इक्के दुक्के लोग चले आने लगे मगर मामला अनियमित था।
मैं इस सप्ताहांत कार्यक्रम को नियमित बनाना चाहता था।
आखिर मैंने अपने सोसाइटी के व्हाट्सअप ग्रुप को अपना जरिया बनाने का विचार किया।
आये दिन ग्रुप में बैडमिंटन के लाभ, डॉक्टर्स द्वारा उस खेल की अनुशंसा और होने वाले विभिन्न रोगों में फायदे का जिक्र आरम्भ किया । मैंने उस पर बताया कि कैसे BP और शुगर में इस खेल से कंट्रोल किया जा सकता है!
कैसे एक घंटे के खेल में 500 कैलोरी बर्न हो जाती है। बॉडी को शेप में लाने और एब्स और मसल्स को शेप देने में बैडमिंटन कारगर जरिया है! मगर लोग भी आसानी से मोटिवेट कहां होते हैं ।
कुल मिलाकर बैडमिंटन की रेल पटरी पर पूरी तरह नहीं आ पाई। संख्या में इज़ाफ़ा नहीं हुआ।
अब प्रलोभन से लुभाने की बारी थी।
मैंने चाय नाश्ते आदि के वहीं पर आयोजन की भी बात रख दी। इसका लाभ हुआ! अब कुछ लोग तशरीफ़ लाने लगे। दो कोर्ट थे। दोनों भरने लगे। बल्कि अब तो वेटिंग लाइन भी आरम्भ हो रही थी। इसका मतलब ये नही कि लोग बस खाने पीने के लिए आगे बढ़ते हैं। हकीकत तो ये थी नाश्ते के बहाने वो लोग एक नए अनुभव का मजा लेने लगे थे।
अब मैंने अलग से बैडमिंटन व्हाट्सअप ग्रुप बनाया। मासिक शुल्क लेने की कवादद शुरू हुई! यहां तक कि पड़ौसी सोसाइटी के लोग भी खेलने के लिए आने लगे। चाय नाश्ते के खर्च भी मैंने मासिक शुल्क से निकलवाया। लोगों को आनंद आने लगा। सोसाइटी में खेल कल्चर आरम्भ हुआ। बड़े लोग सुबह और बच्चे शाम को खेलेंगे।
कुछेक की चर्बी कम हुई तो वो मेरे फिटनेस ब्रांड अम्बेसडर की तरह बन गए । अब तो संडे की जगह सातों दिन का खेल होता है और वर्ष पर्यंत जारी रहता है।
एक चिंगारी थी वो धीरे धीरे ज्वाला बनी और अब याद नहीं रहता कि कब किसी रोज़ सूर्योदय के पश्चात उठना हुआ हो!!
इस खेल ने कइयों की दिनचर्या को बदल दिया है। कुछ तो यहां तक कहते हैं यहां आकर हमें हंसने बोलने को भी मिल रहा है, यह हमारे लिए बड़ी बात है!!
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यादें-

बड़ी तमन्ना थी
बड़े होंगे
जिंदगी मुट्ठी में होगी
अब पछताते हैं
अरे..बचपन निकल गया
एक दिन स्कूल के
बाहर तक चला गया
सपनों की तलाश करने
एक
गोली-चूरन वाले काका
हुआ करते थे
अब वहां बड़ा सा स्टोर है
संभव है काका
भगवान के पास चले गए होंगे
एक दो को पूछा भी मगर
उत्तर ना में मिला
किसके पास फुरसत है
यादों जैसे unproductive
विषय पर सर खपाने की
एक पल में एक पल
पुराना हो जाता है
वो बचपन की बिल्डिंग
काफी बदल गई है
मुख्यद्वार को आकर्षक
बना दिया है
पता नहीं शिक्षा की वो धार
अब भी पैनी है
या उस पर ‘अर्थ’ का रोगन
चढ़ गया है
जाने क्यूँ वो सब बदलाव
आंखों को सुहाया नहीं..!
भूल गया, मैं भी कितना
बदल गया हूँ
साइकिल से आने वाला
एक छात्र
आज कार से आया था
मगर फिर भी
उन दिनों की बात कुछ और थी
सच में..!!!

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-रंगों की रंगोली-
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मैं लेटा हुआ था
पास ही बेटे की टेबल पर
खुसर फुसर हो रही थी
देखा तो पाया
रंगों में बहस चल रही थी
शायद रंगों का बॉक्स
खुला रह गया था
एक दूजे पर रंग उछल रहे थे
कुछ खिले हुए थे
कुछ उबल रहे थे
इतरा कर रंग गुलाबी बोला
‘उनकी’ आंखों में उतर कर
मैं आग लगा देता हूँ
इश्क जगा देता हूँ
काला रंग बोल उठा
‘उसके’ गालों पर जो
काला तिल है
कईयों का उस पर दिल है
हरा बोल उठा
तुम दोनों बाज आओ
इश्क की कैद से निकलकर
बाहर आओ
मैं हरीतिमा बनकर
धरती की शान बढ़ा देता हूँ
खुशहाली का प्रतीक मैं,
सबकी निगाहों में रहता हूँ
लाल कुछ कहता, उससे पहले
सफेद बोला
तुम तो रहने ही दो
जिसकी आंखों में उतर जाते हो
जलजला लाकर ही रहते हो
लाल बोला कुछ भी हो
‘गोरी’ लाल जोड़े में सजती है
तब डोली उसकी उठती है
सुहागिनों का खास रंग
मेरे बिना सब बदरंग
सफेद बोल उठा
मैं सादगी का नाम हूँ
कोई रंग नहीं हूँ
फिर भी गुलफाम हूँ
बारी बारी से नीले, पीले
केसरिया, सबने
अपने गुण बतलाये
सुनते सुनते जब रहा न गया
मैं बोल उठा
जीवन को रंगने वाले
हे भांति भांति के रंगों,
तुम सबसे
जिंदगी खिलती है
उमंग जगती है,
खुशी मिलती है

एक रंग से काम नहीं चलता है
सात रंग को चुनकर
इन्द्रधनुष बनता है
कई रंगों को चुनकर
तितली इठलाती है
रंग बिरंगे वस्त्र पहनकर
नारी बल खाती है
हे रंगों तुम सब महान हो
दुनियाँ की जान हो
अब सो जाओ और
मुझको भी सोने दो

रंगीन सपनों में खोने दो..!!

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#गुलफाम=अत्यंत सुंदर

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लघु कहानी- ‘बड़ी माँ ‘

स्वलिखित लघु कहानी- “बड़ी माँ ”
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मेरी ही नहीं ,पूरे गांव की थी मेरी दादी !! सब उसे ‘बड़ी माँ’ कहकर बुलाया करते! किसी के कोई हारी बीमारी हो जाती या कोई विशेष व्यंजन बनाना होता, किसी के घर में कोई खास मेहमान आ जाता सब बड़ी माँ – बड़ी माँ करते घर आ जाते। कोई तीज त्यौहार बड़ी मां के पूरा नहीं होता. जाने कौन सी तैयारी थी उसकी, हर धार्मिक और सामाजिक अवसर के गीत, भजन उसे आते थे। मैं देखा करता लोक गीतों के मुख्य अंतरों को वो गाया करती बैठी हुईं बाकी महिलाएं उसकी टेर में टेर मिलाकर बस खानापूर्ति करती थीं।
बहुत धार्मिक थीं मेरी दादी माँ.., गांव में कोई साधु मंडली दिखाई पड़ जाती, उसे घर लिवा लाती फिर उनके चाय पानी, भोजन के दौर शुरू होते..ऊपर दान दक्षिणा कपड़े लत्ते , अनाज अलग से दिया जाता..! मेरे पिताजी उनसे उलझ पड़ते,! क्या माँ जब देखो फकीरों को घर उठा लाती हो..ये सब अकर्मण्य लोग हैं जो अपना उल्लू सीधा करने के लिए तुम्हारी जैसी महिलाओं की फिराक में रहते हैं। और मेरी दादी हँस कर टाल देती।
अरे सत्तू (मेरे पिताजी को दुलार से सत्तू कहती थी दादी माँ ) यही तो साथ जाएगा..!
गांव के बाहर नदी थी जिसमें साल भर पानी रहता । गांव की खुशहाली थी वो नदी ! गांव की धर्म में रुचि रखने वाली महिलाएं एकादशी के दिन स्नान किया करती और फिर मंदिर के दर्शन भजन..आदि चलता था।, घाट बने हुए थे पुरुषों और महिलाओं के अलग अलग..। किनारे पर ही भगवान श्री कृष्ण का 15वीं सदी का बना भव्य मंदिर था। दूर दूर के दर्शनार्थी वहां दर्शन को आते। मंदिर ऐसा कि मन की व्यथा हर ले। भगवान कृष्ण की प्रतिमा का मुख मंडल देखते ही बनता था। मुख्य मंदिर के साथ अन्य कई छोटे मोटे मंदिर भी..!
एक ऐसी ही एकादशी के दिन गज़ब हो गया.. दादी माँ स्नान के दौरान अचानक गायब हो गईं। जब महिलाओं का जत्था घाट से अलग होने को था उसमें मेरी दादी नहीं थीं। खूब तलाशी हुई, घर से लेकर मंदिर और हर वह ड्योढ़ी जहां वह जा सकती थी..
पिताजी तक बात पहुंची तो उनके होश उड़ गए…! सरपट नदी की तरफ दौड़े, साथ में मैं..मेरे लिए ये वेदना, दुख, हताशा और अचम्भे से मिश्रित मिले जुले क्षण थे। काफी खोज खबर की मगर कहीं पता न चला। बारिश ऋतु थी, घाट पर काफी काई फैली हुई थी। पिताजी और अन्य बड़े जनों का शक गहराने लगा, कहीं दादी फिसल तो नहीं गई..नदी पर परिचित लोगों का जमघट बढ़ने लगा। जिसने सुना वही सीधा घाट की तरफ दौड़ पड़ा । गांव के कुछ कुशल युवा तैराक पानी में उतारे गए और तलाशी का अभियान शुरू हुआ। पिताजी बेहाल थे , मेरी माँ रोये जा रही थीं और दूसरी महिलाएं उन्हें सांत्वना देने में लगी थी। समझ नहीं पड़ रहा था किया क्या जाए..

और एक आज की शहर संस्कृति ऐसी कि सड़क पर कोई तड़प रहा हो तो आदमी बगल से निकल जाते हैं, कुछ जिज्ञासु तो वीडियो और बनाने लगते हैं।
नदी के पार एक गांव और पड़ता है जहां से लोग नाव में बैठकर इस पार से उस पार आया जाया करते थे।
तलाशी चल रही थी ,उसी दौरान उस पार से एक नाव आती दिखाई दी। जब नाव करीब आई तो उसमें बैठे लोगों के चेहरे धुंधले से नज़र आने लगे! तभी किनारे खड़े लोगों में से किसी की आवाज आई, ऐसा प्रतीत हो रहा है बड़ी माँ , नाव में सवार है!
अब तो सबकी निगाहें नाव पर ही टिक गई। सहमति की आवाजें बढ़ती गईं- हाँ हाँ , बड़ी माँ तो नाव से आ रही है। गमगीन माहौल खुशी और हास्य मिश्रित हो गया..
संतोष और खुशी के मारे मां पिताजी के चेहरे देखने लायक थे। बड़ी माँ सचमुच में आ रही थी। नाव किनारे लगी सवार उतर भी न पाए और लोगों का हुजूम दादी माँ पर चढ़ बैठा ! आप अचानक कहां गायब हो गई ! यहां सबका हाल बेहाल हुआ पड़ा है! कहीं कुछ हो जाता तो..देखो चिंता के मारे बेटा बहू कैसे पीले पड़े हुए हैं!
और दादी..! ऐसे व्यक्त कर रही थी मानो कुछ हुआ ही नहीं! उलाहने और देने लगी, मेरे को ऊपर भेजने में लगे हैं सब, ठाकुर जी बुलाएंगे तब ही तो जाऊंगी ..!
फिर पता लगा सामने वाले गांव में हरिद्वार से कोई महात्मा एक दिन के प्रवास पर पधारे हुए है। दादी ने आंकलन कर लिया, बार बार नदी तक कौन लाएगा तो लगे हाथ इस पुनीत कार्य को पूर्ण कर लिया जाए। एक नाव जाने को तैयार लगी हुई थी दादी माँ बगैर समय गंवाए दर्शन को चल दी उस पार..!
पुलिस चौकी तक में नदी में किसी के पैर फिसल कर गिर जाने की खबर पहुंच गई थी। बात का खूब बतंगड़ बना….जाने क्या क्या नहीं हुआ उस रोज ! लेकिन घटना का अंत सुखद था, बड़ी माँ सकुशल थी, बस यही हम सबके लिए राहत की बात थी !

@alokDILse..

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सहृदयता

अपनी टेबल पर बैठा , मैं अपने आर्डर का इंतज़ार कर रहा था। वो एक रविवार की सुहानी सी शाम थी। छुट्टी का दिन होने की वजह से रेस्तरां में गहमागहमी और दिनों की अपेक्षा अधिक नज़र आ रही थी ।
आये हुए मेहमानों को वेटर, शीघ्रता बरतते हुए खाना परोस रहे थे। तभी मेरी पास वाली टेबल पर जमे सभ्रांंत लग रहे अधेड़ सज्जन ने वेटर को आवाज दी- ‘ ऐ छोरे ! कितनी देर लगाएगा, इधर आ !!’
एक सभ्य से दिखने वाले रेस्तरां में शांत लोगों के बीच मुझे इस तरह की कर्कश आवाज़ और रवैये का ज़रा भी भान नहीं था। मगर अब वक्त बदल गया है। आप वेशभूषा से बेहतर संस्कारी व्यवहार की अपेक्षा  नहीं रख सकते। एक कम उम्र का लड़का जो, टाई लगे होने के बाद भी काफी असहज महसूस कर रहा था, जी सर-जी सर करते हुए उनके समक्ष हाथ बांधे खड़ा हो गया। उन साब ने फिर उसी अंदाज में पुनः उसको झिड़का और वो सहमा हुआ बच्चा (मैं उसे अब आगे बच्चा ही लिखूंगा ) अपने काम में दुगुनी गति से लग गया।
कभी उस अशोभनीय व्यवहार तो कभी उस गरीब पर मैं सोचते हुए बहुत दूर चला गया था।
कुछ देर में भोजन की थाली लग चुकी थी।
बीच में एकाध बार उस बच्चे को बुलाना पड़ा, मैंने और अधिक सहानुभूति दिखाते हुए उसे , बेटे कहकर बुलाया । आत्मीयतापूर्ण व्यवहार के कारण उसके चेहरे पर संतोष और खुशी के मिले जुले भाव थे। उसे इस तरह खुश होकर अपना काम करना मुझे आत्मिक सुख दे रहा था। एक आध निजी सवालों से वो और सहज और प्रिय लगने लगा था।
कहते हैं नौकरों को मुंह नहीं लगाना चाहिए, माना ये सही होगा मगर व्यवहार का संयत होना कब गलत होता है।
भोजन से निवृत्त होकर मैं बाहर निकल आया था । कुछ दूर चला होऊंगा, इतने में वो बच्चा आवाज लगाते हुए दौड़कर मुझ तक आया। ” साब , आप अपना मोबाइल भूल आये थे” , कहकर उसने मुझे मोबाइल लौटाया।
मेरे मन के भाव और अधिक सकारात्मक और गहरे हो चले थे ।  मुझे लगा, सहृदयता का परिणाम मुझे हाथों हाथ मिल गया था।

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मेरे मित्र- शब्दअंश

अक्सरकोई
सुनना नहीं चाहता
कभी मुझे
कभी सच्चाई को

मेरे लिए
वक्त की कमी है
या सूख रही
दिल की नमी है
खैर,
मैंने दर्द और सुकूं
सब,
लफ़्ज़ों में बांट लिया है
हर्फ़
अल्फ़ाज़ों के रूप
में ढलकर
चले आते हैं
मुझसे गुफ्तगू करने
कहीं भी..कभी भी !
—————
हर्फ़=अक्षर

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प्रकृति के पाठ..

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